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मंदी का एक और संकेत, गाँवों में सामानों की बिक्री 7 साल में सबसे कम

देश में जहाँ आर्थिक मंदी की बात की जा रही है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमज़ोर होने का एक और सबूत सामने आ गया है। यह साफ़ हो गया है कि गाँवों में लोगों के पास पैसे कम हुये हैं, लिहाज़ा वे पहले से कम सामान खरीद रहे हैं। इसका असर उन कंपनियों पर भी पड़ रहा है जो ये सामान तैयार करती और बेचती हैं।
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इसे इस बात से समझा जा सकता है कि सितंबर को ख़त्म हुई तिमाही के दौरान गाँवों में सामानों की खरीद 7 साल में सबसे कम हुई है। उपभोक्ता वस्तुओं पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी नीलसन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में यह कहा है। यह ख़बर 'लाइवमिंट' ने दी है। इस अख़बार का कहना है :
गाँवों में फसल की क़ीमत गिरने के कारण किसानों की आय में कमी आयी है। इस वजह से माँग कम हो गई है। किसान ही नहीं, भूमिहीन खेतिहर मजदूर भी कम सामान खरीद रहे हैं। गाँवों में उपभोक्ता वस्तुओं का दो-तिहाई हिस्सा किसान और भूमिहीन खेतिहर मजदूर ही खरीदते हैं।

बदहाल किसान, कम खपत

सितंबर की तिमाही में गाँवों में उपभोक्ता वस्तुओं की खपत सिर्फ 5 प्रतिशत बढ़ी।  बीते साल इसी दौरान 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। ज़ाहिर है, इस साल इस दौरान खपत में ज़बरदस्त कमी आई है। इस दौरान शहरों में भी उपभोक्ता वस्तुओं की खपत में कमी आई है। बीते साल जहाँ इस अवधि में शहरों में खपत 14 प्रतिशत बढ़ी थी, इस साल सिर्फ़ 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखायी दी।
पूरे देश में बिकने वाले उपभोक्ता वस्तुओं का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा गाँवों में ही बिकता है। इसमें वृद्धि दर शहरों की तुलना में 3 से 5 प्रतिशत ज्यादा रही है। अब पहली बार ऐसा हुआ है कि गाँवों में बिक्री में बढोतरी शहरों की तुलना में कम हुई है।
नीलसन दक्षिण एशिया के रीटेल मेज़रमेंट सेवा के प्रमुख सुनील खियानी ने लाइवमिंट से कहा, 'बीते 7 साल में गाँवों में होने वाली बिक्री के लिहाज़ से हम न्यूनतम वृद्धि देख रहे हैं।' ख़ियानी ने यह भी कहा : 

देश के 13 राज्यों में लगभग तीन महीनों में बाढ़ की स्थिति रही, जिससे किसानों की स्थिति बदतर हो गई। इससे वृद्धि की रफ़्तार धीमी हो गई।


सुनील खियानी, नीलसन दक्षिण एशिया के रीटेल मेज़रमेंट सेवा के प्रमुख

9-10% वृद्धि की उम्मीद बरक़रार

इसके बावजूद नीलसन को यह उम्मीद है कि साल भर में उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में 9-10 प्रतिशत की वृद्धि देखी जाएगी। नीलसन ने पहले इस वृद्धि दर का अनुमान 11-12 प्रतिशत लगाया था, जिसे बाद में उसने कम कर दिया। 
नीलसन का यह भी अनुमान है कि दिसंबर महीने में भी खपत में कमी हो सकती है, लेकिन उम्मीद है कि उसके बाद के तीन महीनों में खपत बढ सकती है।  

पैकेज़्ड सामान वाले बदहाल

गाँवों में खपत कम होने का असर डिब्बाबंद सामान बेचने वाली कंपनियों पर भी हो रहा है। बड़ी कंपनियों मसलन, हिन्दुस्तान लीवर, अडानी विलमार को सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ा है।
नीलसन का यह आँकड़ा ऐसे समय आया है, जब तमाम अंतरराष्ट्रीय एजंसियों, मैनेजमेंट कंपनियों और पैसे देने वाली संस्थानों ने कहा है कि भारत में अर्थव्यवस्था फिसल रही है। उन्होंने इस पर चिंता भी जताई है।
लेकिन सरकार लगातार इन तमाम बातों से इनकार करती रही है और कहती रही है कि अर्थव्यवस्था बिल्कुल ठीक है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पति परकल प्रभाकर को टका सा जवाब देते हुए कह दिया कि सरकार की लोक कल्याण योजनाओं से लाखों लोगों को फ़ायदा हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि 'सब चंगा सी', यानी सबकुछ ठीक है। उन्होंने दावा किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था 2024 तक 5 खरब डॉलर की हो जाएगी। उन्होंने इस पर सवाल उठाने वालों को 'प्रोफ़ेशनल पेसीमिस्ट' यानी पेशेवर निराशावादी क़रार दिया। लेकिन ताजा आँकड़े उनके दावों की पोल खोलते हैं।

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