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आरक्षण ख़त्म नहीं, निष्क्रिय? 89 सचिवों में सिर्फ़ एक एससी, तीन एसटी

देश में आरक्षण लागू होने की स्थिति कितनी ख़राब है, इसकी रिपोर्टें सरकारी आँकड़े ही साफ़-साफ़ बयान करते हैं। इस मामले में केंद्र सरकार के ऊँचे पदों पर तो स्थिति और भी ख़राब है। हाल ही एक रिपोर्ट आयी थी कि केंद्र सरकार में 89 सचिवों में से अनुसूचित जाति यानी एससी के सिर्फ़ एक और अनुसूचित जनजाति यानी एसटी से तीन सचिव हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी से कोई भी सचिव नहीं है। ये आँकड़े हाल ही में संसद में रखे गए थे। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार इसमें से अधिकतर सचिव भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस हैं।

मंडल आयोग की सिफ़ारिश पर सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27.5 फ़ीसदी, एससी के लिए 15 फ़ीसदी और एसटी के लिए 7.5 फ़ीसदी आरक्षण लागू करना ज़रूरी है। लेकिन जब सचिव स्तर के इन पदों पर नियुक्ति के मामले में आरक्षण सही से लागू हुआ नहीं जान पड़ता है। 

केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त सचिव के स्तर पर भी ऐसा ही है। 93 अतिरिक्त सचिवों में से एससी के 6 और एसटी के 5 हैं। अतिरिक्त सचिवों में भी कोई ओबीसी श्रेणी से नहीं है। 275 संयुक्त सचिवों में से 13 यानी 4.73 फ़ीसदी एससी हैं, 9 यानी 3.27 फ़ीसदी एसटी और 19 ओबीसी श्रेणी से हैं।

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आरक्षण जिस अनुपात में होना चाहिए वैसा नहीं होने पर इस पर सवाल उठते रहे हैं। आरक्षण सही तरीक़े से लागू नहीं किए जाने के ख़िलाफ़ विपक्षी नेता समय-समय पर आवाज़ उठाते रहते हैं। संसद में भी सवाल पूछे गए। ‘द प्रिंट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब सरकार ने  कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा तैयार इन आँकड़ों को संसद में रखा था तब तृणमूल सांसद दिबयेंदु अधिकारी के सवाल का कार्मिक मंत्रालय के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 10 जुलाई को जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि आरक्षण श्रेणी से आने वाले अक्सर ज़्यादा उम्र में सेवा में आते हैं इसलिए अधिकतर अधिकारी सचिव और अतिरिक्त सचिव जैसे पदों के लिए इम्पैनलमेंट किए जाने से पहले ही वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

मंत्री ने साफ़ कहा था, 'इसी कारण भारत सरकार में उच्च पदों पर उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से कम है। हालाँकि, उनके नामों पर विचार के लिए उपलब्ध आरक्षित श्रेणी के अधिकारियों में से, उन्हें जितना संभव हो उतना ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाता है।'

अब राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह की बात कितनी सही है, यह तो इस पर कोई रिपोर्ट आए तभी पता चलेगा, लेकिन दूसरे ऐसे मामले हैं जहाँ उम्र ज़्यादा होने से असर नहीं पड़ना चाहिए और फिर भी एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है। यह है केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्ति का मामला।

95.2 फ़ीसदी सवर्ण प्रफ़ेसर

हाल ही में एक अंग्रेजी अख़बार को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में इन सवालों के जवाब सामने आए। देश में कुल 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिसमें कुल पढ़ाने वाले 11,486 लोग हैं। इनमें 1,125 प्रफ़ेसर हैं और इनमें दलित प्रफ़ेसर 39 यानी 3.47 फ़ीसदी जो कि 15 फ़ीसदी होने चाहिए थे। आदिवासी प्रफ़ेसर सिर्फ़ 6 यानी 0.7 फ़ीसदी जो कि 7.5 फ़ीसदी होने चाहिए थे। पिछड़े प्रफ़ेसर 0 जो 27 फ़ीसदी होने चाहिए थे। जबकि सवर्ण प्रफ़ेसर 1071 यानी 95.2 फ़ीसदी हैं जो हर हाल में 50 फ़ीसदी से अधिक नहीं होने चाहिये।

