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कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए कितना तैयार है भारत?

मोबाइल फ़ोन बनाने और उसकी सेवा देने वाली कंपनियों का स्पेन के बर्सीलोना में सम्मेलन होना था, जिसे रद्द कर दिया गया है। इसकी वजह कोरोना वाइरस के संक्रमण को रोकना है। लेकिन, यह तो सिर्फ एक उदाहरण है। सवाल यह है कि कोरोना वाइरस संक्रमण को भारत कैसे रोकेगा या भारत उसे रोकने के लिए कितना तैयार है।

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भारत रहेगा अछूता?

चीन में कोरोना वाइरस के फैलने संक्रमण से भारत पर बहुत असर नहीं पड़ेगा, यह मानने वाले भारी गफ़लत में हैं। इसकी बहुत ही संभावना है कि यदि चीन इसके संक्रमण पर तेज़ी से नियंत्रण नहीं कर पाया जो उसका जो हाल होगा, वह तो होगा, पर भारत पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा। 

वुहान से दिल्ली

भारत में अब तक तीन लोग कोरोना वाइरस से संक्रमित पाए गए हैं, वे सब केरल से हैं। चीन के जिस वुहान शहर में कोरोना वाइरस पाए गए, वह उस देश का 11वां सबसे बड़ा शहर है। कोरोना वाइरस के संक्रमण का पता लगने के कुछ दिन बाद ही वहाँ का हवाई अड्डा बंद कर दिया गया, पर तब तक दूसरे शहरों और प्रांतों तक यह फैल चुका था। उसके पूरी दुनिया में फैलने के आसार बहुत ज़्यादा हैं। 

कोरोना वाइरस के फैलने का जो ख़तरा है, उस सूची में भारत 17वें स्थान पर है। भारत में जिन हवाई अड्डों को अलर्ट कर दिया गया है और सबसे अधिक ख़तरा है, वे हैं दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद और कोच्चि।

पहला संक्रमित भारतीय

चीन के शेनज़ेन शहर के एक स्कूल में पढ़ाने वाली प्रीति माहेश्वरी पहली भारतीय थीं, जो कोरोना वाइरस से संक्रमित हो गईं। यह माना गया कि चीन में पढ़ने वाले और काम करने वाले लगभग 500 भारतीयों को इसका संक्रमण हो सकता है।
 उन्हें दो अलग-अलग हवाई जहाज़ों से भारत लाया गया। हवाई अड्डे के पास ही बन क्वैरन्टाइन होम ले जाकर उनकी जाँच की गई तो पाया गया कि उन्हें संक्रमण नही है।

भारत को कोई जानकारी नहीं

भारत समेत पूरी दुनिया के साथ दिक्क़त यह है कि उसके पास कोरोना वाइरस से जुड़ी अहम जानकारियाँ नहीं है। इस कारण वाइरस के संक्रमण को रोकने के बारे में भी उनके पास कोई जानकारी नहीं है। चीन इस बारे में पूरी पारदर्शिता नहीं अपना रहा है, वह इसके बारे में जानकारी दूसरों को नहीं दे रहा है। इसके उलट उसकी कोशिश मामले को दबाने में है।

चीन के साथ एक बड़ी खूबी यह है कि उसके पास बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवा है। उसके पास अच्छे अस्पताल हैं, डॉक्टर-नर्स हैं और संक्रमण को रोकने की पूरी फौज़ है।
भारत के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। भारत की स्वास्थ्य सेवा का आलम यह है कि हर साल गोरखपुर में इनसेफ़लाइटिस से बच्चे मारे जाते हैं, पर सरकार उसे रोक नहीं पाती है। मुजफ़्फ़रपुर में कई बच्चे मारे गए और सरकार यह बताती रही कि भूखे पेट लीची खाने से ये मौतें हुई हैं। पर बाद में इस पर सवाल उठाए गए और यह कहा गया है कि इन मौतों को यह कोई ठोस मेडिकल कारण नहीं हो सकता। 

भारत के पास क्या है उपाय?

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वाइरस को फैलने से रोकने के लिए जो उपाय किए हैं, उसके तहत पहले उसने लोगों को स्क्रीनिंग की है। उसने जनवरी महीने तक लगभग 28 हज़ार लोगों की जाँच की। जिन 12 रोगियों पर शक हुआ, उनके खून के सैंपल नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ वाइरोलॉजी के पास भेजा गया। 

भारत की स्वास्थ्य सेवा इस तरह के ख़तरों से निपटने में किस तरह अक्षम है, इसे इससे समझा जा सकता है कि एचवनएनवन (एच1एन1) संक्रमण फैला था तो भारत में इससे 7,000 लोग मारे गए थे। साल 2017 में इस संक्रमण से 38,811 लोग प्रभावित हुए थे, जिसमें से 2,270 लोगों की मौत हो गई।
 इससे यह भी पता चला था कि किस तरह एक महामारी फैलने के बाद भारत उसके बाद के प्रभाव को भी रोकने में नाकाम रही थी। 

'सार्स' और 'मर्स'

चीन के अनुभव से पता चलता है कि जितने लोगों को कोरोना वाइरस का संक्रमण हुआ, उसमें से 3 प्रतिशत लोगों की मौत हो गई। यह बेहतर स्थिति है। सार्स (सीवियर एक्यूट रेसपिरेटरी सिनड्रम) से 9.6 प्रतिशत और मर्स (मिडिल ईस्ट रेसपिरेटरी सिनड्रम) से 34.4 प्रतिशत लोगों की मौत हो गई थी। 

कोरोना वाइरस के मामले में भारत की पहली चुनौती यह होगी कि वह इस संक्रमण को भारत में घुसने से रोके। यह सिर्फ़ वुहान से उड़ानें रोकने या चीन से भारतीयों की वापसी को टालने से नहीं होगा। इसके लिए ज़रूरी यह होगा कि संक्रमण का उपचार किया जाए। 

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