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जम्मू-कश्मीर: अधिकतर गिरफ़्तार लोगों को बंदी प्रत्यक्षीकरण से राहत क्यों नहीं मिली?

जम्मू-कश्मीर में पिछले साल 5 अगस्त से नज़रबंद या गिरफ़्तार किए गए लोगों को उस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से कितनी राहत मिली है जिसके माध्यम से संविधान हर नागरिक को अनियंत्रित राज्य सत्ता से सुरक्षा देता है? इस सवाल को ढूँढती एक रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सख़्त पीएसए यानी पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत हिरासत में लिए गए अधिकतर लोगों को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बावजूद लंबे समय तक राहत नहीं मिली। अभी भी ऐसे अधिकतर मामले लंबित हैं। हालाँकि कुछ मामलों को तो हाई कोर्ट ने तय प्रक्रिया पालन नहीं करने के लिए सरकार की खिंचाई करते हुए हिरासत में लेने के आदेश को रद्द कर दिया है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण को आम नागरिक की सबसे बुनियादी सुरक्षा में से एक माना जाता है। इसके तहत नागरिक को अनियंत्रित राज्य सत्ता के ख़िलाफ़ संविधान के तहत गारंटी दी जाती है। यह एक ऐसी सुरक्षा देता है जिससे बिना किसी आरोप के लोगों को हिरासत में नहीं रखा जा सकता है और कोर्ट सरकार को अदालत के समक्ष बंदी को पेश करने व उचित प्रक्रिया का पालन करने का आदेश देता है।

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इसी बंदी प्रत्यक्षीकरण के तहत हाई कोर्ट में याचिका लगाकर उन लोगों ने राहत माँगी जिन्हें 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 में फेरबदल के समय से हिरासत में लिया गया। 5 अगस्त का ही वह दिन है जब राज्य में हज़ारों लोगों को या तो नज़रबंद कर लिया गया था या फिर गिरफ़्तार कर लिया गया था। बड़ी संख्या में ऐसे गिरफ़्तार लोगों को राज्य से बाहर की जेलों में भेजा गया। इसी साल मार्च में राज्यसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा था कि ऐसे 7,000 से अधिक लोगों को प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी हिरासत में रखा गया था। 

बहरहाल, हिरासत में लिए गए ऐसे लोग जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं से हिरासत को चुनौती देते रहे। इन्हीं बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने पड़ताल की है और एक रिपोर्ट छापी है। इसके अनुसार पिछले साल पाँच अगस्त के बाद जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में लगाई गई 270 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ लंबित हैं। 

लंबित पड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं में से 61 फ़ीसदी तो 3-4 सुनवाइयों के बाद इस कारण से लंबित हैं क्योंकि सरकार ने कोर्ट से कहा कि हिरासत में लिए गए उन लोगों पर पीएसए लगाने के कारण पहले के डिटेंशन यानी हिरासत वाले आदेश पहले ही निरस्त कर दिए गए हैं।

पीएसए एक सख़्त क़ानून

बता दें कि पीएसए एक सख़्त क़ानून है और इसके तहत किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जा सकता है और बिना किसी ट्रायल के दो साल तक जेल में रखा जा सकता है। सरकार यह क़ानून किसी व्यक्ति पर राज्य की सुरक्षा को ख़तरे का हवाला देकर लगाती है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती पर भी पीएसए लगाया गया। हिरासत और फिर राजनीतिक नज़रबंदी में रहे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को 24 मार्च को रिहा किया गया था। इनके कुछ दिन पहले ही इनके पिता फारूक अब्दुल्ला को भी रिहा किया गया था। हालाँकि महबूबा मुफ़्ती अभी भी हिरासत में हैं।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त से लेकर दिसंबर 2019 तक दायर की गई 160 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का निस्तारण किया गया है। इसमें से 42 फ़ीसदी याचिकाओं का निस्तारण तो जुलाई महीने में किया गया है। यानी अनुच्छेद 370 में फेरबदल के क़रीब एक साल बाद। इस साल मार्च से लेकर जुलाई तक 65 फ़ीसदी याचिकाओं का निस्तारण किया गया। इन 160 में से सिर्फ़ 15 फ़ीसदी याचिकाओं का निस्तारण 2019 के आख़िर तक किया गया। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को आम तौर पर इतने समय तक टाला नहीं जाता है। लेकिन इन मामलों में ऐसा हुआ और इसी को लेकर जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में वरिष्ठ वकील जीएन शाहीन सवाल उठाते हैं। 35 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ दायर करने वाले शाहीन ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' से कहा, 'उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सरकारी वकील को अनुचित लाभ देते हैं; ऐसे मामले हैं जहाँ उन्हें आपत्तियाँ दर्ज करने के लिए एक महीने और यहाँ तक ​​कि दो महीने दिए गए हैं। यह कुछ ऐसा है जो सुनने को नहीं मिलता है।'

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अख़बार ने उन दो डिटेंशन ऑर्डर का उल्लेख किया है जिन्हें कोर्ट ने खारिज नहीं किया है। इसमें से एक मामला अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता मुज़फ़्फ़र अहमद शाह से जुड़ा है जिसमें कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसी कार्यवाही से पहले उपयुक्त फ़ोरम में वह 'सबूत पेश कर अपनी गिरफ़्तारी साबित करें'। दूसरा मामला जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन अध्यक्ष मियाँ क़यूम द्वारा दायर याचिका का है। कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका को खारिज कर दिया कि 'अदालत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के लिए प्रशासनिक निर्णय की जाँच करने के लिए एक उचित मंच नहीं है' और यह मामला 'सलाहकार बोर्ड के अंदर आता है।'

हालाँकि जिन 17 मामलों में अदालत ने हिरासत के आदेशों को रद्द कर दिया था, उसमें इसने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं और पीएसए लगाने के सरकार की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसने कहा कि हिरासत आदेश से पता चलता है कि प्रक्रियात्मक ज़रूरतों का सही से पालन नहीं किया गया है। अदालत ने हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़े अधूरे दस्तावेज़ देने पर ऐसे कुछ आदेशों को रद्द कर दिया।

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