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बच्चों में क्यों बढ़ रहा है कोरोना संक्रमण, कितना बड़ा ख़तरा?

कई विशेषज्ञों ने पहले जो चिंता जताई थी कि कोरोना संक्रमण से युवाओं के बाद बच्चों को ख़तरा है, वह अब सही साबित होता दिख रहा है। ताज़ा आँकड़े आए हैं कि 1-10 साल के बच्चों में संक्रमण क़रीब दोगुना ज़्यादा हुआ है। कोरोना से निपटने में आपात नीति बनाने के लिए बनाए गए एम्पावर्ड ग्रुप के आँकड़ों के अनुसार मार्च में जहाँ सक्रिय संक्रमण के मामलों में 2.8 फ़ीसदी बच्चे थे वहीं अगस्त में यह बढ़कर 7.04 फ़ीसदी हो गया है। यानी हर 100 सक्रिय कोरोना मरीज़ों में 7 बच्चे शामिल थे। हालाँकि रिपोर्ट में हालात चिंताजनक नहीं बताई गई है, लेकिन यह सच्चाई है कि बच्चे ज़्यादा संक्रमित होने लगे हैं। 

ज़्यादा बच्चों के संक्रमित होने को लेकर कई विशेषज्ञ आगाह करते रहे हैं। इनमें कार्डियक सर्जन और नारायण हेल्थ के अध्यक्ष और संस्थापक देवी शेट्टी भी शामिल थे। उन्होंने मई महीने में एक लेख लिखकर कहा था कि कोरोना वायरस ख़ुद को म्यूटेट या नये रूप में परिवर्तित कर रहा है जिससे कि वह नये लोगों को संक्रमित कर सके। उन्होंने कहा था कि पहली लहर के दौरान वायरस ने मुख्य तौर पर बुजुर्गों और दूसरी लहर में युवाओं पर हमला किया। फिर उन्होंने कहा था कि तीसरी लहर में बच्चों पर हमले की आशंका है क्योंकि अधिकतर युवा या तो पहले ही संक्रमित हो चुके होंगे या फिर उनमें एंडी बॉडी बन चुकी होगी। अनुमान है कि भारत में 16.5 करोड़ बच्चे 12 साल से कम उम्र के हैं।

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अब एम्पावर्ड ग्रुप-1 के आँकड़ों में ही यह सामने आया है कि इस साल मार्च के बाद से कुल सक्रिय मामलों में 10 साल से कम उम्र के कोरोना पॉजिटिव बच्चों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। 

अगस्त के महीने में जिन 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आँकड़े उपलब्ध हैं, उनमें से बच्चों में कोरोना के सबसे ज़्यादा मामले मिज़ोरम में आए हैं। मिज़ोरम में सबसे ज़्यादा कुल सक्रिय मामलों का 16.48% और दिल्ली में सबसे कम 2.25% था। इनके अलावा मेघालय में कुल सक्रिय मामलों का 9.35%, मणिपुर में 8.74%, केरल में 8.62%, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 8.2%, सिक्किम में 8.02%, दादरा और नगर हवेली में 7.69% और अरुणाचल प्रदेश में 7.38% है। राष्ट्रीय औसत 7.04% की तुलना में इन राज्यों में ज़्यादा अनुपात में बच्चे कोरोना संक्रमित हुए। 

आँकड़े को नीति आयोग के सदस्य वी के पॉल की अध्यक्षता में ईजी-1 की बैठक में पेश किया गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एम्पावर्ड ग्रुप-1 ने इस बात पर जोर दिया है कि बच्चों में यह बदलाव मामूली है और इसको बड़ा नहीं कहा जा सकता है। 

तो सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? अब विशेषज्ञों का कहना है कि 1-10 साल के आयु वर्ग के बच्चों में कोरोना के मामले इसलिए बढ़े हैं क्योंकि वयस्क लोग वायरस के प्रति कम संवेदनशील हुए हो सकते हैं।

हालाँकि विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि चूँकि बच्चे पहले ही एक हद तक संपर्क में आ चुके हैं इसलिए स्थिति गंभीर नहीं बन रही है। यह भी कहा गया है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि बच्चों में बीमारी की गंभीरता वयस्कों की तुलना में कम है। 

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ऐसे में बच्चों में ज़्यादा संक्रमण की स्थिति बनने से रोकने का उपाय यह है कि बच्चों को टीके लगाए जाएँ। लेकिन हालात ये हैं कि देश में बच्चों को अभी तक टीके लगाने की शुरुआत नहीं की गई है। हालाँकि कुछ टीकों के आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन टीके के लगाए जाने में वक़्त लगेगा। 12-17 साल तक के बच्चों को अक्टूबर से टीके लगाए जाएँगे। यह बात अधिकारी ही कह रहे हैं और यह भी कि अभी बाद में तय किया जाएगा कि प्राथमिकता के आधार पहले किसे टीका लगाया जाएगा। अधिकारियों ने तो यह भी कहा है कि देश के सभी बच्चों को टीका लगाने में कम से कम 9 महीने का वक़्त लगेगा। यानी तब तक बचाव ही उपाय है। 
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