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शाहीन बाग़ की महिलाओं के चरित्र पर लाँछन लगाने वाले लोग कौन?

नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ में 15 दिसंबर से महिलाओं के नेतृत्व में प्रदर्शन शुरू हुआ। अब ऐसा ही प्रदर्शन देश भर में फैलता जा रहा है। दुनिया के मीडिया की नज़र शाहीन बाग़ पर है। इस बीच सरकार के लिए परेशानी का सबब बन चुके ‘शाहीन बाग़’ के बारे में 16 जनवरी को अचानक सोशल मीडिया पर एक हैशटैग तैरने लगा। ‘#बिकाऊऔरते_शहीनबागकी’। बहुत दुखद आश्चर्य हुआ।

जब इसके पीछे की कहानी समझने की कोशिश की तो पाया कि एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें दो लड़के बात कर रहे हैं। बात कर रहे हैं शाहीन बाग़ में हो रहे विरोध-प्रदर्शन को लेकर। विरोध हो रहा है नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए, देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी, और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर में जोड़े गए कुछ ग़ैर ज़रूरी और नुक़सानदेह सवालों को लेकर।

पहली नज़र में हैशटैग को लेकर कुछ लिखना-पढ़ना अटपटा लग सकता है, लेकिन ऐसे वक़्त में जब हैशटैग समाचारों की हेडलाइनों को निर्धारित करता हो, इन्हें नज़रअंदाज़ करना न सिर्फ़ मूर्खता है बल्कि ग़लत धारणाओं को बढ़ावा देना भी है। अब अपने मूल विषय पर लौटते हैं। 

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यूँ तो इस विरोध को खारिज करने के लिए कई तरीक़े के नैरेटिव चलाए गए। सबसे पहले कहा गया कि यह सिर्फ़ मुसलमानों के द्वारा किया गया  विरोध है। फिर देखा कि वहाँ अरदास, बाइबल, क़ुरान का पाठ, हवन सब चल रहे हैं। फिर कहा गया ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ और ‘अर्बन नक्सल’ का विरोध है। इस कथित गैंग में खेल, फ़िल्म, साहित्य, तकनीक से जुड़े कई लोग शामिल होने लगे। गैंग बढ़ता जा रहा है तो नैरेटिव बदलना पड़ा। तब कहा गया कि ये महिलाएँ पैसे लेकर आ रही हैं। ऐसे वीडियो के आधार पर जिसकी पुष्टि बिल्कुल नहीं की जा सकती है। ध्यान रहे इस वीडियो को सही मानने वाले वही लोग हैं जो जेएनयू मामले में ‘इंडिया टुडे’ टीवी के स्टिंग पर विश्वास नहीं कर रहे हैं।

खैर! ‘बिकाऊ औरत’ शब्द अपने समाज में ऐसी औरतों के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो देह व्यापार करती हों। देह व्यापार की नुक्ताचीनी के बिना एक बात तो तय है कि इस शब्द को समाज में बेइज़्ज़ती के तौर पर देखा जाता है।

क्या सरकार की किसी नीति के ख़िलाफ़ खड़ी औरतों के ख़िलाफ़ ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित है? यह हैशटैग 30000 से ज़्यादा बार ट्वीट हुआ। सबको पता है कि यह बीजेपी के आईटी सेल का संगठित प्रयास है।

हम बहस के किसी भी तरफ़ हो सकते हैं- यह मुद्दा नहीं है। यह अधिकार सब के पास है। लेकिन क्या एक सभ्य समाज में एक सभ्य बहस की गुँज़ाइश अब नहीं बची है? क्या अब बिना किसी अपमानजनक टैग के कोई सवाल नहीं कर सकता?

क्या इस हद तक गिर जाना वैचारिक दिवालियापन की हद नहीं है? एक समाज के तौर पर क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं?

इनमें से कई लोग हैं जिन्हें हमारे माननीय प्रधानमंत्री और कई मंत्री फ़ॉलो करते हैं। किसी को फ़ॉलो करना न करना निजी मामला हो सकता है, लेकिन जब आप एक पद पर हैं तो आपकी यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि देश, समाज में एक सही संदेश जाए। आप विकृत सोच वाले महिला विरोधी हैंडल को फ़ॉलो करके क्या संदेश देना चाहते हैं? महिला पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य विचार रखने वाली महिलाओं को खुलेआम बलात्कार की धमकी दी जाती है उन्हीं हैंडल से जिसे प्रधानमंत्री फ़ॉलो करते हैं। क्या हम अपने प्रधानमंत्री से न्यूनतम शिष्टता की उम्मीद नहीं कर सकते? क्या महिलाओं के प्रति आदर की उम्मीद ज़्यादा है? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री का एक कथित बयान आया है कि फ़ार्मा कंपनी को घूस के रूप में महिला पेश किया जाता है। घूस के रूप में महिला? महिला क्या कोई वस्तु है जिसे घूस के रूप में दिया जा सकता है? इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की माँग के बावजूद न तो प्रधानमंत्री ने इस बयान का खंडन किया न ही प्रमाण दिया और न ही माफ़ी माँगी। ऐसे में आईटी सेल द्वारा ऐसा ट्रेंड चलाना ज़्यादा आश्चर्यचकित नहीं करता।

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जब-जब औरतें अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती हैं उनको चुप कराने का सबसे पहला हथियार होता है उनके चरित्र पर हमला। यह सोच अचानक नहीं बनी। हमारे आसपास कोई महिला अपने पेशे में अत्यंत सफल होती है अक्सर कोई न कोई कहानी बना दी जाती है कि वह कैसे सफल हुई है। पितृसत्ता की इतनी गहरी पैठ है मन में कि यह पचता ही नहीं कि महिलाएँ भी अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर आगे बढ़ें। ज़रूरत है कि अब आम बोलचाल से लेकर राष्ट्रीय विमर्श तक इस बात का ध्यान रखा जाए कि महिलाओं को मुद्दे पर आधारित, तर्क पर आधारित जवाब दिया जाए। अपनी सुविधा की नैतिकता थोपना बंद किया जाए। और, सबसे ज़रूरी है कि अपना मुँह खोला जाए।

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पाइक कुमार
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