loader
फ़ोटो साभार: फ़ेसबुक/इन इंडियन सिटिज़न इन

चमड़ी के रंग के आधार पर भारतीय-अमेरिकियों से भेदभाव!

ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित, उदार और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग माने वाले देशों में क्या भेदभाव और नस्ली भेदभाव की कल्पना की जा सकती है? लेकिन हाल की रिपोर्टें इस सच्चाई को उजागर करती हैं। पहले ब्रिटेन से एक ख़बर आई थी कि वहाँ संस्थागत रूप में नस्ली भेदभाव है और काले आप्रवासियों या विदेशियों को महारानी एलिज़ाबेथ के यहाँ केवल सेवकों के रूप में तो रखा जाता था, दफ़्तरी कर्मचारियों के रूप में नहीं। अब अमेरिका से एक सर्वे की रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि भारतीय मूल के अमेरिकियों के साथ नियमित रूप से भेदभाव होता है।

दो दिन पहले ही जारी किए गए एक सर्वे के अनुसार, अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों को नियमित रूप से भेदभाव और ध्रुवीकरण का सामना करना पड़ता है। यह सर्वे पिछले साल के अनुभव के आधार पर है यानी यह उस दौरान का है जब डोनल्ड ट्रंप की सरकार थी।

ताज़ा ख़बरें

रिपोर्ट के निष्कर्ष अमेरिका में 1,200 भारतीय-अमेरिकी निवासियों के एक राष्ट्रीय ऑनलाइन सर्वेक्षण पर आधारित है। 1 सितंबर से 20 सितंबर 2020 के बीच इस सर्वे को किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, 'भारतीय-अमेरिकियों को नियमित रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पिछले एक साल में हर दो भारतीय अमेरिकियों में से एक के साथ भेदभाव किया गया है। भेदभाव के सबसे सामान्य रूपों में चमड़ी के रंग के आधार पर भेदभाव शामिल है।

रिपोर्ट में कहा गया है, 'कुछ हद तक आश्चर्यजनक रूप से विदेश में पैदा हुए भारतीय-अमेरिकियों की तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा हुए भारतीय-अमेरिकियों को भेदभाव के शिकार होने की अधिक संभावना होती है।' बता दें कि अमेरिका में सबसे ज़्यादा आप्रवासियों की संख्या के मामले में भारतीय-अमेरिकी दूसरे स्थान पर हैं। 2018 के आँकड़ों के अनुसार अमेरिका में भारतीय मूल के क़रीब 42 लाख लोग रहते हैं। 

