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आरक्षण के मसले पर क्यों ख़ामोश है ओबीसी वर्ग?

केंद्र सरकार यह समझ चुकी है कि आरक्षण को लेकर ओबीसी तबक़ा शांत है। संभवतः आरक्षण पूरी तरह से इसलिए नहीं ख़त्म किया जा रहा है क्योंकि ऐसा करने पर सरकार के ख़िलाफ़ यह तबक़ा एकजुट हो सकता है। इसके अलावा हर संभव तरीक़े से सरकार आरक्षण व्यवस्था को ध्वस्त करने में जुटी हुई है।

छत्तीसगढ़ में अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) का आरक्षण बढ़ाए जाने और कुल आरक्षण 72 प्रतिशत किए जाने के ख़िलाफ़ लामबंदी तेज हो गई है। सामान्य वर्ग हित सुरक्षा मंच, ब्राह्मण विकास परिषद जैसे तमाम संगठन तो आरक्षण ख़त्म करने की मांग को लेकर सड़कों पर हैं ही, राजस्थान में पुष्कर के पुरोहितों तक ने आरक्षण ख़त्म किए जाने की मांग शुरू कर दी है। वहीं, पिछड़े वर्ग द्वारा आरक्षण के समर्थन में कोई रैली नहीं निकल रही है। 

विभिन्न विश्वविद्यालयों की भर्तियों सहित तमाम विभागों में भर्तियों में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं हो रहा है, उसके ख़िलाफ़ इक्का-दुक्का ख़बरों को छोड़ दें तो कोई विरोध प्रदर्शन नहीं चल रहा है। आख़िर क्या वजह है कि ओबीसी वर्ग ख़ामोश है, जिसकी आबादी देश की कुल आबादी के 54 प्रतिशत से भी ज़्यादा मानी जाती है?  इसके लिए आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर मौजूदा पिछड़ेपन का संक्षिप्त अध्ययन करना होगा।

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आधुनिक भारत में वंचित तबक़े के लिए आरक्षण का प्रावधान सबसे पहले 16 जुलाई 1901 को शाहूजी महाराज ने अपनी रियासत में किया था। दरअसल, यह किसी वर्ग या जाति के लिए नहीं था बल्कि उन्होंने सिर्फ़ 4 जातियों, ब्राह्मण, शेणवी, प्रभु तथा पारसी को छोड़कर शेष जातियों के लिए अपने साम्राज्य में 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। इसके पीछे मंशा यह थी कि दरबार में समाज के सभी तबक़े को प्रतिनिधित्व और काम करने का मौक़ै मिल सके क्योंकि शाहूजी के दरबार में 71 उच्च पदों में से 60 ब्राह्मण नियुक्त थे। वहीं उनकी निजी सेवा में 52 में से 45 ब्राह्मण नियुक्त थे।

उस दौर में हर जाति एवं वर्ग अंग्रेज हुकूमत से ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं पाने की कवायद कर रहा था। ब्रिटिश सरकार ने तमाम तरह की सुविधाएं और प्रतिनिधित्व मांग के मुताबिक़ दिया। भारत के विद्यार्थी उत्तीर्ण नहीं हो पाते थे, उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने थर्ड डिवीजन का प्रावधान किया। 

सिविल सेवाओं में भारतीयों के बैठने की उम्र बढ़ाई गई, जिससे देश के लोगों को शासन में प्रतिनिधित्व मिल सके। इसी कड़ी में पिछड़े वर्ग के लिए भी प्रतिनिधित्व की मांग की गई। बाद में जब अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान हो गया तो शेष वंचित जातियां अन्य पिछड़े वर्ग के रूप में गोलबंद होकर सुविधाएं मांगने लगीं।

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आख़िरकार स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में केंद्र सरकार की नौकरियों में मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के मुताबिक़ आरक्षण का प्रावधान कर दिया। उस समय आरक्षण के विरोध में तमाम हिंसक वारदातें हुईं, विरोध स्वरूप जूता पालिश, झाड़ू लगाने से लेकर भीख मांगकर ग़ैर आरक्षित वर्ग ने विरोध प्रदर्शन किया।

अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण कर दिया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा तय 50 प्रतिशत ग़ैर आरक्षित सीटों की कथित सीमा टूट चुकी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों ने ओबीसी और एससी के लिए भी आरक्षण बढ़ाने का फ़ैसला कर दिया। 

सवर्ण आरक्षण के ख़िलाफ़ तो कोई आंदोलन नहीं हुआ, लेकिन जैसे ही ओबीसी आरक्षण बढ़ा, सवर्णों के तमाम मोर्चे खुल गए हैं। यह तबक़ा जूता पालिश से लेकर तमाम तरह के विरोध प्रदर्शन करने लगा है और ओबीसी वर्ग पूरी तरह से ख़ामोश है। इस ख़ामोशी की कई वजहें हो सकती हैं।

सरकारी नौकरियों का कम होना

ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद सरकारी नौकरियां लगातार ख़त्म की जा रही हैं। इसके लिए तमाम उपाय किए गए हैं। सरकारी विभागों-निगमों, कंपनियों, बैंकों का आकार क्रमशः छोटा हुआ है। अब निजी क्षेत्र में सरकारी क्षेत्रों की तुलना में नौकरियों का सृजन ज़्यादा हो रहा है। उन जगहों पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि निजी क्षेत्र में नियुक्ति का मानक जुगाड़ और परिचय होने की वजह से उस क्षेत्र के मलाईदार पदों पर सवर्णों का कब्जा है। इसके बावजूद ओबीसी तबक़े को लगता है कि निजी क्षेत्र में योग्यता के आधार पर नौकरियां मिलती हैं और आरक्षण का कोई मतलब नहीं है। एक बड़े तबक़े को यह लगता है कि आरक्षण होने से उसे कोई फायदा नहीं है। बहुत सीमित लोगों तक इसका लाभ पहुंचा है।

सरकारी संस्थानों में ठेके पर नियुक्तियां

इस समय देश में जितनी पुलिसिंग सरकारी क्षेत्र की है, उसी के समानांतर निजी क्षेत्र ने भी सिक्योरिटी एजेंसियां खड़ी कर ली हैं। उनकी तैनाती तमाम सरकारी विभागों, अस्पतालों आदि जगहों पर होती हैं और ये लोग बहुत मामूली वेतन पर अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं। इसके अलावा एम्स जैसे कई संस्थानों में क्लर्क ग्रेड का काम जैसे पंजीकरण करना, पर्चियां बनाना, जांच आदि के काम निजी क्षेत्र से कराए जाने लगे हैं। 

सफ़ाई कर्मियों का काम क़रीब-क़रीब पूरी तरह से ठेके पर चला गया है। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति व ओबीसी तबक़े को बहुत मामूली वेतन पर काम करना पड़ रहा है। इसे लेकर कभी ओबीसी या एससी-एसटी तबक़े ने विरोध नहीं जताया। यह भी एक वजह है, जिसके चलते ग़रीब तबक़ा व्हाइट कॉलर जॉब में आरक्षण को लेकर एकजुट नहीं हो रहा है।

क्रीमी लेयर का होना

ओबीसी वर्ग में जिस व्यक्ति की आमदनी 8 लाख रुपये से ज़्यादा हो जाती है, वे क्रीमी लेयर में चले जाते हैं। यही सीमा सवर्ण आरक्षण में ग़रीबी तय करने के लिए निर्धारित की गई है। 8 लाख रुपये से कम पाने वाला सवर्ण ग़रीब माना गया है, जबकि 8 लाख रुपये से ज़्यादा पाने वाला ओबीसी मलाईदार तबक़े का माना जाता है। इस तरह से ओबीसी तबक़े में जो लोग अपनी रोजी-रोटी की चिंता के साथ आरक्षण के पक्ष में आवाज उठा सकते हैं, उन्हें क्रीमी लेयर बताकर आरक्षण के दायरे से बाहर किया जा चुका है।

जातीय पदानुक्रम

ओबीसी की सूची बनाते समय मंडल आयोग ने कहा था कि तमाम ऐसी जातियां हैं, जिनके नाम अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में नहीं हैं। ऐसी छूटी हुई जातियों का सर्वे करके उन्हें ओबीसी से निकालकर एससी-एसटी में डाला जाना चाहिए, जिन्हें अभी फौरी राहत देने के लिए ओबीसी तबक़े में डाला गया है। 

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ज़्यादा है ग़ैर बराबरी 

ओबीसी तबक़े में ग़ैर बराबरी बहुत ज़्यादा है। जहां जाट, यादव, कुर्मी, लोध, छीपी, कोइरी आदि जैसी कुछ जातियां तुलनात्मक रूप से संपन्न हैं, वहीं बढ़ई, भर, लोहार, मछुआरा, निषाद आदि जैसी जातियां अनुसूचित जाति के सामाजिक स्तर से मामूली ऊपर या क़रीब उन्हीं के बराबर हैं। इनमें आरक्षण या सामाजिक वर्चस्व को लेकर आपसी संघर्ष चलता रहता है। बीजेपी सरकार इसका भरपूर फायदा उठाकर अपना जनाधार भी मजबूत कर रही है।

ओबीसी लिस्ट से छूटी तमाम जातियां 

स्वतंत्रता से पहले मराठे, कापू, जाट इत्यादि जातियां आरक्षण के लिए संघर्ष कर रही थीं। मंडल आयोग ने जाट, मराठा, पाटीदार, कापू इत्यादि आर्थिक रूप से संपन्न जातियों को ओबीसी से अलग रखा। हालांकि आयोग ने बार-बार जातीय जनगणना कराकर प्रतिनिधित्व जानने की बात कही है। साथ ही यह सिफ़ारिश की है कि जातीय जनगणना के माध्यम से शैक्षणिक, सरकारी संस्थानों, पदों पर प्रतिनिधित्व जानने के बाद ओबीसी सूची तैयार की जाए। लेकिन यह नहीं हो सका। 

भारत में ओबीसी की जातीय जनगणना 1931 के बाद कभी नहीं हुई। 2011 में जातीय गणना हुई भी, लेकिन सरकार ने उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए। 2021 में फिर जनगणना होनी है, लेकिन सरकार जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं नजर आ रही है। 

शायद सरकार को डर है कि इससे सरकारी और निजी क्षेत्रों में मलाईदार पदों पर जातीय स्थिति का पता चल जाएगा और इसमें ओबीसी का प्रतिनिधित्व न होने के कारण सामाजिक असंतोष फैलेगा। इस तरह से जहां ओबीसी वर्ग जातीय हाइरार्की में आपस में लड़ रहा है कि किसे आरक्षण की ज़्यादा मलाई मिली, किसे कम मिली, वहीं सरकार के लिए यह आरामदेह स्थिति है कि यह तबक़ा देख पाने में सक्षम ही नहीं है कि मलाई आख़िर कौन खा रहा है।

जातीय उच्चता की भावना

ओबीसी वर्ग में एक बड़े तबक़े को लगता है कि आरक्षण की वजह से उनका अपमान हो रहा है। इनमें ख़ुद के क्षत्रिय होने का दावा करने वाली जातियां अग्रणी हैं। कुर्मी, कोइरी, अहिर, छीपी, गुर्जर, लोध जैसी तमाम जातियां हैं, जो ख़ुद को किसी न किसी राजवंश का वंशज घोषित करती हैं। इन जातियों को लगता है कि आरक्षण की वजह से उनकी जाति का क़द कम हो गया है और उनका जातीय आधार पर अपमान हो रहा है।

ओबीसी तबक़े के एकजुट न हो पाने की ये प्रमुख वजहें हैं। यह वर्ग इतनी बड़ी आबादी है कि सामाजिक पदानुक्रम में अपने आप में ही अलग-थलग है। केंद्र की ओबीसी सूची की 2513 जातियों का यह समूह आपस में बुरी तरह से बंटा हुआ है, जिसमें साझा हित को लेकर एकजुट होने की संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आती है।   

प्रीति सिंह
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