15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दिए जाने के बावजूद हिजड़े भारतीय समाज के लिए अभी पराये ही हैं। साफ़ तौर पर अगर कहूँ तो इस लेख का उद्देश्य हिजड़ों की जीवन-शैली पर किसी तरह का इन्वेस्टिगेशन करना नहीं है, और न ही यह स्थापित करना है कि अपने अस्तित्व के लिए अपने हिस्से की जमीन या इलाके के मालिक होने की उनकी मान्यता पूरी तरह निर्दोष या बहुत आसान है। बल्कि यहाँ मेरा उद्देश्य जमीन या इलाके के मालिक होने की उस मान्यता को रेखांकित करने की है जिसकी उत्त्पत्ति शोषण और लगातार हाशिये पर धकेल दिए जाने के कारण हुई है। 

यहाँ मेरा उद्देश्य हिजड़ों के जीवन से जुड़े दो ख़ास पहलुओं को उजागर करना है । पहला, तो यही कि यदि नवउदारवादी सन्दर्भों में देखें तो जो समुदाय इतिहास,वर्चस्व, साजिशन या सामाजिक उपेक्षाओं के कारण संपत्ति की बुनियादी व्यवस्था से बाहर कर दिए जाते हैं, वे बाहर कर भुला दिए लोग अंततः एक अस्तित्वविहीन नागरिक, समुदाय बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं, और अंततः धीरे-धीरे किसी भी सरकारी योजना से गायब और कानून की सुरक्षा से बाहर हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर शहरों की आतंरिक बसावट को लिया जा सकता है।