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कश्मीर में पाबंदी, प्रेस का ‘सरेंडर’; क्या लोकतंत्र ख़तरे में नहीं?

मैंने ‘इमरजेंसी’ देखी थी और झेली थी, इसलिए यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसे हालात ‘इमरजेंसी’ में भी नहीं थे। क्योंकि सेंसरशिप का प्रतिरोध जारी था। आज जैसा संपूर्ण (सरेंडर) नहीं था! जिस तरह कुछ राजनीतिक विचारधाराएँ लोकतंत्र में यक़ीन नहीं करतीं। असहमति को अपराध मानती हैं। ठीक उसी तरह आज के मीडिया के बड़े हिस्से में यह प्रवृत्ति साफ़ देखी जा सकती है। 
उर्मिेलेश

कश्मीर और कश्मीरी आज ख़बर के विषय हैं पर विडम्बना देखिये, उन्हें अपनी ख़बर भी नहीं मिल रही। शेष भारत को उनकी ख़बर कैसे मिलेगी, जब उन्हें भी नहीं मिल रही जो स्वयं ख़बर हैं। आज से 44-45 साल पहले ख़बरों पर इमरजेंसी के दौरान भी पाबंदी लगी थी। औपचारिक तौर पर सेंसरशिप थी। लेकिन उस दौर में भी देर-सबेर लोगों को ख़बरें मिल रही थीं। अख़बार छप रहे थे। आज की तरह निजी न्यूज़ चैनलों का अंबार नहीं था, सिर्फ़ एक दूरदर्शन था। वह आज ही की तरह तब भी सत्ता-भजन में जुटा रहता था। निरंकुशता के उस दौर में भी हिन्दी, अंग्रेज़ी और अन्य भारतीय भाषाओं के कुछेक ऐसे अख़बार थे, जो सेंसरशिप से जूझ रहे थे और अपने तरीक़े से चुनौती दे रहे थे। इनमें कुछ प्रतिरोध-स्वरूप अपने संपादकीय कॉलम खाली रखते थे। ‘काला बॉर्डर’ देकर संपादकीय का स्थान खाली छोड़ देते थे। लेकिन आज तो कश्मीर में अख़बार ही नहीं छप रहे हैं। अख़बारों के प्रकाशन पर बड़े सुनियोजित ढंग से पाबंदी लगी हुई है। सूचना के आदान-प्रदान या प्रेषण के सारे तकनीकी-माध्यम ठप्प कर दिये गए हैं। कुछेक न्यूज़ चैनल चलते हैं तो वे वही दिखाते-सुनाते हैं, जो सरकार चाहती है। बाक़ी के केबल कनेक्शन और प्रसारण के अन्य माध्यम ठप्प हैं।

सियासत से ख़ास

कश्मीर में प्रेस पर पाबंदी और भारतीय प्रेस परिषद

पर विडम्बना देखिए, भारतीय प्रेस परिषद (प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया), जिसकी स्थापना ही प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए वर्ष 1966 में की गई थी, उसने कश्मीर में प्रेस की आज़ादी पर पाबंदी के सरकारी फ़ैसले को पूरी तरह जायज़ ही नहीं ठहराया है, इसके लिए वह बाकायदा सुप्रीम कोर्ट जा चुका है। प्रेस पर पाबंदी के विरुद्ध दायर एक संपादक की याचिका के संदर्भ में उसने हस्तक्षेप-याचिका दायर किया है कि कश्मीर में राष्ट्रीय हितों के मद्देनज़र प्रेस पर पाबंदी लगाना ज़रूरी था। इसी मंगलवार को प्रेस पर पाबंदी के ख़िलाफ़ दायर मूल याचिकाओं पर कोर्ट में सुनवाई होनी है। जम्मू-कश्मीर के मशहूर अख़बार ‘कश्मीर टाइम्स’ (जम्मू और श्रीनगर से प्रकाशित) की संपादक अनुराधा भसीन ने अपनी याचिका में साफ़ तौर पर कहा है कि प्रेस पर लगी पाबंदी पूरी तरह अलोकतांत्रिक और ग़ैर-संवैधानिक है। यह स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है। इसके चलते वह अपना अख़बार नहीं छाप पा रही हैं और कश्मीर के लोगों तक किसी तरह की सूचना नहीं पहुँच रही है। शासन का यह क़दम उनके प्रोफ़ेशनल दायित्व को बाधित कर रहा है। 

