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हादसे दर हादसे लेकिन सवालों के जवाब नहीं?

बहुत पहले एक हिंदी फ़िल्म आयी थी जिसमें एक गाना था...ये मुंबई शहर हादसों का शहर है, लोग इस गाने को मनोरंजन के हिसाब से गाते और गुनगुनाते भी रहते हैं। लेकिन महानगरों में विगत वर्षों से जिस तरह से हादसे हो रहे हैं उससे तो यह लगने लगा है कि शहर में इंसान की जान कीड़े-मकौड़े जैसी हो गयी है। साल दर साल हादसे पर हादसे और जाँच पर जाँच होती है लेकिन सवाल वही खड़ा रहता है कि ऐसे हादसे कब रुकेंगे?
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पाँच अप्रैल 2013 को मुंबई-ठाणे से सटे मुम्ब्रा में इमारत गिरने के हादसे को एक मील का पत्थर मान कर आगे बढ़ें तो पायेंगे कि साल दर साल हमारे प्रशासन और सरकारों ने इन हादसों से कोई सबक नहीं लिया है। शहर में पहली बड़ी बारिश हुई, क़रीब 35 लोगों की जान पानी में डूबने या मलबे में दब जाने से हो गयी और अब दक्षिण मुंबई के एक व्यस्ततम इलाक़े डोंगरी में मंगलवार को एक चार मंजिला इमारत ढह गई। इस हादसे में अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि इमारत के मलबे में 40-50 लोगों के दबे होने की आशंका है। घायलों को मलबे से बाहर निकाला जा रहा है। पर नेताओं की बयानबाज़ी शुरू हो गयी है, आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
चुनावी साल है इसलिए कोई पीछे नहीं रहना चाहता। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने मृतकों को लेकर संवेदना व्यक्त की है तो विपक्ष यह सवाल खड़े कर रहा है कि ऐसा हुआ क्यों और कैसे?

मुम्ब्रा में साल 2013 के हादसे में 75 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और 60 से ज़्यादा गंभीर रूप से घायल हुए थे। इमारत अवैध थी और बिल्डर, ठेकेदार और ठाणे महानगरपालिका के एक दो अधिकारियों पर गाज गिरने के कुछ दिनों बाद सब कुछ जस का तस हो जाता है और महानगर अपनी रफ़्तार से फिर दौड़ने लगता है। 

2013 से 18 के बीच मुंबई में क़रीब 2704 इमारतें गिरीं और इन हादसों में 234 लोगों की मौत हो गयी और 840 से अधिक घायल हो गए। यह आंकड़ा है महानगर का, इसमें ठाणे, नवी मुंबई, भायंदर, दहिसर जैसे कई उपनगरों का समावेश नहीं है। इन हादसों के पीछे जो बड़ा कारण बताया जाता है वह है मुंबई में क़रीब 16000 ऐसी इमारतें हैं जो 100 साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं। जो इमारत मंगलवार को गिरी वह 117 साल पुरानी थी। 

मुंबई महानगरपालिका (मनपा) और राज्य दोनों जगह बीजेपी-शिवसेना की सरकार है। मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ा तो मनपा प्रशासन ने कहा कि उन्होंने साल 2017 में ही इस इमारत को धोखादायक घोषित किया हुआ था लेकिन उसके बावजूद लोग यहाँ रहते थे।
मुंबई में हर साल महानगरपालिका बारिश शुरू होने से पूर्व धोखादायक इमारतों की सूची सार्वजनिक करती है लेकिन महानगर में आवास की समस्या इतनी बड़ी है कि लोग अपनी जान जोख़िम में डालकर इन घरों में रहते हैं। वहीं, म्हाडा (महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने भी अब यह बयान जारी किया है कि इमारत का जो हिस्सा गिरा है वह अनाधिकृत था और उससे उसका कोई संबंध नहीं। उनका कहना है कि उन्होंने इस  इमारत को 2018 में नोटिस जारी किया था कि यहाँ रहना ख़तरे से खाली नहीं है।
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पिछले कुछ सालों में बारिश के दौरान ऐसे हादसे आम होते जा रहे हैं। अभी 8 जुलाई को मुंबई के शिवाजी नगर में बारिश के दौरान बिल्डिंग गिर गयी और पाँच लोग घायल हो गए। यह हादसा सोमवार रात तक़रीबन 2 बजे हुआ। जिस वक्त यह हादसा हुआ उस वक्त बिल्डिंग में तक़रीबन 20 लोग सो रहे थे। 2 सितम्बर 2017 में भिंडी बाज़ार में भी एक 6 मंजिल इमारत धराशाही हो गयी थी और उस हादसे में 34  लोगों की जान चली गयी थी। यह इमारत भी 117 साल पुरानी थी और उसे म्हाडा ने हादसे से 6 साल पहले ही खाली करने का नोटिस दिया था लेकिन फिर भी लोग वहाँ रह रहे थे। 
सवाल यह उठता है कि क्या महानगरपालिका और म्हाडा के अधिकारी सिर्फ़ नोटिस देने या धोखादायक इमारतों की सूची प्रकाशित करने तक ही अपनी जवाबदेही तय करके बैठे हैं?

बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कार्पोरेशन (बीएमसी) ने पूरी मुंबई में 625 इमारतों को ख़तरनाक घोषित कर उन्हें खाली करने का नोटिस दिया हुआ है। इमारतों से हटकर देखें तो ऐसी ही स्थिति ओवर ब्रिज या रेलवे के ब्रिज की भी है। 

15 मार्च 2019 को छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस वाला पुल टूट गया था और छह लोग मारे गये थे। एक और हादसा 3 जुलाई, 2018 को मुंबई के अंधेरी में गोखले ब्रिज पर भी हुआ था। पुल का एक हिस्सा रेलवे ट्रैक पर गिर पड़ा था। इस हादसे में किसी की जान नहीं गयी थी, रेल ड्राइवर ने ब्रिज के मलबे को गिरता देख आपातकालीन ब्रेक मार कर बड़ा हादसा बचा लिया था। 

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इसी साल 29 सितंबर को मुंबई में एक बेहद ही दर्दनाक हादसा हुआ था। परेल-एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन के बीच ओवर ब्रिज टूटने की अफ़वाह की वजह से 35 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा तब हुआ था, उस समय भी मुंबई में भारी बारिश हो रही थी। लोग ब्रिज में खड़े होकर बारिश ख़त्म होने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन तभी यह अफ़वाह फैली कि पुल का एक हिस्सा टूट गया है, जिसके बाद भगदड़ मच गई। भगदड़ की वजह से 23 लोगों की जान चली गई थी, वहीं 39 से भी ज़्यादा लोग घायल हुए थे। 

ऐसे हादसे होते हैं कुछ दिन मीडिया की सुर्ख़ियों में रहते हैं, सरकार की तरफ़ से जाँच कमेटियाँ बिठाई जाती हैं और मृतकों और घायलों को कुछ राशि प्रदान कर दी जाती है लेकिन बाद में स्थिति ढाक के तीन पात जैसी हो जाती है ?

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