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अयोध्या: 1766 में यूरोपीय पादरी ने देखा - राम जन्मस्थान था मसजिद के बाहर

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अयोध्या से जुड़े तथ्यों पर हम विशेष सीरीज़ प्रकाशित कर रहे हैं। पिछली कड़ियों में हमने जाना कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में अपना फ़ैसला किस आधार पर दिया है। यह भी कि किन सबूतों को कोर्ट ने माना और वे कितने पर्याप्त थे। आज की कड़ी में पढ़िए उन लोगों, ख़ासकर, विदेशी लोगों के यात्रा वृत्तांत में अयोध्या के ज़िक्र के बारे में जो पिछले 500 सालों में अयोध्या आए थे।
नीरेंद्र नागर

पिछली कड़ी में हमने जाना था कि सुप्रीम कोर्ट के सामने हिंदू पक्ष ने धर्मग्रंथों के जो हिस्से पेश किए, उनमें से अधिकतर में राम जन्मस्थान - यानी वह जगह जहाँ राम पैदा हुए थे - के बारे में ठीक-ठीक कोई जानकारी नहीं है। वाल्मीकि जो राम के समकालीन कहे जाते हैं, उनके लिखे रामायण में इस बारे में कुछ नहीं है। तुलसीदास जिनके जीवनकाल (1511-1623 ई.) में ही कथित राम जन्मस्थान पर बाबरी मसजिद बनी (1528 ई.), उनके द्वारा रचित रामचरितमानस या किसी और ग्रंथ में इसके बारे में कुछ नहीं है। यहाँ तक कि गुरु नानक जो 1511-12 के आसपास राम जन्मस्थान पर गए बताते हैं, उनकी जन्म साखियों में भी इसके बारे में कुछ नहीं मिलता। अगर कुछ मिलता है तो संभवतः आठवीं शताब्दी में लिखे स्कंदपुराण के अयोध्या माहात्म्य में कि राम जन्मस्थान विघ्नेश्वर मंदिर के पूर्व में, ऋषि वशिष्ठ के आश्रम के उत्तर में तथा ऋषि लोमश के आश्रम के पश्चिम में स्थित है। इसका अर्थ यह हुआ कि राम जन्मस्थान के पश्चिम में विघ्नेश्वर मंदिर, दक्षिण में वशिष्ठ मुनि का आश्रम और पूर्व में लोमश ऋषि का आश्रम था। लेकिन मुश्किल यह है कि ये मंदिर या आश्रम आज की तारीख़ में हैं ही नहीं।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो कभी अयोध्या आया हो, उसने ये आश्रम देखे हों और उनके बारे में लिखा हो। अच्छी बात है कि ऐसे कई लोग हैं जो पिछले 500 सालों में अयोध्या आए, ख़ासकर विदेश से और उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांत में उस दौर में राम के नाम से जुड़े विश्वासों के बारे में लिखा है। आइए, एक-एक करके उनके बारे में जानते हैं।

अयोध्या पर विशेष

आईन-ए-अकबरी में ‘रामावतार’

इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक (1551-1602 ई.) का नाम आता है जो 16वीं शताब्दी में पैदा हुए थे। अबुल फ़ज़ल अकबर (1542 से 1605 ई.) के नवरत्नों में से एक थे और उन्होंने अकबर के शासन का इतिहास तीन खंडों में लिखा जिसे अकबरनामा कहा जाता है। इसी के तीसरे खंड को आईन-ए-अकबरी कहते हैं। आईन-ए-अकबरी में अवध प्रांत का ज़िक्र है और अयोध्या तथा राम के संबंध में भी लिखा गया है।

आईन-ए-अकबरी में रामावतार नाम का एक खंड है जिसमें अबू फ़ज़ल ने लिखा है-

‘तदनुसार त्रेता युग में चैत महीने के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन राम का जन्म अयोध्या नगरी में राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या की कोख से हुआ।’
अबुल फ़ज़ल ने यह लिखा था।

