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पूर्व सीजेआई गोगोई की नियुक्ति पर जस्टिस लोकुर बोले- क्या आख़िरी क़िला ढहा?

जिस पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने चीफ़ जस्टिस रहते हुए कहा था कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों की नियुक्ति न्यायपालिका की आज़ादी पर ‘धब्बा’ है, अब सेवानिवृत्ति के बाद उन्हीं की नियुक्ति राज्यसभा के सदस्य के रूप में कर दी गई है। ऐसे में सवाल तो खड़े होने ही थे। सुप्रीम कोर्ट में उनके समकक्ष रहे सेवानिवृत्त जस्टिस मदन बी लोकुर ने ही सवाल उठा दिए। एक गंभीर सवाल। उन्होंने कहा कि क्या आख़िरी क़िला भी ढह गया है? उनका यह ज़िक्र न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अखंडता को लेकर है।

जस्टिस गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन के बाद न्यायपालिका की इसी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर शँकाएँ जताई जा रही हैं। ऐसी ही शँकाएँ तब भी उठी थीं जब सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार चार जजों- पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर, चेलमेश्वर और कुरियन जोसेफ़ ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की थी। चारों जजों का वह अप्रत्याशित क़दम था। उन्होंने तब के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर सवाल उठाए थे और कहा था कि महत्वपूर्ण केसों का आवंटन सही तरीक़े से नहीं किया जा रहा है। उनका इशारा मुख्य न्यायाधीश और सरकार के बीच संबंधों की ओर था। जस्टिस गोगोई का उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में शामिल होने का फ़ैसला चौंकाने वाला था क्योंकि वह अगले मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में थे। उन्होंने ऐसे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर एक जोखिम उठाया था। इस कारण तब जस्टिस रंजन गोगोई में एक अलग ही उम्मीद की किरण दिखी और जब वह चीफ़ जस्टिस बने तो लगा कि न्यायपालिका में काफ़ी कुछ बदलने वाला है।

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इसी बीच पिछले साल मार्च में उनके मुख्य न्यायाधीश रहते एक सख़्त फ़ैसला आया था। इसमें जजों की सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति पर सवाल खड़े किए गए थे। तब सुप्रीम कोर्ट अर्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनलों से जुड़े क़ानूनों से संबंधित 18 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था, 

'एक दृष्टिकोण है कि सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्ति न्यायपालिका की न्यायिक स्वतंत्रता पर एक धब्बा है। आप इसे कैसे संभालेंगे।'

ऐसी ही बात जस्टिस लोकुर ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की राज्यसभा में सदस्य के रूप में नियुक्ति के बाद कही है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘कुछ समय से अटकलें लगाई जाती रही हैं कि न्यायमूर्ति गोगोई को क्या सम्मान मिलेगा। तो, उस अर्थ में नामांकन आश्चर्यजनक नहीं है, लेकिन जो आश्चर्य की बात है वह यह है कि यह इतनी जल्दी हो गया। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अखंडता को पुनर्परिभाषित करता है। क्या आख़िरी क़िला भी ढह गया है?’

सुप्रीम कोर्ट में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने वाले चारो जजों में जस्टिस लोकुर भी शामिल थे। उन्होंने वह पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई को क़रीब से जानते हैं। ऐसे में उनकी इस टिप्पणी के काफ़ी गंभीर संदेश हैं।

यदि वह यह कह रहे हैं कि क्या आख़िरी क़िला ढह गया है तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर टिप्पणी है। यह टिप्पणी न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों पर भी है। वैसे, राजनीतिक दलों ने सरकार पर भी इस मामले में निशाना साधा है। 

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कांग्रेस का तंज

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ऐसे ही संबंधों की ओर इशारा करते हुए दो स्क्रीनशॉट के साथ एक ट्वीट किया है। इसमें से एक स्क्रीनशॉट तो पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के राज्यसभा में नामांकित किए जाने की एक ख़बर का है तो दूसरा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का 2013 में किए गए एक ट्वीट का। सुरजेवाला ने ट्वीट में तंज कसा है और लिखा है, 'मैं मोदीजी के कैबिनेट मंत्री से सहमत हूँ।' 

पीयूष गोयल ने अपने क़रीब 7 साल पुराने ट्वीट में लिखा था, 'सेवानिवृत्ति के बाद जजों के लिए जगह बनाने में हम काफ़ी आगे निकल गए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद नौकरी की चाह के कारण सेवानिवृत्ति से पहले के फ़ैसले प्रभावित होते हैं।' 

वैसे, कई ऐसे मामले आते रहे हैं जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद जजों में किसी पद की चाहत होती है और इस पर सुप्रीम कोर्ट और इसके जज ही सवाल उठाते रहे हैं। हालाँकि ऐसे भी जज हैं जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी पद लेने से साफ़ इनकार कर दिया है। ख़ुद जस्टिस कुरियन जोसेफ़ और जस्टिस चेलमेश्वर ने सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी पद को लेने से इनकार कर दिया। ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल न उठाए जाएँ। 

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