40 संस्थानों में कुल 2620 असोसिएट प्रफ़ेसर हैं। इसमें 130 यानी 4.96 फ़ीसदी दलित प्रफ़ेसर जो कि 393 होने चाहिए थे,  34 यानी 1.3 फ़ीसदी आदिवासी प्रफ़ेसर जो 197 होने चाहिए थे। इसके उलट कुल 3434 यानी 92.9 फ़ीसदी सवर्ण असोसिएट प्रफ़ेसर जो 50 फ़ीसदी से ज्यादा हैं। पूरे देश में एक भी पिछड़े वर्ग का असोसिएट प्रफ़ेसर नहीं है।

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भेदभाव होता है: उदित राज

कभी भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे और अनुसूचित जाति से आने वाले बीजेपी के पूर्व सांसद उदित राज ने आरोप लगाया कि अक्सर, एससी/एसटी वर्ग से संबंधित अधिकारियों को उन्हें शीर्ष पद तक पहुँचने नहीं दिया जाता है। ‘द प्रिंट’ के अनुसार, उदित राज ने कहा, ‘एक दलित के रूप में पूर्व आईआरएस अधिकारी होने के नाते मैं अपने अनुभव साझा कर सकता हूँ। एससी/एसटी वर्ग से संबंधित अधिकारियों के ख़िलाफ़ फर्जी शिकायतें दर्ज की जाती हैं और ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब उनकी गोपनीय रिपोर्ट को उनके आकाओं ने ख़राब कर दिया।’ बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उदित राज ने कांग्रेस में शामिल होने के लिए बीजेपी छोड़ दी थी।

उन्होंने दावा किया, ‘जब मैं बीजेपी में था तब वरिष्ठ नौकरशाही के पदों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के कम प्रतिनिधित्व होने पर विरोध किया था, लेकिन कोई भी इसको सुनने के लिए गंभीर नहीं है। मैंने इस मुद्दे को उठाने की क़ीमत चुकाई।’

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9 संयुक्त सचिवों की नियुक्ति में नहीं था आरक्षण

सरकारी नौकरियों में आरक्षण को कैसे ख़त्म किया जा सकता है, इसकी मिसाल देखनी है तो केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया को देखिए। संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्तियों के मामले में यूपीएससी ने तो साफ़ शब्दों में कहा है कि डीओपीटी ने कहा था कि इस भर्ती मामले में कोई आरक्षण नहीं होगा।

एक आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला है कि इस साल अप्रैल में संयुक्त सचिव स्तर पर निजी क्षेत्र से प्रतिभाओं को शामिल करने के दौरान कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को आरक्षण देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। डीओपीटी के सामने आरटीआई दायर की गई थी और इसने जो जवाब दिया है उसी आधार पर अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इसी साल जून में इस पर एक रिपोर्ट छापी थी।

बता दें कि डीओपीटी ने 15 मई 2018 को एक परिपत्र में ज़िक्र किया था कि ‘केंद्र सरकार के पदों और सेवाओं के लिए नियुक्तियों के संबंध में एससी, एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों के लिए 45 दिनों या उससे अधिक के लिए होने वाली अस्थायी नियुक्तियों में भी आरक्षण होगा।’

ये ख़बरें इस लिहाज़ से काफ़ी अहम हैं कि सरकार प्रवेश स्तर पर ही सिविल सेवाओं के बाहर से लोगों को नौकरी पर रखने की महत्त्वाकांक्षी योजना बना रही है। तो क्या यह योजना आरक्षण की व्यवस्था को निष्क्रिय करने जैसी नहीं होगी?

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