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खय्याम: धीमी उदासी का राग

ऐसा संयोग कम ही होता है कि किसी रचनाकार की हर रचना हमेशा आला दर्जे की, अनोखी और लाजवाब हो और कुछ भी फालतू और कामचलाऊ न लगे। खय्याम ऐसे ही दुर्लभ संयोगों से बने थे। हिंदी सिनेमा में पश्चिमी तर्ज़ का बोलबाला होने के बावजूद खय्याम अपनी खाँटी हिन्दुस्तानी धुन पर डटे रहे। उनका संगीत जटिल नहीं रहा, बल्कि मद्धिम और सहजता लिए हुए था, लेकिन सिर्फ़ यमन जैसे एक ही राग में जितनी रंगतें उन्होंने पैदा कीं उतनी कम ही संगीतकार कर पाए। 
मंगलेश डबराल

खय्याम जैसे धीमी उदासी के एक राग का नाम था। उनके प्रत्येक सुर के भीतर जैसे एक मद्धिम दर्द और अवसाद के स्पंदन बहते थे। यहाँ तक कि उल्लास और उम्मीद को व्यक्त करने वाली रचनाएँ भी एक कशिश और तड़प से भरी होती थीं। उसे ‘बहारो मेरा जीवन भी संवारो, कोई आये कहीं से’, ’चोरी-चोरी कोई आये चुपके-चुपके’, ‘आजा रे मेरे दिलबर आजा’, ‘तेरे चेहरे से नज़र हटती नहीं’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’, ‘दिखाई दिए यूँ कि बेसुध किया’ और ‘इन आँखों की मस्ती में मस्ताने हज़ारों हैं’ में सुना और महसूस किया जा सकता है। 

यह खय्याम की बुनियादी स्वर-लिपि थी, जो सन 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘फ़ुटपाथ’ में तलत महमूद के विरागपूर्ण स्वर में गायी गयी साहिर लुधियानवी की नज़्म ‘शामे गम की कसम आज गमगीं हैं हम’ के साथ उभरी थी और जिसने मुहम्मद ज़हूर हाशमी उर्फ़ खय्याम को सिर्फ़ इक्कीस वर्ष की उम्र में एक अलग तरह के संगीतकार की प्रतिष्ठा दिलायी। इससे पहले सन 1950 में फ़िल्म ‘बीवी’ में उनके संगीत और मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में ‘अकेले  में वो घबराते तो होंगे’ भी एक हिट गीत बना था। यह वह दौर था, जिसमें अनेक दिग्गज संगीतकार विशाल पेड़ों की तरह छाये हुए थे और उनके तले उभर पाना आसान नहीं था।

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ऐसा संयोग कम ही होता है कि किसी रचनाकार की हर रचना हमेशा आला दर्जे की, अनोखी और लाजवाब हो और कुछ भी फालतू और कामचलाऊ न लगे। खय्याम ऐसे ही दुर्लभ संयोगों से बने थे। लड़कपन में ही वे पिता की इच्छा के विरुद्ध घर से भाग कर दिल्ली चले आये और पंडित अमरनाथ से संगीत सीखने लगे जो महान गायक अमीर ख़ान के प्रिय शिष्यों में थे। पिता उन्हें फिर से वापस ले गए। नतीजतन उन्हें कुछ साल फ़ौज की नौकरी करनी पड़ी। लेकिन के. एल. सहगल की तरह गायक-अभिनेता बनने के जुनून ने उन्हें बंबई (आज का मुंबई) पहुँचा दिया जहाँ उन्हें  सबसे चर्चित संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल -भगत राम के सहायक के तौर पर काम करने का मौक़ा मिला। हालाँकि अपनी मौलिक संगीत-प्रतिभा की पहचान उन्होंने लाहौर में सत्रह साल की उम्र में बना ली थी जब वह पंजाब के नामी संगीतकार बाबा चिश्ती के सहायक बने।

बंबई में क़रीब छह दशक के फ़िल्म जीवन में खय्याम ने व्यावसायिक तरीक़े से अंधाधुंध संगीत नहीं दिया, बल्कि एक साल में एक फ़िल्म से ज़्यादा नहीं की। लेकिन ख़ास बात यह है कि हर अगली फ़िल्म में उनका संगीत नयी ऊँचाइयों पर जाता था।

