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राजस्थान में मोदी फ़ैक्टर से है कांग्रेस का सीधा मुक़ाबला

चार महीने पहले राजस्थान में एक नारा ख़ूब चर्चित हुआ था - ‘मोदी तुम से बैर नहीं और वसुंधरा राजे तैरी ख़ैर नहीं।’ विधानसभा चुनाव में राजस्थान की जनता ने राजे सरकार को तो उखाड़ फेंका था लेकिन चार महीने बाद भी सूबे में मोदी से बैर नज़र नहीं आ रहा है और यही राजस्थान में सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है।
राजस्थान में 2014 में मोदी लहर में बीजेपी ने सभी 25 सीटें जीती थी। इस बार जहाँ बीजेपी के सामने 2014 का प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है तो कांग्रेस के सामने सूबे में सत्ता में होने की वजह से नतीजों को पूरी तरह पलटने की चुनौती।

राजस्थान में दो दशक से अब तक तक ट्रेंड यह रहा है कि जो पार्टी राज्य में सत्ता में रही है, लोकसभा चुनाव में भी अधिकतर सीटें उसकी ही झोली में जाती रही हैं। लेकिन इस बार अब तक की तसवीर सूबे में सत्ताधारी कांग्रेस के लिए चिंता की वजह हो सकती है। 

चार महीने पहले जब मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जंग चली थी, तब पार्टी के कई सीनियर नेताओं ने युवा पायलट की जगह अशोक गहलोत को कमान सौंपने के पीछे तर्क दिया था लोकसभा चुनाव का। यह माना गया कि गहलोत के अनुभव और छवि से राजस्थान में कांग्रेस लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें जीत सकती है।

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लेकिन आज यह तर्क पूरी तरह से धराशायी हो गया लगता है। काँग्रेस राजस्थान में किस कदर एक-एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है, इसकी बानगी जोधपुर सीट है। जोधपुर से मैदान में हैं अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत। वैभव का मुक़ाबला है केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी गजेंद्र सिंह शेखावत से। मुक़ाबला इतना कड़ा है कि अशोक गहलोत जोधपुर में ऑटो से गलियों में घूमकर बेटे के लिए वोट माँग रहे हैं। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शेखावत के समर्थन में रैली करते हुए गहलोत के अपने बेटे के पक्ष में चुनाव प्रचार को मुद्दा बनाते हुए उन्हें यह कहते हुए घेरा कि सूबे में कांग्रेस बाकी सभी सीटें हार रही है, इसलिए गहलोत बेटे को जिताने के लिए गली-गली घूम रहे हैं। हालाँकि अशोक गहलोत ने भी पलटवार किया और कहा कि बेटे के लिए बाप नहीं घूमेगा तो और कौन घूमेगा। गहलोत ने मोदी पर तंज कसा और कहा कि मोदी का बेटा नहीं है, इसलिए वह परिवार के मायने कैसे जानेंगे।

गहलोत सरकार के आठ मंत्री, एक दर्जन से ज़्यादा विधायक और दो दर्जन कांग्रेस नेता जोधपुर में डेरा डाले हुए हैं। जोधपुर शहर की तीन में से एक सीट सरदारपुरा से ख़ुद अशोक गहलोत विधायक हैं, वह भी लगातार तीस साल से।

जोधपुर के ग्रामीण इलाक़े में जाट और विश्नोई समुदाय निर्णायक भूमिका में है। जाट समुदाय को अपने पाले में लाने के लिए हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को लाया गया। विश्नोई समुदाय के समर्थन के लिए हरियाणा के कुलदीप विश्नोई से प्रचार करवाया गया। इसके बावजूद वैभव गहलोत गजेंद्र सिंह के साथ कांटे के मुक़ाबले में फंसे हैं।

गजेंद्र सिंह शेखावत ख़ुद की उपलब्धियाँ गिनाने से ज़्यादा मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट माँग रहे हैं। ऐसे में जोधपुर में मुक़ाबला वैभव बनाम गजेंद्र के बजाय अशोक गहलोत बनाम मोदी बन चुका है।

बीजेपी ने भी जोधपुर में ताक़त झोंक दी है। मोदी की रैली के बाद अमित शाह का रोड शो होगा और हेमा मालिनी भी प्रचार करेंगी। आरएसएस और बीजेपी के लिए भी गजेंद्र शेखावत को जिताना साख का सवाल बन गया है। बीजेपी राजस्थान में शेखावत को वसुंधरा राजे के विकल्प के रूप में देख रही है। 