अपनी याचिका में संपादक ने कहा कि कश्मीर में मोबाइल, इंटरनेट और लैंडलाइन सेवाओं को फौरन बहाल किया जाए, जिससे प्रेस और आम नागरिक अपना काम कर सकें। लेकिन प्रेस काउंसिल ने अपनी हस्तक्षेप याचिका में दलील दी है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त किये जाने के बाद वहाँ के हालात को देखते हुए राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा के लिए संचार-व्यवस्था पर पाबंदी लगाना ज़रूरी हो गया था।

सवाल उठता है, प्रेस काउंसिल का अपना वैधानिक और बुनियादी दायित्व क्या है? राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा के लिए देश के पास अनेक संस्थाएँ और एजेंसियाँ हैं। प्रेस काउंसिल को क्या उन संस्थाओं और एजेंसियों पर भरोसा नहीं कि वे अपना काम बखूबी कर रही हैं और कर सकती हैं?

दूसरे निकायों के दायरे में प्रेस काउंसिल क्यों घुसना चाहती है? वह प्रेस की आज़ादी की रक्षा के अपने बुनियादी दायित्व को क्यों छोड़ रही है? यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि वर्ष 1966 में प्रेस काउंसिल का गठन भारत के पहले प्रेस आयोग की सिफ़ारिशों की रोशनी में संसद में पारित एक क़ानून के तहत हुआ था। इसके दो बड़े मक़सद थेः प्रेस की आज़ादी की रक्षा और प्रेस के प्रोफ़ेशनल/व्यावसायिक स्तर पर नज़र रखते हुए उसकी गुणवत्ता में सुधार के लिए काम करना! सुप्रीम कोर्ट में दायर प्रेस काउंसिल की विवादास्पद हस्तक्षेप-याचिका के मद्देनज़र यह सवाल उठना लाज़िमी है कि वह इस याचिका के ज़रिये किस तरह अपने इन दो प्रमुख लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश कर रही है?

मुझे नहीं मालूम कि प्रेस काउंसिल के शीर्ष पदाधिकारियों ने यह याचिका दायर करने से पहले इस मुद्दे पर अपने कुल 28 सदस्यों, ख़ासतौर पर प्रेस जगत से निर्वाचित या नामांकित होकर बने 20 सदस्यों की राय ली? क्या काउंसिल के नाम पर सिर्फ़ सरकार द्वारा नामांकित कुछ लोगों ने ही हस्तक्षेप याचिका दायर करने का फ़ैसला कर लिया? अगर याचिका दायर करने से पहले काउंसिल ने अपनी बैठक नहीं बुलाई या सदस्यों की राय नहीं ली तो क्या उसका यह क़दम लोकतांत्रिक और वाजिब है? क्या बेहतर नहीं होता कि कश्मीर में प्रेस की मौजूदा स्थिति (पाबंदी के पक्ष में) कोई क़ानूनी पहल करने से पहले प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया कम से कम अपनी एक टीम सरहदी सूबे में भेजी होती? अपने इन क़दमों से प्रेस काउंसिल ने फ़िलहाल तो प्रेस की बजाय अपने आप को ‘सरकार की काउंसिल’ बना लिया है।