‘फ़ुटपाथ’ के बाद ‘फिर सुबह होगी’ इस सफ़र का दूसरा अहम पड़ाव था जिसके बाद ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ और ‘आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम’ जैसे गीत कामयाब रहे। फिर शोला और शबनम (1961) में ‘जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें’  और ‘शगुन’ (1964) में मुहम्मद रफ़ी और सुमन कल्यानपुर के स्वर में ‘पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है’ और जगजीत कौर के स्वर में ‘तुम अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दो’ जैसे बेहतरीन गीतों ने नयी रागात्मकताओं को जन्म दिया। ‘बहारो मेरा जीवन भी संवारो’, ’आजा रे मेरे दिलबर आ जा’,’ दिखाई दिए यूँ कि बेसुध किया’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’, ‘जलता है बदन’, ‘आयी तलवार की झंकार’, ‘कभी-कभी मेरे दिल में’, ‘मैं पल दो पल का शायर हूँ’, ‘बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये’, ‘कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है’ जैसे सुरीले पड़ाव खय्याम के योगदान को अविस्मरणीय बनाते हैं।

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खय्याम की ख़ासियत

खय्याम ने भले ही कम फ़िल्मों  के लिए संगीत रचना की, उससे बाहर उनका काम बहुत अहम माना जाता है। उनके गैर-फ़िल्मी गीत अलग पहचान रखते हैं और गजलों  में तो उनका अप्रतिम काम है। बेग़म अख्तर का एक महत्वपूर्ण एल्बम ‘कलामे असातिजा’ खय्याम की धुनों से सजा हुआ है जिसमें बेग़म अख्तर ने जौक, ग़ालिब’, आतिश, मीर, सौदा, मोमिन और दाग के कलाम पेश किये हैं। इसी तरह, पंजाब के एक  मक़बूल और फक्कड़ शायर सुदर्शन फाकिर की ग़ज़लों का एल्बम भी यादगार है जिसने उन्हें  एक बड़े दर्जे में बिठाया। मीना कुमारी की शायरी का एल्बम भी उन्होंने ‘आई राईट/ आई रिसाईट ‘नाम से पेश किया। दरअसल, खय्याम को कविता और उसके जज्बाती स्वभाव और नाज़ुकखयाली की बारीक़ समझ थी और उनके संगीत में क्लासिक शायरों के अलावा मखदूम मोहिउद्दीन, साहिर, जाँ निसार अख्तर, नक्श लायलपुरी और निदा फाजली तक की शायरी यादगार निखर कर आयी।  खय्याम की संरचनाओं की ख़ूबी यह थी कि उनमें ऑर्केस्ट्रा का बहुत ज़ोर नहीं था, गाने की कोशिश भी कम थी, उसकी बजाय शायरी के वाचन और अदायगी प्रमुख थी और कविता के शब्दों और आत्मा को अधिक से अधिक अभिव्यक्त करने का मक़सद था। 

‘शामे गम की कसम’, ‘जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमे’, पर्वतों के पेड़ों में शाम का बसेरा है’, ‘फिर छिड़ी बात रात फूलों की ‘, ‘कभी किसी को मुकम्मिल जहाँ नहीं मिलता’ आदि गीत इसीलिए अपने वक़्त को लाँघ कर अविस्मरणीय बन गए हैं। जगजीत कौर के गाये ‘तुम अपना रंजो-गम’ में भावना और उसके वातावरण की सहज प्रस्तुति है और संगीत कहीं पृष्ठभूमि में बजता हुआ लगता है। सच तो यह है कि संजीदा, साहित्यिक कविता को हिंदी सिनेमा में कोई संगीतकार खय्याम से बेहतर ढंग से संगीतबद्ध नहीं कर पाया।

एक राग में कई रंगतें

खय्याम निजी जीवन में भी अनोखे थे। वे सबसे कम उम्र में प्रतिष्ठित हुए, गायिका जगजीत कौर से उनका विवाह फ़िल्म जगत में पहला अंतर-धार्मिक रिश्ता था, लता मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी के स्वर-साम्राज्य में उन्होंने सुमन कल्यानपुर, मुबारक बेग़म, जगजीत कौर, तलत अज़ीज़ जैसे उस समय के बिलकुल नए गायकों को प्रोत्साहित किया और अपने एकमात्र बेटे के आकस्मिक निधन के बाद अपनी सारी संपत्ति से उभरते और संघर्ष करते कलाकारों के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की। हिंदी सिनेमा में पश्चिमी तर्ज़ का बोलबाला होने के बावजूद खय्याम अपनी खाँटी हिन्दुस्तानी धुन पर डटे रहे। उनका संगीत जटिल नहीं रहा, बल्कि मद्धिम और सहजता लिए हुए था, लेकिन सिर्फ़ यमन जैसे एक ही राग में जितनी रंगतें उन्होंने पैदा कीं उतनी कम ही संगीतकार कर पाए।

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