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अँग्रेजों के मददगार सावरकर को पूजोगे या अँग्रेजों से लड़ने वाले बोस को?

दिल्ली विश्वविद्यालय में विनायक दामोदर सावरकर के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाने के प्रकरण ने नई बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस ऐसे समय की जा रही है, जब देश में छद्म राष्ट्रवाद अपने उफ़ान पर है, जिसमें उग्र हिन्दुत्व भी मिला हुआ है। देश को अंग्रेज़ों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना जिस व्यक्ति ने की थी, उसकी तुलना उस सावरकर से की जा रही है, जिसने अंग्रेज़ों को हर तरह की सैन्य मदद का भरोसा दिया था।

अंग्रेजों का समर्थन

नेताजी सुभाष की आज़ाद हिन्द फ़ौज ने दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे के कुछ दिन पहले ही पूर्वोत्तर पर हमला कर अंग्रेज़ी सेना को शिकस्त देने की कोशिश की थी, तो सावरकर ने उसी अंग्रेज़ी सेना की मदद करने के लिए युवाओं की भर्ती की थी और अंग्रेज़ों को सौंप भी दिया था। 
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सावरकर ने 1941 में भागलपुर में हुए हिन्दू महासभा के 23वें सत्र में कहा था, 'हिन्दू महासभा तमाम हिन्दुओं, ख़ास कर असम और बंगाल में, जितनी कुशलता से हो सके, एकजुट करे ताकि वे एक मिनट भी गँवाए बग़ैर सेना के हर अंग में शामिल हो जाएँ।'
सावरकर का यह मानना था कि जब द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा हुआ है, हिन्दुओ को अंग्रेज़ों की मदद करनी चाहिए। उन्होंने हिन्दू महासभा की बैठक में इस पर काफ़ी ज़ोर दिया था। 

आज जो स्थिति है, उसके मद्देनज़र यह बिल्कुल साफ़ है कि हिन्दुओं के लिए एक मात्र और सबसे फ़ायदेमंद विकल्प यह है कि वे बग़ैर किसी शक के ख़ुद को ब्रिटिश सरकार के साथ जोड़ लें और उन्हें रक्षा मामलों में भरपूर सहयोग दें, बस वह हिन्दू हितों के ख़िलाफ़ न हो।


विनायक दामोदर सावरकर, संस्थापक, हिन्दू महासभा

सावरकर ने ये बातें लगभग उसी समय कही थीं, जब सुभाष चंद्र बोस ऐसी रणनीति बनाना चाहते थे कि अंग्रेज़ों को देश छोड़ कर जाने को मजबूर किया जा सके। 
सावरकर ने 1940 में मदुरा में हुए 22वें हिन्दू महासभा सम्मेलन मे कहा था, 'सिर्फ़ नैतिक आधार पर ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक राजनीति के नज़रिए से भी हिन्दू महासभा को किसी तरह के हथियारबंद विरोध में नहीं पड़ना चाहिए।'

ब्रिटिश सेना में हिन्दुओं की भर्ती

साफ़ है, सावरकर सुभाष के इस विचार के एकदम ख़िलाफ़ थे कि अंग्रेज़ों से लड़ा जाए या उन पर आक्रमण किया जाए या उनका विरोध किया जाए। जहाँ नेताजी अंग्रेज़ों को भगाने के लिए जापान और जर्मनी की मदद हासिल करने की रणनीति बना रहे थे, सावरकर खुले आम ब्रिटिश उपनिवेशवाद की हर तरह की मदद करना चाहते थे। सावरकर ने उसी मदुरा कांग्रेस में कहा था, 'ऐसे समय जब जापान की सेना तेज़ी से आगे बढ़ रही है और एशिया को यूरोपीय प्रभाव से मुक्त करना चाहती है, ब्रिटिश सरकार को बड़ी तादाद में भारतीयों की ज़रूरत है जो सेना में भर्ती होकर उनकी मदद करें।'
सावरकर ने मदुरा सत्र में साफ़ शब्दों में कहा कि वह 20 लाख भारतीयों की फ़ौज खड़ी करेंगे। 

ब्रिटिश राजनय ने यह समझ लिया है कि यदि जापान से युद्ध छिड़ ही गया तो भारत इसकी हर तरह की तैयारियों का केंद्र होगा..इसकी संभावना है कि 20 लाख लोगों की एक सेना तैयार की जाए, जिसमें मुख्य रूप से भारतीय हों और भारतीय अफ़सरों के अधीन हो और जितनी तेज़ी से जापानी हमारी सीमा की ओर बढ़ने में कामयाब हों, उसी तेज़ी से यह सेना खड़ी कर ली जाए।


विनायक दामोदर सावरकर, संस्थापक, हिन्दू महासभा

हिन्दू महासभा के इसी मदुरा सम्मेलन के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें यह कार्यक्रम तय किया गया कि थल सेना, नौसेना और वायु सेना में ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में भारतीयों की भर्ती कराई जाए। 

आज़ाद हिन्द फ़ौज से लड़े सावरकर के लोग

इस प्रस्ताव का असर यह हुआ कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कैंप लगाए गए, जिनमें हिन्दू युवकों की भर्ती की गई और वे ब्रिटिश सेना में शामिल हो गए। समझा जाता है कि लगभग एक लाख रंगरूट तैयार कर ब्रिटिश सेना को सौंपे गए।
इतिहास गवाह है कि जब आज़ाद हिन्द फ़ौज लड़ते हुए पूर्वोत्तर में दाखिल हुई तो उन्हें रोकने के लिए ब्रिटिश सेना ने इन्हीं भारतीय रंगरूटों को तैनात किया। इस तरह साफ़ है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देश की आज़ादी के लिए जो आज़ाद हिन्द फ़ौज खड़ी की, उसको सावरकर के चुने हुए रंगरूटों ने रोका और हराया।
ताज्ज़ुब की बात यह है कि इस तरह के भारत-विरोधी और अंग्रेज़-परस्त व्यक्ति को बाद में ‘वीर’, देशभक्त और राष्ट्रवादी बताया गया। इसके लिए हिन्दू महासभा ने काफ़ी सोची समझी रणनीति के तहत प्रोपगैंडा चलाया। इस प्रोपगैंडा का लक्ष्य यह स्थापित करना था कि सावरकर महान देशभक्त थे। 
इस प्रोपगैंडा के तहत 1941 में एक किताब छापी गई, जिसका नाम था, 'विनायक दामोदर सावरकर्स वर्लविन्ड प्रोपगैंडा: एक्सट्रैक्ट्स फ़्रॉम द प्रेसीडेन्ट्स डायरी ऑफ़ हिज प्रोपगैंडिस्ट इंटरव्यू फ़्रॉम डिसेंबर 1937 टू ऑक्टोबर 1941'। इसे ए. एस. भिड़े ने संपादित किया था। 
सावरकर पर गाँधी हत्या मामले में भी मुक़दमा चला था। अदालत में पहली पंक्ति में गोडसे, तीसरी पंक्ति में बीच में काली टोपी में हैं सावरकर।

सावरकर को 'महान' बताने का प्रोपगैंडा युद्ध

यह किताब हिन्दू महासभा की हैंडबुक बन गई। इसे महासभा की हर शाखा को भेजा गया था और इसे पढ़ना संगठन के हर सदस्य के लिए ज़रूरी बना दिया गया था। धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच भी फैला और लोगों के बीच यह स्थापित होने लगा कि सावरकर कितने महान थे। 
इसलिए सावरकर की प्रतिमा सुभाष की प्रतिमा के साथ लगा देने से कई लोगों को ताज्जुब हुआ। यह ताज्जुब की बात इसलिए भी थी कि दोनों एक दूसरे के एकदम उलट थे, उनकी सोच उलट थी, उनके प्रयास उलट थे, काम उलट थे। एक अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ रहा था, दूसरा उन्हें सहयोग कर रहा था, एक अंग्रेज़ों को आमने-सामने की सैन्य लड़ाई में शिकस्त देकर उन्हें देश से बाहर खदेड़ने की कोशिश में था, दूसरा उन्हीं अंग्रेजों को भारत में जमे रहने के लिये सैनिक मदद कर रहा था।
आज सत्ता में वे लोग बैठे हैं, जो सावरकर के 'हिन्दू राष्ट्रवाद' के सिद्धान्त पर चलते हैं और देश में उसी सिद्धान्त को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे धीरे धीरे एक नैरेटिव खड़ा कर रहे हैं, जिसमें सावरकर और उनकी सोच से सहमत नहीं होने वाले लोगों को खलनायक बताया जा रहा हैं और उनकी छवि खराब की जा रही है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी के हत्यारे की खुले आम तारीफ़ की जा रही है और यह भी कहा जा रहा है कि इस पर शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। सुभाष की तुलना सावरकर से करना इसी अभियान का हिस्सा है।
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