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मीडिया ख़ुद एक पक्ष बना

देश में बहुतेरे मीडिया समीक्षक और समाजशास्त्री अक्सर अपने देश, ख़ासकर हिन्दी भाषी क्षेत्र के हिन्दी-अंग्रेज़ी मीडिया को सरकार से डरा हुआ ‘गोदी मीडिया’ कहते हैं। मुझे लगता है, मौजूदा मीडिया के स्वरूप और चरित्र का यह बहुत वस्तुगत विश्लेषण नहीं है। यह सिर्फ़ डरा-डराया मीडिया नहीं है। इतने विशाल भारतीय मीडिया में डरे-डराये या सताये संस्थान भी कुछेक ज़रूर हैं। उन्हें सत्ता के समक्ष नतमस्तक होने के लिए बाध्य किया गया है या अब भी किया जा रहा है। पर मीडिया का बड़ा हिस्सा आज ख़ुद ही सत्ता का हिस्सा बना हुआ है। वह मौजूदा शासक-समूह के राजनीतिक-वैचारिक विमर्श से पूरी तरह सहमत ही नहीं, उसका सबसे ज़बर्दस्त प्रचारक बना हुआ है। सत्ता की नीतियों को देश भर में फैले सत्ताधारी दल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं से जितना प्रचार या जन-समर्थन हासिल होता है, उससे कहीं ज़्यादा इस मीडिया ब्रिगेड, ख़ासकर न्यूज़ चैनलों के एंकर्स-रिपोर्टरों से मिलता है। कश्मीर के मामले में भी यह सच है।

न्यूज़ चैनलों और ज़्यादातर अख़बारों ने लंबे समय से कश्मीर की रिपोर्टिंग या कश्मीर मामले में बहस चलाने के नाम पर सिर्फ़ और सिर्फ़ मौजूदा सत्ताधारियों के राजनीतिक-वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाया है। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से पहले और उसके बाद, यह सिलसिला लगातार जारी है। इस मायने में मीडिया एक स्वतंत्र संस्था या निकाय न होकर सत्ता-पक्ष का वैचारिक-बौद्धिक विस्तार बन गया है।

मैंने ‘इमरजेंसी’ देखी थी और झेली थी, इसलिए यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसे हालात ‘इमरजेंसी’ में भी नहीं थे। इमरजेंसी में कुछ लेखकों-पत्रकारों-प्रेस मालिकों की गिरफ्तारियाँ क्यों हुई थीं? क्योंकि सेंसरशिप का प्रतिरोध जारी था। आज जैसा संपूर्ण (सरेंडर) नहीं था!

और यह सिर्फ़ ‘सरेंडर’ ही नहीं, एक तरह की ‘एकरूपता’ है! मीडिया के बड़े हिस्से (हिन्दी भाषी क्षेत्र के हिन्दी-अंग्रेज़ी मीडिया) का सत्ता-पक्ष की वैचारिकी और राजनीति में समा जाना या एकरूप हो जाना, यह हमारे भारतीय समाज और मीडिया में एक नयी परिघटना है, जो बीते सात-आठ साल से घटित होते दिख रही थी। कुछ साल पहले यह रूपाकार हुई।

