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प्रतीकात्मक तसवीर।

भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों पर संकीर्ण होने का आरोप क्यों?

सामाजिक संवेदनातंत्र के खंडित होने की बात जब कही जाती है तो ऐसा कहने वालों पर संकीर्णदृष्टि होने का आरोप लगाया जाता है। यह कहा जाता है कि वे सार्वभौम अनुभव की संभावना पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे दलितों ने जाति व्यवस्था को हिंसक कहा तो समाज के बड़े तबक़े ने इसे खुद पर इल्ज़ाम माना या पंडिता रमाबाई ने जब भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा पर अमेरिका में चर्चा की तो विवेकानंद ने इसका बुरा माना।  
अपूर्वानंद

क्या लिखूँ? लिखने की आदत जिन्हें हो, उनके सामने भी यह सवाल एक पहाड़ की तरह आकर खड़ा हो जाता है। कलम रुकी रहती है या की-बोर्ड के ऊपर ख़ाली जगह चुनौती देती रहती है। क्या विषय की कमी है? मुक्तिबोध ने लेखक की इस समस्या पर विचार करते हुए लिखा है - समस्या दरअसल विषयों की कमी नहीं, उनका अधिक होना है। उससे बड़ी समस्या उनमें से विषय के चुनाव की है।

क्या विषय के चुनाव के साथ ही समस्या का हल मिल जाता है? विषय के चुनाव के बाद भी लेखक का आत्मविश्वास लिखने से पहले क्यों डगमगाता है? इस वजह से कि वह विषय के साथ न्याय नहीं कर सकता? या, उसे इसका विश्वास नहीं होता कि वह जो लिखेगा, उसे उसी तरह पढ़ा जाएगा जैसा वह चाहता है? यानी, लेखक को कई बार सहानुभूतिशील पाठक की कमी सताती है। वह लिखने से पहले ही हताश हो उठता है कि उसके दर्द, उसकी चिंता को समझने और साझा करने वाले शायद कहीं नहीं हैं।

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लिखना आत्मप्रकाश है लेकिन वह सिर्फ़ वही नहीं है। वह संवाद की आकांक्षा है। वह मानवीयता की संभावना की घोषणा है। आख़िरकार मानवीयता और क्या है, संवाद या रिश्ते के बिना? वह उसी के ज़रिए तो बनती है। लिखते वक्त पाठक की शक्ल भले ही साफ़ न रहती हो, उम्मीद बनी रहती है कि लिखा हुआ सार्वजनिक भाव लोक में हस्तक्षेप करेगा। जो सामाजिक भाव जल है, वह अक्षरों के इन ककंड़ों से हिलेगा।

कल्पना उस सामाजिक भाव जल की है। वह बँटा न हो। वह एक राशि हो। एक जल राशि। कंकड़ फेंकें तो संपूर्ण जलाशय तरंगायित हो! लेकिन अगर इसका आश्वासन न रह जाए? जब पहले से मालूम हो कि हम एक ही समाज में एक संवेदना लोक की बात नहीं कर सकते।

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कहा जाएगा कि यह कोई नई बात नहीं है। औरतों ने इसे सबसे पहले कहा। अफ़्रीका और अमेरिका में ‘कालों’ ने खुद को ‘काला’ कहकर यही बताने की कोशिश की और भारत में दलितों ने। दिलचस्प यह है या विडंबनापूर्ण कि जब उन्होंने सामाजिक संवेदनातंत्र के खंडित होने की तरफ़ संकेत किया तो उन्हें संकीर्णदृष्टि होने का आरोप झेलना पड़ा। यह कहा गया कि वे एक सार्वभौम अनुभव की संभावना पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। 

दलितों ने जाति व्यवस्था को हिंसक कहा तो समाज के बड़े तबक़े को यह खुद पर इल्ज़ाम जान पड़ा। उन्होंने इसे ऐतिहासिक अनिवार्यता के तौर पर देखने का आग्रह किया। दलित स्वर या काली आवाज़ अथवा स्त्री भाषा पर कर्कशता, कटुता का आरोप सहज है। ऐसे लेखकों की जब आशंसापूर्वक चर्चा की जाती है तो कहा जाता है कि उनमें कड़वाहट नहीं है!

पंडिता रमाबाई ने जब भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा पर अमेरिका में चर्चा की तो विवेकानंद ने इसका बुरा माना। किसी एक कल्पित अखंडित भारतीय भावलोक में पंडिता रमाबाई दरार डाल रही थीं। इसीलिए तो स्वराज को जन्म सिद्ध अधिकार मानने वाले तिलक ने भी रमाबाई का विरोध किया। आज की राष्ट्रीय देवमाला में रमाबाई या सावित्रीबाई को जगह मिली है लेकिन उनकी यह यात्रा विवेकानंद या तिलक या गाँधी के मुक़ाबले कितनी लंबी और कितनी कठिन रही है, क्या यह कहने की आवश्यकता है?

आज भी रमाबाई या सावित्रीबाई स्त्री बौद्धिक ही हैं जैसे बाबा साहेब दलित चिंतक। आज भी दूसरे देशों में जातिगत भेदभाव की बात करना राष्ट्र विरोधी माना जाता है, जैसे विवेकानंद को रमाबाई का अभियान भारत पर लांछन की तरह लगा था।
जो व्यापक और सार्वभौम अनुभव के प्रवक्ता होने का दावा करते हैं, वे आख़िरकार एक आंशिक भावजगत के प्रतिनिधि हैं। गाँधी से प्रभावित होकर डेनमार्क से भारत आई ऐलन होरुप की गाँधी पर टिप्पणी दिलचस्प है। उन्होंने गाँधी को नोबेल पुरस्कार दिलाने का अभियान भी चलाया था। लेकिन अपने एक ख़त में उन्होंने गाँधी को ही लिखा कि पहले उन्हें लगता था कि गाँधी ही भारत हैं लेकिन भारत में समय गुज़ारने के बाद वह समझ पाईं कि भारत उनसे बहुत बड़ा और अलग है। यही नहीं, होरुप ने यह भी कहा कि आख़िरकार गाँधी का दिमाग़ एक मर्द का दिमाग़ है और वह भी एक ऊँची जाति के हिंदू मर्द का दिमाग़।
गाँधी के बारे में कहा जा सकता है कि वह ख़ुद से संघर्ष करते रहे और अपने संवेदनलोक को विस्तृत करते रहे। यह संघर्ष हर व्यक्ति को और समुदाय को करना पड़ता है। यह कभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं होता। लेकिन ऐसा संघर्ष किए बिना रिश्ता भी नहीं बनता।

एक उम्दा समाज वह है जो इस जंग से गुजरता है। तकलीफ़ यह है कि जब इसकी सबसे अधिक ज़रूरत होती है तब अकसर वह चूक जाता है। जर्मनी में जब यहूदियों को अलग-थलग करके हिटलर ने उनपर आक्रमण किया तो जर्मन समाज ने भी ख़ुद को उनसे अलग कर लिया। सिर्फ़ यह नहीं, वह हिटलर के साथ खड़ा हो गया। यूरोप ने भी यहूदियों की ओर से आँखें फेर लीं। यूरोपीय चेतना में इस विभाजन का ख़ामियाज़ा वह समाज आज तक भुगत रहा है। आज, बीसवीं सदी की दूसरी दहाई के अंतिम बिंदु पर दिल्ली में लिखने से पहले की अपनी इस अटकन से जूझते हुए मुझे यह सब कुछ क्यों याद आ रहा है?

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