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भारत में कोरोना संक्रमण बेलगाम क्यों?

भारत में हर रोज़ कोरोना संक्रमण के मामले दुनिया में सबसे ज़्यादा आ रहे हैं। सवाल है कि कोरोना को नियंत्रित करने में ग़लती कहाँ हुई? क्या तैयारी नहीं हुई? सही फ़ैसले नहीं लिए गए? क्या लॉकडाउन का फ़ायदा नहीं उठाया गया? क्या स्वास्थ्य सुविधाएँ अपर्याप्त होने की वजह से कोरोना फैलता गया या फिर भारत की घनी आबादी की वजह से ऐसा होता रहा?
अमित कुमार सिंह

कोरोना संक्रमण के मामले जहाँ न्यूज़ीलैंड में क़रीब 1800, दक्षिण कोरिया में 22 हज़ार आए हैं वहीं भारत में 54 लाख हो गए हैं। वैसे, अमेरिका में 70 लाख और ब्राज़ील में भी 45 लाख केस हो गए हैं। यहाँ तक कि जिस चीन से संक्रमण सबसे पहले फैला वहाँ 85 हज़ार ही मामले आए हैं। ऐसा क्यों है कि भारत, अमेरिका और ब्राज़ील में कोरोना अनियंत्रित हो गया? इसमें भी अब हर रोज़ संक्रमण के मामले अमेरिका में 30-40 हज़ार और ब्राज़ील में 15-30 हज़ार आ रहे हैं, जबकि भारत में 90 हज़ार के आसपास आ रहे हैं। यानी भारत में ही कोरोना सबसे ज़्यादा अनियंत्रित क्यों है?

वैसे, कोरोना नियंत्रण की विफलता पर कोई सर्वे या रिपोर्ट नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से अलग-अलग देशों ने कोरोना नियंत्रण के तौर-तरीक़े अपनाए और इसके प्रति नेतृत्व का जिस तरह का रवैया रहा उससे इसका आकलन किया जा सकता है। इस मामले में जिन दो देशों ने बेहतरीन काम किया है उनमें न्यूज़ीलैंड और दक्षिण कोरिया शानदार उदाहरण हैं। न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन के नेतृत्व और उनके द्वारा उठाए गए क़दमों की दुनिया भर में तारीफ़ हुई। लेकिन सबसे ज़्यादा कोरोना संक्रमण के मामले में दुनिया भर में अव्वल अमेरिका, भारत और ब्राज़ील के नेतृत्व पर सवाल उठते रहे हैं।

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अमेरिका, भारत और ब्राज़ील तीनों ही देशों में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकारे हैं। तीनों ही देश कोरोना को नियंत्रित करने में विफल साबित हुई हैं। तीनों देशों के नेताओं का रवैया भी इसके प्रति अजीब रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार कोरोना संक्रमण को कम करके आँकते रहे और इस पर उनका अवैज्ञानिक रवैया भी सामने आया। उन्होंने एक समय तो इसे सामान्य फ्लू तक क़रार दे दिया था। उन्होंने मास्क पहनने और लॉकडाउन में आनाकानी की थी। ऐसा ही रवैया ब्राज़ील के राष्ट्रपति का भी रहा। उन्होंने भी लॉकडाउन से इनकार किया, कोरोना को मामूली बीमारी बताया, बिना मास्क के ही समर्थकों के बीच गए और ख़ुद कोरोना संक्रमित भी हुए। 

हालाँकि, अमेरिका और ब्राज़ील के प्रमुखों की तरह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे न तो सामान्य बीमारी माना और न ही उन्होंने मास्क पहनने से इनकार किया। उन्होंने लॉकडाउन में भी लापरवाही नहीं बरती। बल्कि भारत में तो दुनिया भर में सबसे सख़्त और सबसे लंबे समय तक लॉकडाउन लगाया गया। लेकिन फिर भी कई चूकें हुईं। लॉकडाउन लगाने के पहले मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनाने के प्रयास हुए और 'नमस्ते ट्रंप' कार्यक्रम हुआ, वह भी तब जब संक्रमण का ख़तरा लगातार बढ़ता जा रहा था। तब ऐसा लगा जैसे कोरोना के प्रति सरकार गंभीर नहीं थी!

