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डूबती विकास दर में बढ़ती महंगाई, यानी हालात बुरे! 

हमारे यहाँ भले ही हर दूसरे दिन अर्थव्यवस्था में ‘ग्रीन शूट्स’ यानी खुशहाली की हरी पत्तियाँ किसी न किसी को दिखाई देती रहती हैं, लेकिन पश्चिमी देशों में माना जा रहा है कि जब मुद्रास्फीति बढ़नी शुरू होगी तभी यह माना जाएगा कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है।

हरजिंदर

मशहूर ब्रिटिश पत्रिका ‘द इकाॅनमिस्ट’ में पिछले हफ़्ते आवरण कथा थी- ‘विल इन्फ्लेशन रिटर्न?’, यानी क्या मुद्रास्फीति लौटेगी? कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के बाद से दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों की यह सबसे बड़ी चिंता है कि मुद्रास्फीति यानी महंगाई का असर वहाँ के बाजारों से ग़ायब हो चुका है। यह माना जाता है कि एक हद से ज्यादा महंगाई गड़बड़ होती है, लेकिन उसके बाज़ार से बिलकुल ही नदारद हो जाने से ख़तरनाक कुछ नहीं होता। 

लेकिन क्या किया जा सकता है, क्योंकि चीजें अभी सामान्य नहीं हुई हैं। न तो बाज़ार में वह माँग है जो कीमतों को ऊपर की ओर ले जाने में बड़ी भूमिका निभाती है और न ही उत्पादक और खुदरा व्यापारी वगैरह इस स्थिति में हैं कि सामान को महँगा करें। जब पहले ही ख़रीदार न हों तो दाम भला कौन बढाता है? 

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महंगाई बढ़ने का मतलब?

हमारे यहाँ भले ही हर दूसरे दिन अर्थव्यवस्था में ‘ग्रीन शूट्स’ यानी खुशहाली की हरी पत्तियाँ किसी न किसी को दिखाई देती रहती हैं, लेकिन पश्चिमी देशों में माना जा रहा है कि जब मुद्रास्फीति बढ़नी शुरू होगी तभी यह माना जाएगा कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है।

indian economy : falling GDP rising wholesale price index, inflation rate - Satya Hindi
जहाँ तक अर्थव्यवस्था की विकास दर का मामला है, भारत में स्थितियाँ शायद ज़्यादा बदतर ही होंगी। लगातार दो तिमाही तक अर्थव्यवस्था की विकास दर शून्य से काफी नीचे रही है।
सरकारी परिभाषा के हिसाब से भी हम उस जगह पहुँच गए हैं, जिसे आधिकारिक रूप से मंदी कहा जाता है। लेकिन इस पूरे दौर में ऐसा एक भी मौका नहीं आया जब मुद्रास्फीति यानी महंगाई से मुक्ति मिली हो।

क्यों बढ़ रही है महंगाई?

सोमवार को महंगाई के जो आँकड़ें आए हैं वे बताते हैं कि मुद्रस्फीति न सिर्फ बनी हुई है बल्कि लगातार बढ़ भी रही है। अगर हम थोक मुद्रास्फीति की बात करें तो वह पिछले नौ महीने के सबसी ऊँचे मंहगाई पिछले महीने थोड़ी कम ज़रूर हुई है. लेकिन उसका मामला ज़्यादा ख़तरनाक है।

महँगाई कितनी होनी चाहिए और कितनी नहीं, यह मसला हमेशा ही विवादास्पद रहा है। कितनी  मुद्रास्फीति ठीक है और कितनी ख़तरनाक है, बहुत सारे अर्थशास्त्री इसके लिए जीडीपी इन्फ्लेशन रेशियो यानी विकास दर और मुद्रास्फीति के अनुपात को एक पैमाना मानते हैं।

कितनी महंगाई ठीक?

यह माना जाता है कि यह अनुपात एक के आस-पास रहना चाहिए। अगर यह एक से बहुत ज़्यादा हो जाए वह संकट पैदा होता है जो इस समय यूरोप में दिख रहा है। वहाँ मुद्रास्फीति इस समय शून्य के आस-पास पहुँच गई है। और अगर यह एक से बहुत नीचे पहुँच जाए तो ग़रीबों की कमर तोड़ देती है। यही दूसरी स्थिति इस समय भारत में है। 

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एक लंबे दौर तक भारत में यह स्थिति रही है जब विकास दर दो फ़ीसदी के आस-पास होती थी और मुद्रास्फीति दहाई अंक में। वे भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बुरे दिन माने जाते हैं। लेकिन उस अनुपात की तुलना अगर हम आज के अनुपात से करें तो स्थितियाँ शायद उससे भी बुरी हैं। 

अगर हम खाद्य मुद्रास्फीति को देखें तो हालात और भी बुरे हैं। थोक महंगाई जब नौ महीने के अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँची है तो भी वह अभी 1.55 प्रतिशत पर ही है। जबकि खाद्य मुद्रास्फीति पिछले एक महीने में तेजी से घटी और उसके बावजूद वह 4.27 प्रतिशत पर है।
यानी पहली चीज तो यह है कि अभी भी थोक बाज़ार में चीजें जिस दर से महंगी हो रही हैं, खाने पीने का सामान उससे कहीं ज्यादा तेजी से महंगा हो रहा है। 

गिरती विकास दर के बीच बढ़ती महंगाई का क्या है मतलब,देखें यह वीडियो। 
माना जाता है कि मध्य वर्ग अपनी आमदनी का एक छोटा सा हिस्सा ही खाद्य वस्तुओं पर खर्च करता है, लेकिन ग़रीब वर्ग के लोग अपनी आमदनी का बहुत बड़ा और कई बार तो लगभग पूरा हिस्सा ही खाने-पीने के जुगाड़ में खर्च कर देते हैं। यानी इस मुद्रास्फीति की जितनी मार इस वर्ग पर पड़ रही है उतनी बाकी वर्गों पर नहीं पड़ रही।

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