विधासनभा चुनाव से पहले भी शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की कोशिश पार्टी ने की थी, लेकिन राजे के विरोध के चलते पीछे हटना पड़ा था। इसी वजह से जोधपुर में शेखावत समर्थकों को डर है कि राजे के समर्थक विधायक और पूर्व विधायक कहीं उम्मीद पर पलीता न लगा दें।

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एयर स्ट्राइक, राष्ट्रवाद पड़ रहे भारी

कांग्रेस की चुनौती जोधपुर में ही नहीं है। मेवाड़ से लेकर हाड़ौती और मारवाड़ में कांग्रेस प्रत्याशियों का मुक़ाबला बीजेपी प्रत्याशी के बजाय सीधे मोदी से है। राजस्थान की एक हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा पाकिस्तान से जुड़ी है। यही वजह है कि बालाकोट में एयर स्ट्राइक से लेकर सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे के सामने कांग्रेस सरकार की किसानों की कर्जमाफ़ी से लेकर राहुल गाँधी के न्यूनतम आय की गारंटी के मुद्दे की धार कुंद नज़र आ रही है। हालाँकि बीजेपी ने ज़्यादातर मौजूदा सासंदों को ही फिर से मैदान में उतारा है, इस वजह से बीजेपी के अधिकतर प्रत्याशी ख़ुद के ख़िलाफ़ एंटी इनकमबेंसी से जूझ रहे हैं।

असरदार है मोदी फ़ैक्टर

राज्य में मोदी सरकार के चार मंत्रियों की प्रतिष्ठा दाँव पर है। जयपुर ग्रामीण से केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का मुक़ाबला कांग्रेस की कृष्णा पूनिया से है। राज्यवर्धन और कृष्णा दोनों ओलंपियन खिलाड़ी हैं। जाट बाहुल्य इस लोकसभा क्षेत्र में राज्यवर्धन राठौड़ को कृष्णा पूनिया टक्कर दे रही हैं। इसी तरह पाली की सीट पर केंद्रीय मंत्री पीपी चौधरी को टक्कर दे रहे हैं कांग्रेस के बद्री जाखड़। पीपी चौधरी को टिकट के वक़्त अपनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। एंटी इनकंमबेंसी भी है। बावजूद मोदी फैक्टर असर कर रहा है।
राज्य में क़रीब आधी सीटों पर मुक़ाबले में कांग्रेस के लगातार पिछड़ने की एक वजह ख़राब टिकट वितरण भी है। विधानसभा चुनाव की तरह ही लोकसभा चुनाव में भी गहलोत, पायलट और सीपी जोशी ने जीत के बजाय अपनी पसंद के लोगों को टिकट दिलाने को प्राथमिकता दी।

उदासीन दिख रहे सचिन पायलट

कांग्रेस के लगातार पिछड़ने की दूसरी वजह सचिन पायलट का चुनाव प्रचार में ज़्यादा सक्रिय नहीं होना भी है। राजस्थान कांग्रेस के मुखिया होने के बावजूद पायलट राजस्थान से ज़्यादा दूसरे राज्यों में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। हालाँकि एकजुटता का संदेश देने के लिए गहलोत अपने साथ रैलियों में पायलट को ले जा रहे हैं। पायलट की इस उदासीनता के चलते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में आए गुर्जर समुदाय के वोट बैंक में बीजेपी की सेंध लगने का ख़तरा भी कांग्रेस को है।

आदिवासी बहुल सुरक्षित सीटें डूंगरपुर-बांसवाड़ा और उदयपुर सीट पर भारतीय ट्राइबल पार्टी कांग्रेस का गणित बिगाड़ रही है। इस पार्टी के दो विधायक हैं। कांग्रेस की उम्मीद उन सीटों पर टिकी है जहाँ अनूसूचित जाति-जनजाति और मुसलिम समुदाय के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।

आज की तारीख़ में नागौर, सीकर, दौसा, टोंक-सवाईमाधोपुर, करौली- धौलपुर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर जैसे चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस को या तो बढ़त है या फिर वह तगड़े संघर्ष में हैं। राजस्थान में कांग्रेस को बढ़त मिल सकती थी और वह बीजेपी से काफ़ी सीटें छीन सकती थी पर ऐसा लगता नहीं है। ऐसे में राज्य में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की साख दाँव पर लगी है। 

दुर्गा प्रसाद सिंह
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