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यूएस-चीन व्यापार युद्ध; दुनिया में चीन का सिक्का तो भारत कहाँ टिकेगा?

अमेरिका में 2020 में राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। राष्ट्रपति ट्रंप को इस बार फिर प्रयास करना है कि वह दोबारा चुने जाएँ। इसके लिए वह दो चीजें करना चाहते हैं। एक, दुनियाभर में जो अमेरिकी सैनिक कई जगह तैनात हैं, जैसे अफ़ग़ानिस्तान, उनको वह चुनाव से पहले वापस बुला लें। दूसरा, ट्रंप चाहते हैं कि वह चीन और ईरान के साथ एक नई संधि करें जिससे वह मतदाताओं के सामने जाएँ तो जो उनका नारा है ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ उसको फिर से लोगों के समर्थन में बदल सकें।
शीतल पी. सिंह

फ़्रांस में इस रविवार और सोमवार को जी-7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मीटिंग के बाद राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका लौट गए हैं। यहाँ आने से ठीक पहले शुक्रवार को उन्होंने चीन के साथ चल रहे व्यापारिक युद्ध में कुछ नए टैरिफ़ बढ़ाने की घोषणा करके सनसनी पैदा कर दी थी।

शनिवार और रविवार को दुनिया के शेयर बाज़ार बंद रहते हैं इसलिए उसका असर सोमवार को देखने को मिला। जब युवान डिवैल्यूवेशन के बाद नीचे चला गया और उसके बाद तमाम एशियाई करेंसी नीचे चली गईं। राष्ट्रपति ट्रंप पर जी-7 के देशों की ओर से दबाव बढ़ने लगा कि वह इस मामले का हल निकालें। तमाम इधर-उधर की बातों के बाद वापसी से ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रम्प ने शेखी बघारी कि चीन वार्ता की टेबल पर आने को तैयार हो गया है। दुनिया भर के शेयर बाज़ार इस घोषणा के बाद अगले दिन कुछ सुधरे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालने वाली यह सबसे बड़ी परिघटना है जो पिछले साल की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की एकतरफ़ा चीन के अमेरिका को निर्यात पर टैरिफ़ बढ़ाने के एलान से पैदा हुई थी।

क़रीब बीस महीनों में दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के इस व्यापार युद्ध ने दुनिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। चीन को सोयाबीन निर्यात का सौदा अमेरिका की जगह अपनी मुट्ठी में करने के लिए ब्राज़ील दुनिया के फेफड़ों (अमेजन के जंगलों) को तहस-नहस कर रहा है। ‘ग्रीस’ के क्षेत्रफल के बराबर जंगलों पर उसने आरा चला भी दिया है और दुनिया उसको रोक न सके इसलिये जंगल के एक बड़े हिस्से में उसने दुनिया की सबसे बड़ी आग लगा दी है! सोयाबीन के विकल्प के तौर पर चीन ने कुछ हिस्से के लिए पामऑयल की डिमांड निकाल दी है जिसका फ़ायदा इंडोनेशिया को हुआ दीखता है। अक्टूबर से वह चीन को पिछले सालों के मुक़ाबले क़रीब तीन सौगुना ज़्यादा पामऑयल सप्लाई करने जा रहा है।

ट्रंप की असल चिंता

दरअसल, अमेरिका में 2020 में राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। राष्ट्रपति ट्रंप को इस बार फिर प्रयास करना है कि वह दोबारा चुने जाएँ। इसके लिए वह दो चीजें करना चाहते हैं। एक, दुनियाभर में जो अमेरिकी सैनिक कई जगह तैनात हैं, जैसे अफ़ग़ानिस्तान, उनको वह चुनाव से पहले वापस बुला लें। दूसरा, वह चाहते हैं कि चीन के साथ और ईरान के साथ एक नई संधि करें जिससे वह मतदाताओं के सामने जाएँ तो जो उनका नारा है ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ उसको फिर से लोगों के समर्थन में बदल सकें।

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ट्रंप ने खेला दाँव 

इस क्रम में पहला दाँव उन्होंने ईरान से ओबामा प्रशासन की हुई ऐतिहासिक डील को ‘दो कौड़ी’ का बताकर खेला था जो अभी तक उनके अनुकूल नहीं पड़ा और चुनाव के समय तक उसमें कोई जादू होने की संभावना भी नहीं है। बल्कि फ़्रांस और जर्मनी ने उन्हें इस मामले में अधर में छोड़ दिया है। इसके बाद उन्होंने उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति से ऐतिहासिक मुलाक़ात करके एक नया प्लेटफ़ॉर्म खोला लेकिन दो बार आमने-सामने की बैठक और फ़ोटो सेशन के बावजूद उत्तर कोरिया जापान के आकाश से होकर परीक्षण मिसाइल समुद्र में उस पार कर रहा है। इसी को देखते हुए उन्होंने पिछले वर्ष की शुरुआत में ही चीन के ख़िलाफ़ व्यापार युद्ध का नया मोर्चा खोल दिया।