असहमति को मौजूदा मीडिया भी अपराध मानता है

जिस तरह कुछ राजनीतिक विचारधाराएँ लोकतंत्र में यक़ीन नहीं करतीं, असहमति को अपराध मानती हैं, ठीक उसी तरह आज के मीडिया के बड़े हिस्से में यह प्रवृत्ति साफ़ देखी जा सकती है। जिस तरह कुछ राजनीतिक शक्तियाँ लोकतांत्रिक संवैधानिकता की जगह धार्मिक बहुसंख्यकवाद और सैन्यवाद को अपना राजनीतिक मूल्य मानती हैं, ठीक उसी तरह इस नये क़िस्म के मीडिया में भी बहुसंख्यकवाद और सैन्यवाद हावी है। ‘सेना-पुलिस कभी ग़लत नहीं हो सकती,’ इस मिज़ाज और मानसिकता को हाल के वर्षों में ज़बर्दस्त ढंग से स्थापित किया गया है। याद कीजिए, वर्ष 2017 के अप्रैल महीने में चर्चित हुई उस तसवीर को जब कश्मीर घाटी में एक सैन्य जीप के बोनट पर बांधकर एक निर्दोष कश्मीरी  युवक फारूक डार को लंबे समय तक घुमाया गया था। उस कृत्य के लिए एक मेजर जिम्मेदार रहा। न्यूज चैनलों के बड़े हिस्से ने उसे नायकत्व प्रदान किया। हालाँकि जम्मू कश्मीर स्थित उत्तरी सैन्य कमान के प्रमुख रह चुके लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) डी. एस. हुड्डा जैसे शीर्ष सैन्य कमांडर ने भी इस तरीक़े को क़ानूनी तौर पर ग़लत और अवांछनीय माना था (स्क्राल.इन, 21 अप्रैल, 2017)। पर टीवी चैनलों के बड़े हिस्से ने उस घटना का ज़बर्दस्त महिमामंडन किया और मानवाधिकार हनन की दलीलों की ख़ूब खिल्ली उड़ाई। कुछ ही दिनों बाद वही मेजर श्रीनगर के एक होटल में संदिग्ध अवस्था में पकड़ा गया। उस पर सैन्य-कोर्ट के हिसाब से कार्यवाही चलानी पड़ी। चैनलों ने इस मामले में चूँ नहीं की! सिर्फ अख़बारों या वेबसाइटों पर ख़बरें आईं।

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शेहला रशीद के ट्वीट पर हंगामा

अभी हाल में एक दिलचस्प प्रकरण सामने आया। कश्मीरी युवा राजनीतिक कार्यकर्ता शेहला रशीद ने अपने एक ट्वीट के ज़रिए कहा कि घाटी में सुरक्षा बल से जुड़े लोग कश्मीरी लोगों के मानवाधिकारों का बुरी तरह हनन कर रहे हैं। घरों में घुसकर लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। उनके इस ट्वीट पर न्यूज़ चैनलों ने भारी बावेला मचाया। एक वकील साहब ने शेहला के ख़िलाफ़ कोर्ट में भी मामला भी दर्ज करा दिया। फिर क्या, वकील साहब रातों-रात टीवी चैनलों पर स्टार-पैनेलिस्ट के तौर पर बुलाए जाने लगे। उन चर्चाओं में कोई नहीं दिखा तो वह थीं, शेहला रशीद। बाद में शेहला ने मीडिया से मुलाक़ात में अपने ट्वीट संदेश को सही ठहराते हुए उसका बचाव किया और कहा कि चूँकि उनके बयान का सेना की तरफ़ से खंडन आया है तो क्यों नहीं इस मामले में जाँच बैठाई जाती है? वह हर जाँच के लिए तैयार हैं और अपनी बात के पक्ष में ठोस सबूत पेश करेंगी। उक़्त प्रेस बीफ्रिंग में न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टर (या ‘बाइट-कलेक्टर!’) शेहला पर लगातार बरसते रहे। उन्हें सुनने की बजाय वे उन्हें कोसते रहे और सेना का बचाव करते रहे। इतने सारे जन संपर्क अधिकारियों और अन्य संसाधनों से सज्जित हमारी सेना क्या अपना बचाव करने में स्वयं समर्थ नहीं है?

