Trump vs Modi New York Times: न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप ने पीएम मोदी को फोन पर नोबेल पर पाकिस्तान के रुख की सूचना दी। चाहा कि भारत भी ऐसा करे। भारत ने नहीं किया तो ट्रंप ने कई भारत विरोधी कदम उठाए।
कहां तो ट्रंप-मोदी की दोस्ती के चर्चे भारतीय मीडिया की हर ज़ुबान पर थे और खुद दोनों का प्रचार करने एक दूसरे के देश में गए थे। लेकिन अब न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बता रही है कि दोनों के बीच रिश्ते किस तरह तल्ख हो गए हैं। और यह सब नोबेल पुरस्कार की सिफारिश को लेकर हुआ। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिफ मुनीर ने ट्रंप के नोबेल की सिफारिश का ढिंढोरा पाकिस्तान से लेकर वॉशिंगटन तक पीटा था। इसी वजह से ट्रंप ने उन्हें व्हाइट हाउस में लंच पर बुला लिया था। लेकिन अब न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने सारे मसले पर नए सिरे से रोशनी डाली है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुजीब मशाल, टायलर पेजर और अनुप्रीता दास की रिपोर्ट में बताया गया है कि मोदी से फोन पर ट्रंप ने यह कहते हुए पाकिस्तान की तारीफ कर दी कि पाकिस्तानी नेतृत्व ने उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया है। भारत को भी ऐसा करना चाहिए। नोबेल की सिफारिश ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान उनका एक तरह का जुनून बन गया है।
17 जून की फोन कॉल पर विवाद
रिपोर्ट के अनुसार, 17 जून को दोनों नेताओं के बीच फोन कॉल के दौरान ट्रंप ने इस मुद्दे को फिर उठाया और इस बात पर गर्व जताया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव को खत्म कराया। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की जमकर तारीफ की, जो भारत का लंबे समय से प्रतिद्वंदी देश रहा है। ट्रंप ने खुलकर कि भारत को भी उनके लिए नोबेल की सिफारिश करना चाहिए।
मोदी की नाराज़गी को ट्रंप ने नज़रअंदाज़ किया
रिपोर्ट के मुताबिक इस पर पीएम मोदी भड़क उठे। उन्होंने साफ शब्दों में ट्रंप से कहा कि हालिया संघर्षविराम में अमेरिका का कोई योगदान नहीं रहा, बल्कि यह समझौता सीधे भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रंप ने मोदी की आपत्ति को नज़रअंदाज़ कर दिया। यह मतभेद धीरे-धीरे दोनों नेताओं के रिश्तों में खटास का बड़ा कारण बन गया। जबकि ट्रंप के पहले कार्यकाल में दोनों नेताओं के बीच बेहद करीबी संबंध थे, लेकिन इस घटना के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
मोदी-ट्रंप की शख्सियत और कूटनीति
ट्रंप और मोदी, दोनों ही अपनी लोकलुभावन और मजबूत नेतृत्व शैली के लिए जाने जाते हैं। दोनों की पहली मुलाकातें, जैसे 2019 में टेक्सास में "हाउडी मोदी!" और 2020 में गुजरात में "नमस्ते ट्रंप!" रैलियों में, आपसी मित्रता का प्रदर्शन करती थीं। लेकिन ट्रंप की हाल की नीतियों, विशेष रूप से भारत से अवैध प्रवासियों की बड़े पैमाने पर निर्वासन और रूसी तेल खरीद के कारण 50% टैरिफ लागू करने की धमकी ने इन संबंधों को ठंडा कर दिया है।
यूएस-भारत में लगातार बढ़ता तनाव
फरवरी में, अमेरिकी सैन्य विमान से भारतीय अवैध प्रवासियों को हथकड़ियों में भारत भेजा गया, जिसने भारत में भारी विवाद को जन्म दिया। यह घटना उस समय हुई जब मोदी वाशिंगटन की यात्रा की तैयारी कर रहे थे। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने भारत के रूसी तेल आयात को लेकर टैरिफ लागू किया, जिसका मकसद रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को कमजोर करना था। भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न, समुद्री भोजन और कालीन उद्योगों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। अब ट्रंप और उनसे जुड़े अधिकारी खुल्लमखुल्ला यूक्रेन युद्ध के लिए भारत के पैसे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका आरोप है कि रूस ने भारत को तेल बेचकर वो पैसा यूक्रेन युद्ध में खर्च किया। भारत की जिन कंपनियों ने रूस से सस्ता तेल खरीदा, उन्होंने उसका फायदा भारत की जनता को भी नहीं दिया।
मोदी की रणनीति और भविष्य
मोदी ने इन चुनौतियों का जवाब आत्मनिर्भरता पर जोर देकर दिया है। उन्होंने हाल ही में कहा कि भारत को किसी भी "स्वार्थी हित" के जाल में नहीं फंसना चाहिए। इसके साथ ही, वह जापान और चीन की यात्रा की तैयारी कर रहे हैं ताकि नए व्यापारिक साझेदार तलाशे जा सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति पर वापस लौटना होगा, जिसमें वह किसी एक गठबंधन पर अत्यधिक निर्भरता से बचे।
भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव दोनों देशों के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहा है। जहां ट्रंप अपने व्यापार और कूटनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दबाव बनाना चाहते हैं, वहीं मोदी को घरेलू राजनीति और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को संतुलित करना है। यह देखना बाकी है कि दोनों नेता इस तनाव को कैसे सुलझाते हैं और क्या भारत-अमेरिका संबंध फिर से पुरानी गर्मजोशी हासिल कर पाएंगे।