इसके साथ ही सूबा-ए-अवध नामक हिस्से में वह लिखते हैं- 

‘अवध भारत के महानगरों में से एक है। प्राचीन काल में यह शहर लंबाई में 148 कोस और चौड़ाई में 36 कोस तक फैला हुआ था। यह प्राचीन शहरों में सबसे पवित्र माना जाता है। शहर के सीमावर्ती क्षेत्र में लोग मिट्टी छानते हैं तो उन्हें उससे सोना मिलता है। यहाँ रामचंद्र का आवास था जिन्होंने त्रेता युग में अपने ईश्वरीय और राजसी स्वरूप का साथ-साथ निर्वाह किया।’

अबुल फ़ज़ल शहर के क़रीब अवस्थित दो बड़ी क़ब्रों का ज़िक्र करते हैं जिनकी लंबाई वह क्रमशः 6 और 7 गज़ बताते हैं। स्थानीय लोगों में फैली धारणा के अनुसार वे आदम के तीसरे बेटे सीत और पैगंबर अय्यूब की क़ब्रें थीं। वह रत्तनपुर में स्थित एक और कब्र का ज़िक्र भी करते हैं जिसे लोग संत कबीर की बताते हैं। लेकिन वह कहीं भी राम जन्मस्थान या उसके आसपास किसी मसजिद का ज़िक्र नहीं करते। यह हैरत की बात है। 

क्या बाबर के आदेश पर बनाई गई एक मसजिद इन क़ब्रों से कम महत्वपूर्ण थी? या तब तक बाबरी मसजिद अस्तित्व में ही नहीं आई थी जैसा कि कुछ लोगों का कहना है?
निष्कर्ष - अबुल फ़ज़ल की आईन-ए-अकबरी से यह तो पता चलता है कि अयोध्या को राम की जन्मभूमि माना जाता था लेकिन उनका जन्मस्थान कहाँ था या उसे तोड़कर कोई मसजिद बनाई गई थी, इसका कुछ भी पता नहीं चलता। इससे यह शंका पैदा होती है कि क्या तब तक बाबरी मसजिद अस्तित्व में आई भी थी या नहीं।

रामचंद्र के क़िले के टूटे-फूटे खंडहर

अबुल फ़ज़ल तो भारतीय ही थे। आगरा में पैदा हुए और नटवर में मरे। इसलिए उनको हम विदेशी नहीं कह सकते। विदेशी के तौर पर हमारे सामने पहला नाम आता है विलियम फ़िंच का जो 1608 से लेकर 1611 तक भारत में रहे। उनका यात्रा वृत्तांत विलियम फ़ॉस्टर की किताब 'अर्ली ट्रैवल्स इन इंडिया' (भारत में आरंभिक यात्राएँ) में संकलित हैं जिसमें उन सात अंग्रेज़ों के यात्रा वृत्तांत हैं जिन्होंने 1583 से लेकर 1619 के बीच उत्तर और पश्चिमी भारत की यात्राएँ कीं। तब यहाँ अकबर और जहाँगीर की सल्तनतें थीं।

विलियम फ़िंच गुरु नानक द्वारा राम जन्मस्थान की यात्रा के क़रीब सौ साल बाद आए थे। गुरु नानक की जन्म साखियों में तो हमें राम जन्मस्थान की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ नहीं मिलता लेकिन फ़िंच अयोध्या के बारे में काफ़ी कुछ बताते हैं। तब की अंग्रेज़ी में लिखे उनके वृत्तांत का संबद्ध भाग आप नीचे देख सकते हैं जिसमें उन्होंने 400 साल पहले बने किसी क़िले के साथ-साथ रामचंद्र (जिसे उन्होंने रानीचंद लिखा है) के क़िले के भग्नावशेषों का उल्लेख किया है जहाँ कुछ ब्राह्मण रहते हैं। लेकिन उन्होंने किसी मसजिद का ज़िक्र नहीं किया।