कुछ साल पहले तक ऐसा अंधा मीडिया-परिदृश्य नहीं था।

न जाने कितनी बार भारतीय मीडिया ने पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर आदि में मानवाधिकार हनन के गंभीर मामलों को कवर किया है। मणिपुर में शर्मिला चानू चुनाव भले हार गईं पर मानवाधिकार हनन के उनके उठाए मुद्दों की अनुगूंज भारतीय मीडिया में कभी अनदेखी नहीं की गई। उनके सारे आरोप तो सुरक्षा बलों (असम राइफ़ल्स) पर ही थे। अगर उन्होंने सवाल न उठाए होते तो टी मनोरमा बलात्कार-हत्याकांड का सच लोगों के सामने कैसे आता? ऐसे कुछ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी क़दम उठाए और जाँच के आदेश दिए। हाँ, यह बात सही है कि ऐसे मामलों में हिन्दी मीडिया का रिकॉर्ड पहले से ख़राब रहा पर अँग्रेज़ी, बांग्ला, तेलुगू, असमिया, उर्दू और मलयालम में ऐसी कथाएँ लगातार छपती और प्रसारित होती रही हैं। 

आज हालात ऐसे बन या बना दिए गए हैं कि मानवाधिकार हनन की बात करना भी गुनाह या राष्ट्रद्रोह जैसा हो गया है! इस तरह का माहौल बनाने में मीडिया, ख़ासकर न्यूज़ चैनल कम गुनहगार नहीं।

इसके पीछे मीडिया-मालिकों के सिर्फ़ व्यावसायिक हित या उन पर पड़ने वाले दबाव ही कारक नहीं हैं, इन्हें संचालित करने वाले पत्रकारों की सोच का अपना समाजशास्त्र भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। उनमें ज़्यादातर पत्रकार सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं से भी ज़्यादा उग्रता के साथ सत्ता-विमर्श और उसकी वैचारिक-संस्कृति के साथ हैं।

सवाल लोकतंत्र के वजूद का है

कश्मीर के मौजूदा हालात और मीडिया कवरेज के संदर्भ में 24 अगस्त का घटनाक्रम कम महत्वपूर्ण नहीं है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, विपक्ष के अन्य नेतागण शरद यादव, सीताराम येचुरी, डी. राजा और मनोज झा आदि का प्रतिनिधिमंडल घाटी के हालात का जायजा लेने श्रीनगर गया था। साथ में कुछ पत्रकार भी गए। पर सरकार के निर्देश पर सुरक्षा बलों ने सबको एयरपोर्ट पर ही रोक दिया और वापस दिल्ली जाने के लिए मजबूर कर दिया। मज़े की बात है कि सरहदी सूबे के उत्साही गवर्नर सत्यपाल मलिक ने कुछ ही दिनों पहले राहुल गाँधी को न्योता दिया था कि वे आएँ और देखें कि कश्मीर के हालात कितने अच्छे हैं। सरकार उन्हें जहाज़ और हेलिकॉप्टर उपलब्ध करा देगी। पर मेहमान नवाजी की बजाय मेहमानों को बैरंग वापस जाने को कह दिया गया। 

पत्रकारों, यहाँ तक कि कुछ महिला पत्रकारों के साथ सुरक्षा बलों की तरफ़ से बदसलूकी तक की गई। कुछ देर के लाइव प्रसारण में यह सब दिखा। पर अचरज कि मीडिया ने विपक्षी नेताओं के विफल किए कश्मीर दौरे को ‘कवर’ ही नहीं किया। दुनिया के किस लोकतांत्रिक देश में संपूर्ण विपक्ष की किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्रवाई को इस तरह नज़रअंदाज़ किया जाता है? पत्रकारों के साथ बदसलूकी तक को ढँक दिया जाता है। अच्छी बात सिर्फ़ यह रही कि किसी चैनल ने श्रीनगर गए विपक्षी नेताओं और बदसलूकी की शिकार महिला पत्रकार को अब तक ‘देशद्रोही’ नहीं बताया! आज माहौल कुछ ऐसा बन गया है, मानो सत्ता से असमत हर व्यक्ति भारत-विरोधी या आतंकवाद-समर्थक हो! ऐसे दौर में निस्संदेह लोकतंत्र अभूतपूर्व ख़तरे में है। यह सिर्फ़ कश्मीर तक सीमित मामला नहीं है, यह भारत के लोकतंत्र के जीवन का सवाल है।

उर्मिेलेश
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