इस सर्वे रिपोर्ट के तथ्यों को ऐसे ही खारिज नहीं किया जा सकता है। सर्वे करने वाली एजेंसियाँ काफ़ी ख्यात और प्रतिष्ठित हैं। न्यूज़ एजेंसी 'पीटीआई' की रिपोर्ट के अनुसार, इस रिपोर्ट को 'भारतीय अमेरिकियों की सामाजिक वास्तविकता: 2020 भारतीय अमेरिकी दृष्टिकोण सर्वेक्षण के परिणाम' के नाम से जारी किया गया है। इसे कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस, जॉन्स हॉपकिन्स-एसएआईएस और पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के सहयोग से तैयार किया गया है।
चमड़ी के रंग या जाति के आधार पर भेदभाव एक तरह से नस्ली भेदभाव की तरह ही है। वैसे, अमेरिका में नस्ली भेदभाव की रिपोर्टें जब तब आती रही हैं।
जब एक काले जॉर्ज फ्लॉयड की एक गोरे पुलिसकर्मी द्वारा हत्या कर दी गई थी तब यह मामला काफ़ी ज़्यादा उछला था। इसको लेकर ट्विटर पर 'ब्लैक लाइव मैटर्स' से अभियान चला था। तब एक के बाद एक नस्ली भेदभाव के रूप में पुलिस ज़्यादती की ही ऐसी रिपोर्टें छपीं जो असहज करने वाली थीं। 
survey says indian americans regularly face discrimination - Satya Hindi
अभी कुछ दिन पहले ही नस्ली भेदभाव की ऐसी ही एक ख़बर ब्रिटेन में छपी। वहाँ के प्रतिष्ठित अख़बार गार्डियन को ब्रिटेन के राष्ट्रीय अभिलेखागार से एक दस्तावेज़ हाथ लगा जिसमें साफ़ लिखा है कि काले आप्रवासियों या विदेशियों को महारानी एलिज़ाबेथ के यहाँ केवल सेवकों के रूप में तो रखा जाता था, दफ़्तरी कर्मचारियों के रूप में नहीं। मार्च 1968 का यह दस्तावेज़ गृहमंत्री जेम्स कैलहन के नस्ली भेदभाव से संबंधित विधेयक के लिए बनी कैबिनेट समिति की रिपोर्ट है। ब्रिटेन में उन दिनों लेबर पार्टी की सरकार थी और प्रधानमंत्री हैरल्ड विल्सन नस्ली भेदभाव को सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ रोज़गार और सेवा क्षेत्र से भी हटाना चाहते थे। विधेयक पर बहस कराने के लिए महारानी की स्वीकृति लेनी ज़रूरी थी और महारानी ने अपने कर्मचारियों की नियुक्ति को नए क़ानून के दायरे से बाहर रखने का प्रबंध होने के बाद स्वीकृति दी थी।
दुनिया से और ख़बरें

इस रहस्योद्घाटन ने बोरिस जॉनसन सरकार के इन दावों पर फिर से सवालिया निशान लगा दिए हैं कि ब्रिटेन में अब संस्थागत रूप में नस्ली भेदभाव नहीं बचा है। पिछले मार्च में ही नस्ली और जातीय विषमता आयोग ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए दावा किया था कि जातीय अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव में अब ब्रितानी व्यवस्था का कोई हाथ नहीं है। आयोग का कहना था कि जातीय अल्पसंख्यकों के बच्चे स्कूली शिक्षा में श्वेत बहुसंख्यकों के बराबर हैं। लगभग बराबरी के अवसर मिल रहे हैं और वेतन का अंतर भी घटकर मात्र 2.3% ही रह गया है। रुकावटें और विषमताएँ हैं। लेकिन उनकी वजहें नस्लवाद के बजाय पारिवारिक प्रभाव, आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि, धर्म और संस्कृति हैं।

survey says indian americans regularly face discrimination - Satya Hindi

हाल के महीनों में भी ब्रिटेन के राजघराने में नस्ली भेदभाव संबंधी ख़बरें छपीं जब महारानी की छोटी पौत्रवधू मैगन मार्कल का मामला सामने आया। अफ़्रीकी मूल की अमेरिका निवासी डोरिया रैगलैंड और श्वेत अमेरिकी टॉमस मार्कल की बेटी मैगन जब तीन साल पहले ब्रितानी महारानी की पौत्रवधू बन कर विंडसर प्रासाद में आई थी तो उसे ब्रितानी राजघराने की बदलते समाज और वक़्त के साथ चलने की कोशिश के रूप में देखा और सराहा गया था। लेकिन ओपरा विन्फ़्रे के इंटरव्यू के बाद तहलका मचा दिया। इंटरव्यू में  मैगन ने कहा था कि राजघराने के कुछ लोगों को इस बात की परेशानी रहती थी कि बड़ा होकर उनके बेटे आर्ची का रंग कैसा होगा – साँवला या गोरा? 

उदार समाज और देश के रूप में पेश किए जाने वाले ब्रिटेन और अमेरिका के संबंध में ये ख़बरें उनके उन दावों को खारिज करती हैं जिसमें वहाँ की सरकारें दावा करती रही हैं कि चमड़ी के रंग या नस्ल के आधार पर उनके यहाँ भेदभाव नहीं होता है।

सत्य हिन्दी ऐप डाउनलोड करें

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

दुनिया से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें