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साभार: फ़ेसबुक/सुप्रिया सिंह

सीवर सफ़ाई- लोगों को मौत के गैस चैंबर में धकेला जा रहा है: सुप्रीम कोर्ट

सीवर की सफ़ाई के दौरान सफ़ाई कर्मियों की मौत के लगातार आ रहे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। सीवर की सफ़ाई के तरीक़ों को लेकर कोर्ट ने कहा कि किसी भी देश में लोगों को गैस चैम्बर में मारने के लिए धकेला नहीं जाता है। इसने कहा कि नाले की सफ़ाई में हर महीने चार-पाँच लोग मर रहे हैं। मैला ढोने और सफ़ाई के तरीक़ों को लेकर अदालत ने यह भी कहा कि आज़ादी के 70 साल बाद भी देश में जातिगत भेदभाव हो रहे हैं।

जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, 'सभी लोग बराबर हैं लेकिन अधिकारियों द्वारा उन्हें (सफ़ाई कर्मियों) बराबर सुविधाएँ नहीं दी जा रही हैं।' बेंच ने आगे कहा, ‘इंसानों के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अमानवीय है।’

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एससी/एसटी एक्ट को कमज़ोर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए की। एससी/एसटी एक्ट में गिरफ़्तारी के प्रावधान को कमज़ोर करने के कोर्ट के फ़ैसले के बाद सरकार ने संसद में क़ानून बनाकर इसे पहले जैसी स्थिति में ला दी है। 

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल से कहा कि सीवर लाइन की सफ़ाई करने वालों को मास्क और ऑक्सीज़न सिलेंडर क्यों नहीं दिए जाते हैं। जस्टिस मिश्रा ने कहा, ‘मैं आप लोगों से पूछ रहा हूँ, संविधान द्वारा देश में छुआछूत को ख़त्म किए जाने के बावजूद क्या आप उनसे हाथ मिलाते हैं? जवाब न है। इसी तरीक़े से हम चल रहे हैं। हालत में सुधार होना चाहिए। हमने आज़ादी के 70 साल पूरे कर लिए हैं, लेकिन ये चीजें अभी भी हो रही हैं।’

सीवर लाइन में उतरने वाले सफ़ाई कर्मियों की जान जाने के मामले लगातार आने के बावजूद सुरक्षा के उपाय नहीं हो पा रहे हैं। पिछले महीने यानी अगस्त में ही गाज़ियाबाद के नंदग्राम में पाँच सफ़ाई कर्मियों के साथ हादसा हो गया था। नीचे उतरते ही उनकी साँसें अटक गईं। पाँचों का अंदर ही दम घुट गया। सवाल यह है कि एक के बाद एक सफ़ाई कर्मियों की मौत के बाद भी समाधान क्यों नहीं निकलता? क्या फ़ेस मास्क, साँस लेने के उपकरण और वर्दी जैसे सुरक्षा के उपकरण भी उपलब्ध नहीं कराए जा सकते हैं? क्या दुर्घटना की स्थिति में आकस्मिक योजना नहीं होनी चाहिए? क्या यह शर्म की बात नहीं कि सफ़ाई करने में लोगों की जानें चली जाएँ और कान पर जूँ तक न रेंगे? क्या संवेदनाएँ मर चुकी हैं? यदि ऐसा नहीं है तो इसे रोक पाने में नाकाम क्यों हैं?

सीवर लाइन में मौत के मामले जब तब आते रहे हैं। देश भर में सीवर में मरने वालों की सही संख्या कितनी है, इसका ठीक-ठीक आँकड़ा तक नहीं है।

मौत के ठोस आँकड़े तक नहीं?

सरकार के पास देश भर के ठोस आँकड़े तक नहीं हैं। हालाँकि, सरकार की ओर से अख़बारों की कटिंग और इधर-उधर की सूचनाओं के आधार पर जनवरी, 2017 से लेकर 2018 के आख़िरी के महीनों तक सीवर लाइन में मरने वालों की संख्या 123 बताई गई थी। यह रिपोर्ट नेशनल कमीशन फॉर सफ़ाई कर्मचारी ने तैयार की। लेकिन दिक्कत यह है कि इस संख्या का आधार ठोस नहीं है। ऐसा इसलिए है कि कुछ महीने पहले ही एक रिपोर्ट आई थी कि 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ़ 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने आँकड़े भेजे हैं। यह प्रयास भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद शुरू किए गए थे। 

आँकड़े इकट्ठा करने का काम सामाजिक न्याय मंत्रालय की इंटर-मिनिस्ट्रियल टास्क फ़ोर्स करती है। इसकी गिनती भी सिर्फ़ 18 राज्यों के 170 ज़िलों में ही होती है। यानी 400 से ज़्यादा ज़िलों को शामिल ही नहीं किया गया है। इन 170 ज़िलों में से सिर्फ़ 109 ज़िलों ने ही रिपोर्ट सौंपी है।

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हालाँकि, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, मैग्सेसे अवार्ड जीतने वाले बेज़वादा विल्सन की संस्था सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन ने सरकार के आँकड़ों को ग़लत बताया था और इसकी संख्या 300 बताई। संस्था ने यह दावा सफ़ाई कर्मचारियों की मौत के आँकड़ों और उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर किया है।

सेप्टिक टैंक, नाली और मल-जल की सफ़ाई कराने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन जारी है। ऐसा इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में मल जल, सीवेज, सेप्टिक टैंक या नाले की सफ़ाई हाथ से करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यह अजीब स्थिति है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार इस पर फटकार लगाने और स्थिति में सुधार करने के आदेश देने के बावजूद स्थिति बेहतर नहीं हो रही है।

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