फ़िंच के लिखे का अनुवाद कुछ इस तरह होगा - 

‘अवध (अयोध्या) को, वहाँ से वृत्तांश 50 कोस; प्राचीन महत्व का शहर; पोटन राजा का राज, अब बुरी तरह नष्ट; क़िला 400 साल पहले निर्मित। यहाँ रानीचंद (रामचंद्र) के क़िले और भवनों के खंडहर भी हैं जिनको भारतीय परमेश्वर मानते हैं, कहते हैं कि उन्होंने दुनिया का तमाशा देखने के लिए मानव शरीर धारण किया। इन खंडहरों में कुछ ब्राह्मण भी रहते हैं जो निकट ही बहने वाली नदी में स्नान करने वाले सभी लोगों के नाम दर्ज करते हैं; यह प्रथा वे कहते हैं कि लाखों वर्षों से जारी है… नदी से कोई दो मील दूर उनकी (राम की) एक गुफा है जिसका मुख सँकरा है लेकिन अंदर से वह बहुत विशाल है और इतने घुमाव हैं कि कोई आदमी सचेत न रहे भटक सकता है; यहीं उनकी (राम की) अस्थियाँ विसर्जित की गई थीं।’

विलियम फ़िंच के वृत्तांत में रानीचंद रामचंद्र के लिए ही लिखा हुआ है, इसमें कोई शक नहीं। हो सकता है, उन्होंने नाम ग़लत समझा हो। यह भी हो सकता है कि उन्होंने अपने हाथ की लिखावट में Ram लिखा हो लेकिन जिसने उसे टाइप या कंपोज़ किया हो, उसने उसे Rani समझ लिया हो। हाथ से लिए हुए m को ni पढ़ना बहुत संभव है।

ध्यान दीजिए कि फ़िंच रामचंद्र के क़िले के खंडहरों की बात करते हैं लेकिन यह कहीं नहीं कहते कि उनके किसी क़िले को तोड़ा गया है। वह यह भी नहीं बताते कि वहाँ कोई मसजिद थी।

निष्कर्ष - विलियम फ़िंच के लिखे से हमें यह पता चलता है कि अयोध्या में कुछ क़िलानुमा खंडहर थे जिनको लोग रामकालीन मानते थे और वहाँ तीर्थ के लिए आते थे। वहाँ नदी के पास ही एक गुफा के बारे में भी पता चलता है जो बहुत विशाल थी और जहाँ राम की अंत्येष्टि हुई थी। लेकिन न तो यह पता चला कि उन क़िलों को किसी ने तोड़ा था, न ही किसी मसजिद के बारे में कोई सुराग मिला जबकि यदि मुसलिम पक्ष के दावों को माना जाए तो वह वहाँ 1528 से वहाँ होनी चाहिए थी।

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औरंगज़ेब ने तोड़े अयोध्या समेत कई मंदिर

इस फ़ेहरिस्त में अगला नाम आता है निकॉलो मैनुच्ची (1638-1717) का जो 17वीं शताब्दी में पैदा हुए थे। निकॉलो इतालवी लेखक-सैलानी थे। उन्होंने 1653-1708 ई. के बीच मुग़लकालीन भारत के बारे में एक किताब लिखी है जिसका नाम है स्तोरिया दो मोगोर (मुग़ल भारत)। इसमें शाहजहाँ, औरंगज़ेब, शिवाजी, दारा शिकोह, शाह आलम, राजा जयसिंह आदि के बारे में जानकारियाँ मिलती हैं। मैनुच्ची की अधिकतर ज़िंदगी भारत में ही कटी थी और उनका समय औरंगज़ेब के काल में पड़ता है। इसलिए उनकी बातों का काफ़ी वज़न है। अपनी किताब में उन्होंने औरंगज़ेब द्वारा ढहाए गए मंदिरों का ज़िक्र करते हुए चार नामों का विशेष उल्लेख किया है

मैनुच्ची लिखते हैं - भारत के इस इलाक़े में हालाँकि औरंगज़ेब ने असंख्य मंदिरों को ध्वस्त किया, फिर भी कई स्थानों पर अनेक मंदिर अभी भी बचे हुए हैं जहाँ भारी संख्या में भक्त आते हैं। इनमें वे मंदिर भी शामिल हैं जिनको ध्वस्त कर दिया गया है। हिंदू उनपर अब भी श्रद्धा रखते हैं और चढ़ावा देते हैं।

बादशाह औरंगज़ेब ने अपने साम्राज्य में जिन मुख्य मंदिरों को तोड़ा है, वे हैं - 1. माइसा, 2. मतुरा, 3. काक्सी, 4. हजुदिया; और भी अनेक लेकिन पाठक (उनके नाम पढ़ते-पढ़ते) थक न जाएँ, इसलिए उनके नाम नहीं दे रहा हूँ।

मैनुच्ची ने जो चार नाम दिए हैं, उनमें माइसा के अलावा बाक़ी सब आसानी से पहचाने जा सकते हैं - मथुरा, काशी और अयोध्या। लेकिन इससे ज़्यादा उन्होंने कुछ नहीं बताया है, न ही यह लिखा है अयोध्या में कौनसा मंदिर तोड़ा गया या तोड़ने के बाद क्या कोई मसजिद बनाई गई।

निष्कर्ष - इतालवी सैलानी-लेखक निकॉलो मैनुच्ची के लिखे से हमें केवल यह पता चलता है कि औरंगज़ेब ने अयोध्या में कोई मंदिर तोड़ा था लेकिन उसे तोड़कर मसजिद बनाई थी, इसका पता नहीं चलता। मगर उनके कहे से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि औरंगज़ेब ने अयोध्या में कोई मंदिर तोड़ा होगा तो भी हिंदू वहाँ जाते रहते होंगे।

चबूतरा जहाँ राम का जन्म हुआ था 

मैनुच्ची के विवरण से हमें पता चला कि औरंगज़ेब ने हिंदुओं के कई मंदिरों को तोड़ा जिसमें अयोध्या का मंदिर भी था। लेकिन अयोध्या का यह मंदिर कैसा था, इसके बारे में हमें ख़ास पता नहीं चला, न ही किसी मसजिद के बारे में कोई भनक मिली। इन दोनों के बारे में पहली झलक हमें योज़ेफ़ टीफ़ेनटेलर नाम के पादरी से मिलती है जो 1766 में भारत आए और पाँच साल तक रहे। उन्होंने अपनी यात्रा का हाल लैटिन में लिखा जिसे फ़्रेंच में अनूदित किया गया। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया गया। राम जन्मस्थान, सीता रसोई और स्वर्गद्वार के बारे में भी इसमें ज़िक्र है।

टीफ़ेनटेलर के मुताबिक़ फ़ैज़ाबाद में नया शहर बसने से अयोध्या में आबादी बहुत कम हो गई थी हालाँकि कुछ कुलीन लोगों ने राम के नाम पर कुछ भवन बना रखे हैं। इसी सिलसिले में वे ‘स्वर्गद्वारी मंदिर’ का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, ‘बताया जाता है कि राम अपने साथ नगर के सभी निवासियों को यहीं से स्वर्ग ले गए थे।’

स्वर्गद्वारी के पास ही मिट्टी के एक टीले पर स्थित सीता रसोई के बारे में भी वे बताते हैं ‘जो बहुत मशहूर है’। इसके आगे वे क्या लिखते हैं -

‘बादशाह औरंगज़ेब ने रामकोट नामक क़िले को नष्ट करवा दिया और उसी जगह पर तीन गुंबदों वाली एक मुसलिम इबादतगाह का निर्माण करवाया। कई और लोग कहते हैं कि इसे बाबर ने बनवाया था। काले पत्थर के 14 खंभे जो क़िले में पहले से थे, वे अब भी देखे जा सकते हैं। इनमें से 12 खंभे अब मसजिद की भीतरी छत को सहारा देते हैं, दो खंभे प्रवेश द्वार के पास भी देखे जा सकते हैं।'

