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प्रतीकात्मक तसवीर

दिल्ली दंगे- जांच में पीड़ित को ही आरोपी बनाने की कोशिश: कोर्ट

दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि दिल्ली दंगों के संबंध में एक मामले की जांच हैरान करने वाली थी। इसने कहा कि अभियोजन पक्ष ने दंगाइयों द्वारा जिन व्यक्ति को गोली मारी गई उसको उसके ही मामले में आरोपी बनाने की मांग की।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने मंगलवार को इस मामले में आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत नौ लोगों को आरोपमुक्त कर दिया और कहा कि इस मामले में केवल दंगे से संबंधित धाराएँ लगाई गई हैं। कोर्ट ने कहा, 'हालाँकि, जाँच पूरी तरह से हैरान करने वाली है क्योंकि अभियोजन पक्ष ने आईपीसी की धारा 307 के तहत आठ पर आरोप लगाया है, यह आरोप घायल बिट्टू की हत्या के प्रयास के लिए लगाया गया है जबकि इस मामले में दंगा के अपराध के लिए बिट्टू को आरोपी भी बनाया गया है।' 

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यह मामला 25 फरवरी, 2020 को कबीर नगर पुलिया के पास दंगों के दौरान बिट्टू के पैर के अंगूठे में गोली लगने से जुड़ा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 307 को साबित करने के उद्देश्य से अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होगा कि घायल को गोली लगी है, जो इस मामले में न केवल एक गवाह है, बल्कि अब उन आरोपियों में से एक है, जिन्हें मुकदमे का सामना करना है।

दिल्ली दंगों की पुलिस जाँच पर सवाल उठने का यह कोई पहला मामला नहीं है। बार-बार अदालतें जाँच पर सवाल उठाती रही हैं। पिछले साल सितंबर महीने में एक अदालत ने कहा था कि ठीक से जाँच करने में जाँच एजेंसी विफल रही है। इसने पुलिस जाँच को संवेदनहीन और निष्क्रिय बताया था। अदालत ने कहा था कि पुलिस की ऐसी जाँच देशवासियों के पैसे की बर्बादी है। अदालत ने तो यहां तक कह दिया था कि पुलिस ने तो सिर्फ़ अदालत की आँखों पर पर्दा डालने की कोशिश की है।

यह टिप्पणी आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई से जुड़े मामले को लेकर थी। वह मामला दिल्ली के चांद बाग इलाक़े में फरवरी 2020 में दंगों के दौरान एक दुकान की कथित लूट और तोड़फोड़ से संबंधित था। इस मामले में अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम और दो अन्य को आरोपमुक्त कर दिया था।

दिल्ली दंगों की जाँच के जो भी मामले अब तक अदालत में गए उनमें अदालतों ने पुलिस पर ऐसी ही सख़्त टिप्पणी की है। कई बार तो अदालत ने जाँच को एकतरफ़ा बताया और टिप्पणी की कि बिना किसी सबूत के ही आरोपी बना दिए गए।

पिछले साल सितंबर में ही दंगे से जुड़े एक अन्य मामले में अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा था कि एक ही जैसी घटना में पांच अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज नहीं की जा सकती हैं। अदालत ने इसे सुप्रीम कोर्ट के द्वारा तय किए गए नियमों के ख़िलाफ़ बताया और चार एफ़आईआर को रद्द कर दिया था। यह घटना उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मौजपुर इलाक़े में हुई थी। 

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पिछले साल जुलाई महीने में दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस के कामकाज और उसके रवैए पर गंभीर टिप्पणी की थी। उसने कहा था कि वह दिल्ली पुलिस के 'उदासीन रवैए' से दुखी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने दिल्ली पुलिस के रवैए को 'लापरवाही भरा' बताते हुए कहा था कि उसने पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगों के दौरान मदीना मसजिद में हुई आगजनी की अलग एफ़आईआर की जानकारी तक नहीं दी थी। 

पिछले साल जुलाई में ही दिल्ली के सत्र न्यायालय ने दिल्ली पुलिस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि उसने दिल्ली दंगे के दौरान गोली चलाने के अभियुक्तों के बचाव में साक्ष्य गढ़ा था। 

अदालत ने दिल्ली पुलिस की एक याचिका को खारिज करते हुए आदेश दिया था कि वह घौंडा निवासी नसीर की शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज करे। अदालत ने यह भी कहा था कि दिल्ली पुलिस ने एक-दूसरे एफ़आईआर में इस मामले के अभियुक्त के बचाव के लिए साक्ष्य गढ़ा। अदालत ने इसके साथ ही पुलिस की तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि वह अपने कर्तव्य के निर्वाह में बुरी तरह नाकाम रही है।

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पिछले साल मार्च महीने में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अभियुक्त के कथित कबूलनामे के लीक होने की जाँच रिपोर्ट पर पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा था कि यह 'आधा-अधूरा और बेकार काग़ज़ का टुकड़ा है।' 

जामिया मिलिया इसलामिया के छात्र आसिफ़ इक़बाल तनहा की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने कहा था, 'क्या आप चाहते हैं कि मैं इस जाँच रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दूं, मैं कहूंगी कि यह बेकार काग़ज़ का टुकड़ा है, बल्कि मैं यह कहूंगी कि यह अदालत की अवमानना है कि अदालत ने आपसे आपकी अपनी रिपोर्ट की जाँच करने को कहा था और आपको लगा था कि यह राष्ट्रीय महत्व की चीज है और देखें कि आपने कैसी रिपोर्ट तैयार की है।'

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