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अयोध्या: विवाद को कौन ज़िंदा रखना चाहते हैं और क्यों?

ऐसा कौन-सा वर्ग है जो येन-केन प्रकारेण अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद भूमि विवाद को जीवित रखना चाहता है? इस विवाद के लगातार बने रहने से किन्हें और किस तरह का लाभ हासिल होगा? कहीं धार्मिक भावनाओं और आस्था की आड़ में इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति का खेल तो नहीं बनाया जा रहा है? उच्चतम न्यायालय बार-बार साफ़ कर चुका है कि देश का संविधान ही सर्वोच्च है और यह संविधान से ही शासित होता है लेकिन इसके बावजूद न्यायालय की कतिपय व्यवस्थाओं से असहमति व्यक्त करते हुए शरिया क़ानून का हवाला दिया जाता है।

इन सवालों पर अगर गंभीरता से मंथन करें तो एक तथ्य सामने आता है कि पहली बार 23 अप्रैल 1985 को शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था की आड़ में सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं से भरपूर इस देश के सांप्रदायिक सद्भाव के ताने-बाने को प्रभावित करने के प्रयास किए गए।

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केंद्र सरकार ने जनवरी, 1986 में मुसलिम समाज के कट्टरपंथी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए उच्चतम न्यायालय का फ़ैसला बदलने के लिए नया क़ानून बनाया तो दूसरी ओर, हिन्दू समाज को ख़ुश करने के इरादे से अयोध्या में लंबे समय से विवाद का केंद्र रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद विवादित स्थल का ताला फ़रवरी 1986 को अदालत के आदेश के तहत खोला गया।

शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों में ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रमुख था और अब राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद विवाद में समग्र न्याय के हित में संविधान के अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करके उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गयी व्यवस्था के प्रति असंतोष को हवा देने में भी ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड सबसे आगे है।

शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ की व्यवस्था को मुसलिम समाज की परंपराओं में हस्तक्षेप बताने का प्रयास किया गया था। हालाँकि, इसे किसी भी दृष्टि से धार्मिक मुद्दा नहीं माना जा सकता था क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने इस देश की नागरिक एक महिला को दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत ही गुजारा-भत्ता देने की व्यवस्था दी थी लेकिन इसे धार्मिक रंग दे दिया गया।

ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ सदस्य अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूखंड राम लला मंदिर को सौंपने और मसजिद के लिए पाँच एकड़ भूमि की व्यवस्था के संदर्भ में ‘शरिया क़ानून’ का हवाला देकर धार्मिक भावनाओं को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं।

अयेाध्या प्रकरण में संविधान पीठ ने निर्मोही अखाड़े के दावे को सिरे से अस्वीकार कर दिया और उसने ‘किन्तु-परंतु’ के साथ इस निर्णय को स्वीकार किया। हालाँकि, न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा है कि सरकार, अगर ज़रूरी समझे, मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा को प्रतिनिधित्व दे सकती है।

दूसरी ओर, इस विवाद से संबंधित मुसलिम पक्षकार फ़ैसले को स्वीकार करने और मसजिद के लिए अलग पाँच एकड़ भूमि आवंटित करने संबंधी न्यायालय के निर्देश पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर नहीं करने की बात कर रहे हैं। सुन्नी वक़्फ बोर्ड, इक़बाल अंसारी और अब जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने शीर्ष अदालत के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करने का फ़ैसला किया है।

दिलचस्पी विवाद बनाए रखने में क्यों?

इसके बावजूद, ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड विभिन्न मुसलिम संगठनों को इस फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए तैयार करने का भरसक प्रयास कर रहा है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आख़िर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दिलचस्पी इस विवाद को बनाए रखने में क्यों है? राम जन्म भूमि मंदिर-बाबरी मसजिद भूमि विवाद बने रहने से किसके हित पूरे होंगे?

मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव और इस विवाद में शीर्ष अदालत में एक पक्षकार की ओर से बहस करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक़ बोर्ड का मानना है कि मसजिद की ज़मीन अल्लाह की है और शरई क़ानून के अनुसार वह किसी और को नहीं दी जा सकती और इस ज़मीन के लिए आख़िरी दम तक क़ानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।

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सुप्रीम कोर्ट सर्वोपरि

ज़फ़रयाब जिलानी भले ही शरई क़ानून का हवाला देकर आख़िरी दम तक क़ानूनी लड़ाई लड़ने की बात कर रहे हों लेकिन वह इस सच्चाई से कैसे इनकार करेंगे कि एक लोकतांत्रिक देश संविधान की व्यवस्थाओं से शासित होता है और ऐसी स्थिति में देश की सर्वोच्च न्यायपालिका की व्यवस्था ही सर्वोपरि होती है।

इसका उदाहरण वाराणसी के दोशीपुरा में सुन्नी समुदाय के कब्रिस्तान में शिया समुदाय के भूखण्डों से संबंधित विवाद में 1981 व 1983 का फ़ैसला और केरल के सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने संबंधी फ़ैसला है। इन बेहद उलझे हुए प्रकरणों का भी उच्चतम न्यायालय ने व्यावहारिक समाधान निकाला है। ऐसे ही अनेक प्रकरण हैं जिनमें सभी पक्षों को सुनने और सारे तथ्यों और साक्ष्यों पर गहराई से विचार के बाद शीर्ष अदालत ने अपनी सुविचारित व्यवस्थाएँ दी हैं।

इस समूचे विवाद में इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अयोध्या में राम जन्म भूमि मंदिर आन्दोलन की परिणति न्यायिक व्यवस्था के रूप में होने का श्रेय आज भले ही संघ परिवार, भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना लेने का प्रयास करें लेकिन इसकी एक हक़ीक़त और है। 

इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि शाहबानो प्रकरण में शीर्ष अदालत का निर्णय बदलने के लिए क़ानून बनाने और फिर राम जन्मभूमि मंदिर के विवादित परिसर का ताला खुलवा कर ‘स्थाई रूप से सांप्रदायिक तनाव’ की नींव कांग्रेस और राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने ही डाली थी।

केंद्र सरकार ने शुरू में तो प्रगतिशील नेता और मंत्री आरिफ मोहम्मद ख़ान को शीर्ष अदालत के फ़ैसले के पक्ष में उतारा लेकिन बाद में वह जियाउर्रहमान अंसारी जैसे नेताओं और ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दबाव में झुक गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि जहाँ सरकार ने जनवरी, 1986 में उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए नया क़ानून बनाया वहीं इसके एक महीने बाद ही फ़रवरी में फ़ैज़ाबाद की एक अदालत के आदेश के तहत अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खुला। अदालत में ज़िलाधीश और पुलिस अधीक्षक ने कहा था कि विवादित स्थल का ताला खुलने से क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होगी।

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राजीव गाँधी ने बढ़ाई थी समस्या?

राजीव गाँधी सरकार ने अगर अप्रैल 1985 में ही पूरी दृढ़ता के साथ उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले में बदलाव करने से इनकार किया होता तो निश्चित ही धार्मिक मुद्दों को लेकर आन्दोलन शुरू करने का कोई भी संगठन शायद दुस्साहस नहीं कर पाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजीव गाँधी सरकार के कार्यकाल में विवादित स्थल का ताला खुला और फिर शिलान्यास की प्रक्रिया भी हुई। और रही सही कसर विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से बीजेपी के बाहर आने के बाद इसके प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी की ‘राम रथ यात्रा’ ने पूरी कर दी।

इन घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल उठता है कि आख़िर इन विवादों का शांतिपूर्ण तरीक़े से न्यायिक व्यवस्थाओं से हो रहे समाधानों का विरोध करने से किसे लाभ होगा? अब समय ऐसे मुद्दों पर धार्मिक भावनाएँ उभार कर तनाव पैदा करने का नहीं बल्कि एकसाथ मिलकर नयी डगर पर चलने का है।

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अनूप भटनागर
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