इस विवाद को खड़ा करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने जो केस बनाया उसमें दम नहीं था, क्योंकि जो बात वह अमेरिका के लिए कह रहे थे वह दरअसल सारी दुनिया पर लागू होती है। अमेरिका क़रीब 3.1 ट्रिलियन यूएस डॉलर का आयात सालाना करता है और 2.5 मिलियन डॉलर का निर्यात करता है। इस तरह क़रीब 0.6 ट्रिलियन डॉलर का उसको हर साल व्यापार घाटा हो रहा है। उसका चीन को निर्यात क़रीब 120 बिलियन यूएस डॉलर का है और चीन से जो वह अपने यहाँ आयात करता है वह क़रीब 540 बिलियन यूएस डॉलर का है। इस आयात-निर्यात में भारी अंतर है। यानी जो भी अमेरिका का व्यापार घाटा है उसमें चीन के साथ उसके व्यापार का बहुत बड़ा रोल है- क़रीब 67%।

अमेरिका के जो दुनिया भर में फैले व्यापार हैं उसमें सप्लाई चेन में चीन के उत्पादकों का भी बहुत बड़ा रोल है। अमेरिका के हर छोटे बड़े ब्रांड की फ़ैक्ट्री चीन में इसलिए है क्योंकि जिस लागत पर चीन उनको उत्पादन करके दे रहा है वह कहीं और संभव नहीं है।

वर्ष 2018 में भारत का चीन को निर्यात कुल 16.5 बिलियन यूएस डॉलर था और चीन का हमारे देश को निर्यात 83 बिलियन डॉलर से भी ज़्यादा था। हमें क़रीब 57 बिलियन डालर का व्यापार घाटा था। फ्रांस का इसी वर्ष चीन को निर्यात कुल 24.5 बिलियन यूएस डॉलर था जबकि चीन से आयात 52.9 बिलियन यूएस डॉलर था।

दुनिया के ज़्यादातर देशों का चीन से व्यापार में यही हाल है क्योंकि चीन ने अपने आपको एक लंबी प्रक्रिया के बाद ‘दुनिया की फ़ैक्ट्री’ में बदल लिया है। इसलिए चीन से देशों को व्यापार घाटा होने की वजह को ठीक चुनाव से पहले एक-दो साल में लफ़्फ़ाजी या शेखी बघारने से नहीं बदला जा सकता। उसके लिए दीर्घकालिक अनवरत प्रयास और बहुत बड़ी पूँजी की दरकार है।

अमेरिका ने चीन के निर्यात पर अब तक जो अतिरिक्त टैरिफ़ लगाए हैं वे अमल में आज और निकट भविष्य में कुछ इस तरह प्रभावी हैं/होंगे।

जनवरी 2018- 3.1%

फ़िलहाल- 18.3%

1 सितंबर 2019- 21.2%

1 अक्टूबर 2019- 22.1%

15 दिसंबर 2019- 24.3%

जवाबी कार्रवाई में चीन ने जो टैरिफ़ बढ़ाए हैं वे अमल में आज और भविष्य में इस तरह असर कर रहे हैं/ करेंगे।

जनवरी 2018- 8.0%

फ़िलहाल - 20.7%

1 सितंबर 2019- 21.8%

15 दिसंबर 2019- 25.9%

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व्यापार युद्ध से किसे फ़ायदा?

अमेरिका चीन को टैरिफ़ वार के ज़रिए डराना चाहता है और ट्रम्प बार-बार एलान कर रहे हैं कि अमेरिकी कंपनियों को चीन से फ़ैक्ट्री वापस अमेरिका में ले आनी चाहिए। अमेरिकी नागरिकों के रोज़गार चीन में क्यों बेरोज़गारी दूर कर रहे हैं यह उनका ‘देशभक्ति’ वाला शिगूफ़ा है। हो सकता है कि इससे उनको 2020 के राष्ट्रपति के चुनाव में कोई फ़ायदा मिल भी जाए पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बीते क़रीब बीस महीनों में इस टैरिफ़ वार से किसी फ़ायदे के कोई संकेत नहीं हैं।

शीतल पी. सिंह
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