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नए ट्रैफ़िक नियम: सरकारों को लोगों की जान की नहीं वोट बैंक की चिंता

हमारे देश में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने यह तो साबित ही कर दिया है कि संविधान में नागरिकों को प्राप्त जीने के अधिकार सहित मौलिक अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण वोटों की राजनीति है। इसका ताज़ा उदाहरण एक सितंबर से देश में लागू हुए संशोधित मोटर वाहन क़ानून के कठोर यातायात नियमों को लागू करने में राज्य सरकारों की आनाकानी और यातायात नियमों का उल्लघन करने पर दस गुना ज़्यादा जुर्माने के प्रावधानों में ढील देने या इसे लागू नहीं करने का निर्णय है।

उप्र, उत्तराखंड, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, मप्र, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना की सरकारों के रवैये से साफ़ है कि उन्हें वाहन चालकों की जान से कहीं अधिक अपने वोट बैंक की चिंता है।
बीजेपी और दूसरे राजनीतिक दलों द्वारा शासित राज्य सरकारों के रवैये ने यह साबित कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 प्रदत्त जीने के अधिकार की उनकी नजरों में कोई अहमियत नहीं है।
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मोटर वाहन संशोधित क़ानून के प्रावधानों का जनता का एक ऐसा वर्ग विरोध कर रहा है जिसके पास अपने वाहनों के पूरे दस्तावेज नहीं हैं और जो किसी भी स्थिति में नियमों का पालन ही नहीं करना चाहता। इसमें दुपहिया वाहन चालकों की संख्या सबसे अधिक है। इन नियमों के विरोध में आवाज़ उठा रही जनता और राजनीतिक दलों का शायद यही मानना है कि उन्हें जान से अधिक पैसों और वोटों से प्यार है।

मोटर वाहन क़ानून में संशोधन करके यातायात नियमों को सख़्त बनाने और जुर्माने की राशि का मक़सद किसी भी स्थिति में वाहन चालकों से अधिक से अधिक धन ऐंठना नहीं है। इन नियमों को सख़्त बनाने का उद्देश्य वाहन चालकों को अपने वाहन से संबंधित सारे दस्तावेजों को दुरूस्त रखने और सड़क पर वाहन चलाते समय यातायात नियमों का पालन करने के लिये बाध्य करना है ताकि कोई दुर्घटना नहीं हो और इसमे लोगों की जान नहीं जाये।

राज्यों में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के रवैये को देखते हुए उचित होगा कि नियमों में यह भी जोड़ दिया जाये कि हेलमेट नहीं पहनने और कार में सीट बेल्ट नहीं लगाने तथा आवश्यक दस्तावेजों के बगैर ही वाहन चलाने वालों के किसी दुर्घटना का शिकार होने की स्थिति में सरकार से किसी प्रकार की अनुग्रह राशि नहीं दी जायेगी।

समझने को तैयार नहीं लोग

इन नियमों का विरोध करने वाले लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि ये नियम उनकी ही भलाई के लिए हैं। आप किसी भी राज्य के किसी भी जिले और कस्बे मे नाबालिग बच्चों को बग़ैर हेलमेट के ही अपने दुपहिया वाहनों को फर्राटे से चलाते देख सकते हैं। नए क़ानून में यही किया गया है कि यदि नाबालिग बच्चा वाहन चलाता है तो इसके लिये उसके माता-पिता जिम्मेदार होंगे और दुर्घटना होने की स्थिति में उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होगी जिसके नाम वाहन पंजीकृत है।

जनता को जागरूक करना ज़रूरी 

यह सही है कि अगर नये क़ानून पर सख़्ती से अमल करने से पहले यातायात पुलिस जनता को इस बारे में जागरूक करती और उन्हें आगाह करती कि वाहन में प्रदूषण नियंत्रण, गाड़ी का पंजीकरण और इसके बीमा संबंधी दस्तावेज लेकर चलें और गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बातें नहीं करें तथा इयर फ़ोन का इस्तेमाल नहीं करें। इसके अलावा दुपहिया वाहन बग़ैर हेलमेट के नहीं चलाएं। 

जनता बना रही वीडियो

इस क़ानून के लागू होने के बाद से जनता भी यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालान करने वाले पुलिसकर्मियों और नियमों को धता बताते हुए वर्दी के रौब में बग़ैर हेलमेट के मोटरसाइकिल पर तीन तीन पुलिसकर्मियों के सवार होने या फिर पुलिसकर्मियों द्वारा सीट बेल्ट नहीं लगाने की घटनाओं के वीडियो बनाकर उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर रही है जो निश्चित ही अच्छी बात है क्योंकि कोई कितना भी बड़ा क्यों नहीं हो, क़ानून सबके लिये बराबर है।
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वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के विभिन्न हिस्सों में ख़ासकर राजमार्गों पर हो रही दुर्घटनाओं को देखते हुए लंबे समय से मोटर वाहन क़ानून में संशोधन कर यातायात नियमों को सख़्त बनाने तथा इनका उल्लंघन करने वालों के लिये कड़ी सजा का प्रावधान करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए संसद को बताया था कि देश में हर घंटे 53 सड़क हादसे होते हैं और  इनमें 17 व्यक्ति जान गंवाते हैं। उन्होंने बताया था कि 2017 में सड़क दुर्घटनाओं में 1,47,913 व्यक्तियों की जान गयी थी और इनमें उप्र का स्थान पहला था जहां 20,124 व्यक्तियों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई थी। इस तरह की दुर्घटनाओं में पंजाब और हरियाणा में क्रमशः 4,463 और 5,120 लोगों की मौत हुई थी।

इन दुर्घटनाओं की मुख्य वजह लापरवाही के साथ तेज़ रफ्तार में वाहन चलाना और सीट बेल्ट तथा हेलमेट पहनने से गुरेज करना ही नहीं बल्कि नशे में तेज़ रफ्तार से वाहन चलाना भी है।

नशे में वाहन चलाने और राजमार्गों पर सहजता से शराब उपलब्ध होने के तथ्यों के मद्देनजर ही उच्चतम न्यायालय ने भी इस पर सख़्ती की थी और दिसंबर, 2016 में राजमार्गों से शराब की दुकानों को कम से कम पांच सौ मीटर दूर करने का आदेश भी दिया था।

नये क़ानून के तहत हो रहे चालान और इसमें हजारों रुपये का जुर्माना लगाये जाने की घटनाओं को देखते हुए अकेले दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण संबंधी प्रमाण पत्र के लिये प्रदूषण जांच केन्द्रों पर लगी वाहनों की लंबी कतारों से अनुमान लगाया जा सकता है कि वाहन चालक किस हद तक नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं।

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नये मोटर वाहन क़ानून के तहत यातायात नियमों को लागू करते समय यातायात पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सरकारी वाहन को नियमों का उल्लंघन करने पर बख्शा नहीं जाये। सभी सरकारी वाहनों के चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस और गाड़ी के कागजातों की जांच करना भी ज़रूरी है।
राजनीतिक लाभ की ख़ातिर इस क़ानून को लागू नहीं करने या फिर जुर्माने की राशि में जबरदस्त कटौती करने के राज्य सरकारों के निर्णय के बावजूद, उम्मीद की जानी चाहिए कि इन राज्यों को शासित करने वाले राजनीतिक दल नागरिकों के मौलिक अधिकारो की रक्षा के लिये सभी आवश्यक कदम उठायेंगे। राजनीतिक दलों से भी यही अपेक्षा है कि वे अपने राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर इन नियमों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले वर्गों को समझाने और यातायात नियमों का पालन करने के लिये जागरूक बनायेंगे।

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अनूप भटनागर
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