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राहुल का गढ़ बचाने उतरे वामपंथी नेता, प्रियंका ने भी डाला डेरा

अपने डेढ़ दशक के लंबे राजनैतिक जीवन में पहली बार कड़े मुक़ाबले में फँसे राहुल गाँधी ने अमेठी का क़िला फ़तह करने के लिए पहली बार 100 से ज़्यादा बाहरी नौजवानों की फ़ौज उतार दी है। कभी वामपंथी संगठनों से जुड़े रहे ये नौजवान इन दिनों अमेठी के गाँवों की ख़ाक छान रहे हैं और राहुल गाँधी की राह आसान करने में जुटे हैं। अमेठी के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि कांग्रेस को अपना क़िला बचाने के लिए बाहर के राजनैतिक कार्यकर्ताओं की मदद लेनी पड़ रही है।

बीते कई चुनावों से उलट इस बार प्रियंका गाँधी को भी अमेठी में ज़्यादा समय देना पड़ा रहा है तो राहुल गाँधी को अब तक चार बार यहाँ आकर प्रचार करना पड़ा है। कांग्रेस पहली बार अमेठी में सपा और बसपा कार्यकर्ताओं को भी साथ लेकर चलने का काम करती दिख रही है।

क़रीबी ज़िले इलाहाबाद में लंबे समय तक भाकपा माले के छात्र संगठन आइसा में काम कर चुके और बीते कुछ महीनों से कांग्रेस में आए दर्जनों नौजवान नेता इन दिनों अमेठी के गाँवों में टहलते मिल जाएँगे।

पहली बार इस लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने कमज़ोर बूथों को मज़बूत करने और प्रचार करने के लिए 100 से ज़्यादा नौजवानों की एक टीम उतार दी है। पूर्व में वामपंथी संगठनों के इन नौजवानों की कांग्रेस में हाल ही में इंट्री हुई है और इनमें से ज़्यादातर पड़ोसी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सक्रिय राजनीति में रहे हैं। दरअसल, भाकपा माले के प्रमुख नेता और इलाहाबाद छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके अखिलेंद्र प्रताप सिंह की नर्सरी में राजनीति सीखे नौजवानों की एक बड़ी टोली इन दिनों कांग्रेस में सक्रिय हो चुकी है। वामपंथी नेता शहनवाज़ आलम, दिनेश सिंह, दिनेश सरोज, वाम व सामाजिक कार्यकर्ता सदफ़ ज़फर जैसे तमाम लोग अमेठी में दिन रात पसीना बहाते दिख जाएँगे।

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सपा-बसपा के साथ एनसीपी नेता भी पहुँचे

दशकों बाद अमेठी में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ समाजवादी पार्टी के लोग भी नज़र आ रहे हैं। अमेठी लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली पाँच विधानसभाओं में अकेले गौरीगंज में सपा को छोडक़र बाक़ी चारों में बीजेपी का कब्ज़ा है। सपा विधायक राकेश सिंह लगातार इस बार राहुल गाँधी के लिए प्रचार में जुटे हैं। बसपा के कार्यकर्ता तो उतने सक्रिय नज़र नहीं आ रहे हैं पर कांग्रेस ने उनसे संपर्क ज़रूर साधा है और प्रचार में साथ देने को कहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव व पड़ोसी सुल्तानपुर के रहने वाले डीपी त्रिपाठी प्रदेश अध्यक्ष रमेश दीक्षित के साथ अमेठी प्रचार के लिए पहुँचे हैं। हालाँकि एनसीपी का यहाँ कोई आधार नहीं है पर अपने साथ के कुछ लोगों को डीपी त्रिपाठी ने प्रचार में ज़रूर लगाया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बसपा के जोनल को-ऑर्डिनेटरों व बूथ स्तर के प्रभारियों से संपर्क साध कर वोटों का गणित साधा जा रहा है।

संघ, बीजेपी और स्मृति की सक्रियता ने उड़ायी नींद

दरअसल, इस बार राहुल गाँधी को अमेठी में घेरने के लिए बीजेपी के साथ ही संघ ने भी ख़ासी मेहनत की है। स्मृति ईरानी लंबे समय से अमेठी में सक्रिय हैं और काफ़ी समय देती रही हैं। अमेठी लोकसभा क्षेत्र के चारों बीजेपी विधायक भी जमकर मेहनत कर रहे हैं। साड़ी, चप्पल वितरण और अमेठी के लोगों पर दिल्ली में भी ख़ास ध्यान देने की वजह से स्मृति ने यहाँ के लोगों में अपनी पैठ बनाई है। कांग्रेस में कुछ ख़ास लोगों को ही तरजीह दिए जाने से भी यहाँ के प्रभावशाली लोगों का एक वर्ग नाराज़ है जिसे स्मृति भुना रही हैं।

कांग्रेस के गढ़ अमेठी-रायबरेली के लोगों का कहना है कि बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में उनका चुनाव हारने के बाद भी क्षेत्र में बने रहना काम कर रहा है। अब तक जो भी बड़े नाम गाँधी परिवार से मुक़ाबले के लिए मैदान में उतारे जाते रहे वे चुनाव हारने के बाद ग़ायब हो जाते थे पर स्मृति ईरानी के मामले में ऐसा नहीं है।

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राहुल की जीत को लेकर आश्वस्त हैं कांग्रेसी

अमेठी में इस बार पेश आई दिक्कतों के बावजूद कांग्रेस जीत को लेकर आश्वस्त है। उनका कहना है कि न केवल जीत होगी, बल्कि पिछली बार के मुक़ाबले जीत का अंतर भी बढ़ेगा। राहुल गाँधी के वायनाड से भी चुनाव लड़ने के असर के बारे में उनका कहना है कि इसका सकारात्मक फ़ायदा मिला है। अमेठी के लोगों में यह भी होड़ है कि वायनाड से ज़्यादा वोटों से राहुल को जीता कर भेजा जाए ताकि वह यहाँ बने रहें।

अमेठी राहुल गाँधी के प्रचार के लिए डेरा डाली हुई टीम के एक सदस्य का कहना है कि बीजेपी प्रत्याशी स्मृति ईरानी के प्रचार में ‘संपर्क गाँव’ नाम का एक अभियान चलाया गया है जिसके चलते शहरी इलाक़ों से सटे गाँवों, ढाबों और कस्बों में तो उनका ज़ोर-शोर नज़र आता है पर अंदर के गाँवों में वह ग़ायब मिलता है।

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कुमार तथागत
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