चूक हुई तभी तो कोरोना नियंत्रित नहीं हुआ। लॉकडाउन की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा था, 'महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीता गया था। आज कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध जो पूरा देश लड़ रहा है उसमें 21 दिन लगने वाले हैं।' 21 दिन में कोरोना नियंत्रित नहीं हुआ, तो क्या यह चूक नहीं है? कोरोना संक्रमण के बीच ताली-थाली-घंटी बजाने और मोमबत्ती, दीया, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाने के प्रधानमंत्री मोदी के अभियान की भी आलोचनाएँ की गईं। 

प्रधानमंत्री मोदी के सबसे विश्वास पात्र व्यक्ति और देश के गृह मंत्री अमित शाह ने ही माना था कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने में ग़लती हुई होगी। शाह ने नौ जून को एक इंटरव्यू में कहा था कि 'हमसे कुछ ग़लती हुई होगी, हम कहीं कम पड़ गए होंगे'। हालाँकि इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनकी निष्ठा सही थी।

तो सवाल है कि कोरोना को नियंत्रित करने में ग़लती कहाँ हुई? क्या तैयारी नहीं हुई? सही फ़ैसले नहीं लिए गए? क्या लॉकडाउन का फ़ायदा नहीं उठाया गया? क्या स्वास्थ्य सुविधाएँ अपर्याप्त होने की वजह से कोरोना फैलता गया या फिर भारत की घनी आबादी की वजह से ऐसा होता रहा?

तैयारी

किसी भी आपदा से निपटने के लिए सबसे अहम चीज होती है तैयारी। लेकिन कोरोना संक्रमण के मामले में भारत में ऐसा नहीं देखा गया। भारत में जब कोरोना संक्रमण का पहला मामला 30 जनवरी को आया था तभी कोरोना की जाँच, इलाज आदि की ज़बरदस्त तैयारी की जानी चाहिए थी। दक्षिण कोरिया में भारत से कुछ दिन पहले ही कोरोना संक्रमण का मामला आया था। इसके अगले दिन ही वहाँ सरकारी अधिकारियों ने कई मेडिकल कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की और आपातकालीन मंजूरी देने का वादा करते हुए उनसे आग्रह किया कि तुरंत ही वे कोरोना वायरस जाँच किट बनाना शुरू कर दें। जब देश में दो हफ़्ते के भीतर पॉजिटिव मामलों की संख्या दो अंकों में भी नहीं पहुँची थी तब उसने हज़ारों जाँच किट तैयार कर लिए थे। 

लेकिन भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। लॉकडाउन की घोषणा के कुछ समय पहले तक तो भारत से मेडिकल उपकरण के निर्यात हो रहे थे। जाँच की सुविधा विकसित ही नहीं की गई।

कई राज्यों के कई ज़िलों में तो जुलाई महीने तक जाँच सुविधा नहीं थी और सैंपल दूसरे ज़िला मुख्यालयों पर या फिर राज्य की राजधानी में भेजे जा रहे थे। शुरुआती महीनों में तो डॉक्टरों-नर्सों की सुरक्षा तक के लिए मास्क, कवरॉल, पीपीई किट जैसे उपकरणों की काफ़ी कमी की शिकायतें आती रहीं।

लॉकडाउन

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ही कहता रहा है कि लॉकडाउन से कोरोना संक्रमण को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और यह दुनिया भर में दिखा भी। लॉकडाउन को कोरोना संक्रमण को फैलने की गति को कम करने के उपाय के तौर पर देखा गया जिससे संक्रमण से निपटने के लिए तैयारियों को अंजाम दिया जा सके। जैसे टेस्टिंग की सुविधा बढ़ाने में मदद मिले और दूसरी स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत किया जा सके। लेकिन क्या भारत में ऐसा हुआ? मई महीने में 'कारवाँ' पत्रिका की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि मोदी सरकार द्वारा ही गठित नेशनल टास्क फ़ोर्स के दो वैज्ञानिक सदस्यों ने कहा था कि लॉकडाउन फ़ेल हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने तीन बार ऐसा किया कि नेशनल टास्क फ़ोर्स के वैज्ञानिकों से इनपुट माँगे बिना ही लॉकडाउन को बढ़ा दिया। उनका इशारा साफ़ था कि जब तक लॉकडाउन के साथ टेस्टिंग क्षमता और चिकित्सा के बुनियादी ढांचे के विकास जैसे महत्वपूर्ण उपाय नहीं किए जाएँ तो लॉकडाउन फ़ेल होगा ही।

टेस्टिंग

अक्सर ऐसी रिपोर्टें आती रही हैं कि जिन देशों ने टेस्टिंग, ट्रेसिंग, आइसोलेशन यानी अलग-थलग करने का रास्ता अपनाया उन्होंने कोरोना को अपेक्षाकृत बेहतर तरीक़े से नियंत्रित किया। लेकिन क्या भारत के संदर्भ में ऐसा है? मार्च महीने में जब संक्रमण तेज़ी से फ़ैलने लगा था तभी से टेस्टिंग को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। अक्सर शिकायतें आती रहीं कि कोरोना के लक्षण दिखने के बावजूद टेस्टिंग नहीं की जा रही थी। तब नियम तो यह था कि जो विदेश से आया हो या फिर सीधे कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया हो उसकी ही जाँच की जा रही थी। हालाँकि काफ़ी बाद में यह पाबंदी हटाई गई।

शुरुआती दिनों में शिकायतें तो ये भी आ रही थीं कि जाँच रिपोर्टें एक-एक हफ़्ते में आ रही थीं। जाँच रिपोर्ट जब इतनी देरी से आएँ तो फिर संक्रमित लोगों के ट्रेस किए जाने तक वे कितने लोगों को संक्रमित कर चुके होते होंगे। ऐसे में कोरोना संक्रमण को फैलने से कैसे रोका जा सकता है?