निश्चित रूप से टीफ़ेनटेलर बाबरी मसजिद का ही ज़िक्र कर रहे थे। लेकिन इससे आगे वे जो कहते हैं, वह और महत्वपूर्ण है। वह लिखते हैं - 

‘बाईं तरफ़ एक वर्गाकार चबूतरा है जो ज़मीन से 5 इंच ऊँचा है और जिसकी किनारी चूने की बनी हुई है और जो 5 एल (19 फ़ुट) लंबा और 4 एल (15 फ़ुट) चौड़ा है। हिंदू इसे वेदी यानी पालना कहते हैं। इसका कारण यह है कि एक ज़माने में यहाँ एक भवन था जहाँ बेशन (विष्णु) ने राम के रूप में जन्म लिया था। कहा जाता है कि उनके तीन भाई भी यहीं पैदा हुए थे। बाद में औरंगज़ेब ने या कुछ के अनुसार बाबर ने इस जगह को तुड़वा दिया ताकि कुलीन लोग अपनी आस्था का पालन न कर सकें। लेकिन इसके बावजूद यहाँ तथा कहीं और भी कुछ धार्मिक रीतियाँ जारी हैं। मसलन जिस जगह पर राम का मूल निवास था, वहाँ वे तीन बार परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दंडवत् करते हैं। ये दोनों स्थान नीची दीवार से घिरे हुए हैं जिनमें प्राचीर भी बना हुआ है। सामने के कक्ष में दाख़िल होने के लिए एक अर्धवृत्ताकार द्वार से प्रवेश करना पड़ता है।’

टीफ़ेनटेलर ने जो लिखा, उसके वह साक्षी नहीं थे क्योंकि वह औरंगज़ेब (1608-1707) के निधन के क़रीब 60 साल बाद आए थे और जो कुछ भी वह लिख रहे थे, वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था। उनके इस विवरण पर हिंदू पक्षों ने बहुत ज़ोर दिया क्योंकि इससे उनका दावा पुख़्ता होता नज़र आता था कि (क) औरंगज़ेब या बाबर ने राम का निवास स्थान तोड़ा था और (ख) मसजिद में लगाए गए 14 खंभे उसी तोड़े गए मंदिर का हिस्सा थे। लेकिन इसमें जो तीसरा बिंदु है, वह उनके ख़िलाफ़ पड़ गया। टीफ़ेनटेलर ने लिखा है कि मसजिद के बाहर एक चबूतरा था जिसे लोग राम का जन्मस्थान मानते थे (देखें नक़्शे में राम चबूतरा) जबकि कोर्ट में हिंदू पक्ष का कहना था कि जन्मस्थान मसजिद के भीतर गोल गुंबद के नीचे उस जगह पर था जहाँ कुछ लोगों ने राम की मूर्ति रख दी थी। यह वही मूर्ति थी जो उससे पहले राम चबूतरे पर थी।

तो क्या टीफ़ेनटेलर के समय राम चबूतरे वाली जगह को ही राम जन्मस्थान माना जाता था और यह धारणा 19वीं या 20वीं शताब्दी में बनी कि राम जन्मस्थान मसजिद के अंदर है? इस मत को सही मानने वाले यह भी याद दिलाते हैं कि 1885 में महंत रघुबर दास ने अदालत के सामने जो फ़रियाद की थी, वह राम चबूतरे पर मंदिर बनाने के बारे में ही थी।

लेकिन इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों में से एक ने निर्णय के साथ नत्थी एक बेनाम परिशिष्ट जोड़कर बताया है कि हिंदुओं की आस्था के मुताबिक़ राम जन्मस्थान हमेशा से बाबरी मसजिद के भीतर ही था। वह इस निष्कर्ष पर कुछ सबूतों के आधार पर पहुँचे। ये सबूत कितने विश्वसनीय हैं, इसी पर बात करेंगे अपनी अगली और अंतिम कड़ी में।

नीरेंद्र नागर
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