अब जबकि टेस्टिंग की सुविधा बढ़ी और रिपोर्ट भी अपेक्षाकृत जल्दी आ रही है फिर भी टेस्टिंग के मामले में भारत का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है।

हर दस लाख लोगों में से कितने लोगों की कोरोना जाँच की गई, इस मामले में भारत 195 देशों में 115वें स्थान पर है। भारत में हर दस लाख जनसंख्या पर सिर्फ़ 42 हज़ार 170 जाँच की गई है। यह आँकड़ा 15 सितंबर तक का है। इसकी तुलना में दूसरे देशों का आँकड़ा देखिए। अमेरिका और रूस में 10 लाख की जनसंख्या पर 2 लाख 81 हज़ार से ज़्यादा जाँच, स्पेन में 2 लाख 30 हज़ार, पेरू में 1 लाख 7 हज़ार, दक्षिण अफ़्रीका में 66 हज़ार, ब्राज़ील में 68 हज़ार जाँच की गई है। 

अब भारत में जो जाँच की जा रही है उसमें भी एक दिक्कत यह है कि एंटीजन टेस्ट का सहारा लिया जा रहा है। जबकि पीसीआर टेस्ट का परिणाम सटीक होता है। एंटीजन टेस्ट की रिपोर्ट उतनी सटीक नहीं है। एंटीजन टेस्ट में कोरोना संक्रमित व्यक्ति की रिपोर्ट नेगेटिव भी आ जाती है। 

घनी आबादी

ऐसा भी तर्क दिया जा रहा है कि भारत में कोरोना संक्रमण नियंत्रित नहीं होने की वजह घनी आबादी है। इसके पीछे एक तर्क यह है कि सीरो सर्वे में झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण के मामले ज़्यादा मिले हैं। सीरो सर्वे में एंटी बॉडी से यह पता लगाया जाता है कि किसी व्यक्ति को कोरोना संक्रमण कभी हुआ था या नहीं। माना गया कि झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों में लोगों के रहने की जगह कम होती है और वहाँ पर सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का सही से पालन नहीं हो पाता है। हालाँकि, यह तर्क काफ़ी हद तक सही लगता है, लेकिन फिर चीन हमारे सामने ऐसा उदाहरण है जहाँ जनसंख्या भारत से ज़्यादा ही है। चीन में भी स्लम यानी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की बड़ी तादाद है। लेकिन चीन ने इसे नियंत्रित कर लिया। चीन में क़रीब 85 हज़ार ही संक्रमण के मामले आए। यानी भारत में भी इसे नियंत्रित करना ज़्यादा मुश्किल नहीं होता, बशर्ते कि दूसरे उपाय चुस्त होते। 

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स्वास्थ्य व्यवस्था

इस वायरस से भारत में हालत बिगड़ने का एक और बड़ा कारण है। भारत की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था। संक्रमण फैलने की स्थिति को सिर्फ़ मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही अच्छी तरह से संभाल सकता है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी चरमराई है कि वहाँ सुरक्षा के उपकरणों, वेंटिलेटर, आईसीयू नहीं ही हैं, बेड भी अपर्याप्त हैं। ज़िला अस्पतालों तक में यह व्यवस्था नहीं है। निजी अस्पतालों में इलाज कराना इतना महंगा है कि यदि किसी ग़रीब को कोरोना का लक्षण दिखे भी तो वह शायद ही इलाज कराने जाए। 

अब जब भारत में कोरोना संक्रमण का पहला मामला आने के बाद आठ महीने होने को आए तब भी भारत में कोरोना नियंत्रित होना तो दूर और ज़्यादा फैलता हुआ दिख रहा है। भारत में हर रोज़ कोरोना संक्रमण के क़रीब 90 हज़ार नए मामले सामने आ रहे हैं। भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 54 से ज़्यादा हो गयी है और अब तक कुल 87,882 लोगों की मौत हो चुकी है। हर रोज़ 1000 से ज़्यादा मौतें हो रही हैं। ऐसे में सवाल तो उठेंगे कि आख़िर भारत में कोरोना अनियंत्रित क्यों है? किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए?

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