loader
शिंज़ो आबे और नरेंद्र मोदी (फ़ाइल फ़ोटो)।फ़ोटो साभार: ट्विटर/नरेंद्र मोदी

भारत ने किया जापान से सैन्य समझौता; चीन की घेरेबंदी को क़रारा जवाब?

भारत चीन सीमा तनाव के बीच भारत और जापान के बीच सैन्य समझौता हुआ है। जापान ऐसा छठा देश हो गया है जिसके साथ भारत ने सेना के स्तर पर लॉजिस्टिक सपोर्ट और युद्धपोत साझा करने का समझौता किया है। इससे पहले भारत अमेरिका, फ़्रांस, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ ऐसा समझौता कर चुका है। इंग्लैंड और रूस से भी इस बारे में बातचीत चल रही है। इसे एक तरह से चीन की घेरेबंदी की रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा सकता है। इसमें अधिकतर वे देश हैं जो या तो चीन के पड़ोसी हैं या फिर जिनका दक्षिणी चीन सागर में चीनी हस्तक्षेप को लेकर आपत्ति रहती है। इसमें वे भी देश हैं जिनके पास सामरिक रूप से काफ़ी अहम नौसैनिक अड्डे हैं। 

ताज़ा ख़बरें

चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत दक्षिणी चीन सागर में आसपास के कई देशों की आपत्ति के बावजूद हस्तक्षेप करते रहा है। भारत के पड़ोसी देशों के साथ चीन रिश्ते मज़बूत करने में जुटा हुआ है। इसमें पाकिस्तान तो उसका साथी है ही, श्रीलंका, मालदीव, के बाद अब नेपाल और बांग्लादेश में भी वह हस्तक्षेप करने की स्थिति में पहुँचने लगा है। इसी बीच चीन ने भारत के लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ कर एक मोर्चा खोल दिया है। ऐसे में भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के विस्तार की इसी नीति का मुक़ाबला करने के लिए दोस्ताना देशों के साथ हिंद महासागर और उससे आगे बढ़कर भी अपनी रणनीतिक पहुँच बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

जापान के साथ भारत का ताज़ा समझौता चीन की घेरेबंदी का जवाब है मालूम पड़ता है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग पर सहमति जताई है। भारत के रक्षा सचिव अजय कुमार और जापानी राजदूत सुजुकी सातोशी ने भारतीय सशस्त्र बलों और जापानी आत्म-रक्षा बलों के बीच 'आपूर्ति और सेवाओं के पारस्परिक प्रावधान' के समझौते पर हस्ताक्षर किए।

हालाँकि भारत और जापान के बीच दोस्ताना संबंध लंबे समय से रहे हैं। लेकिन इस संबंध में दोनों देशों के बीच अक्टूबर 2018 में समझौते में संबंधों को और प्रगाढ़ करने पर सहमति बनी थी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके समकक्ष शिंजो आबे ने इसको आगे बढ़ाया था।

यह सहमति हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को लेकर थी। इसमें तय हुआ था कि इसके लिए दोनों देश आपसी सहयोग करेंगे और रक्षा सहयोग को और बढ़ाएँगे। यह समझौता 10 साल के लिए है। इसके बाद यह समझौता अपने आप अगले दस साल के लिए तब तक बढ़ जाएगा जब तक कि दोनों में से किसी देश अपने हाथ नहीं खींच लेते हैं। 

हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर चीन की नज़र

हाल के वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र कई देशों के लिए चिंता का सबब इसलिए बन गया है कि चीन की इस क्षेत्र पर नज़र है। चीन के इस रवैये से सबसे ज़्यादा प्रभावित अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत और आसियान देश होते हैं। इस क्षेत्र में चीन इसलिए आँखें गड़ाए हुए है और नियमों का उल्लंघन करता रहा है क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक व्यापार के नज़रिए से तो अहम है ही, सामरिक दृष्टि से भी काफ़ी महत्वपूर्ण है। यदि चीन ने इस क्षेत्र पर ज़बरन क़ब्ज़ा कर लिया तो इससे कई देश काफ़ी ज़्यादा प्रभावित होंगे और एक तरह से उन्हें चीन की दया पर निर्भर रहना पड़ेगा। अब ज़ाहिर है ऐसा कोई भी देश नहीं चाहेगा। भारत तो बिल्कुल भी नहीं। 

यही कारण है कि पिछले हफ़्ते ही चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ यानी सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक 'अच्छे तंत्र' के रूप में क्वाड (Quad) का जोरदार समर्थन किया।

Quad यानी चतुर्भुज सुरक्षा संवाद भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान का एक समूह है जिसे निर्विवाद समुद्री व्यापार और सुरक्षा के साझा हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत इस साल के अंत में क्वाड की बैठक की मेजबानी करने वाला है। 

देश से और ख़बरें

ये देश इसलिए भी एकजुट हो रहे हैं कि चीन नेवी में दुनिया में सबसे ताक़तवर है। इसके पास 350 से ज़्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियाँ हैं। अगस्त 2017 में जिबूती में अपनी पहली विदेशी सैन्य सुविधा के बाद चीन अधिक लॉजिस्टिक्स बेस स्थापित करना चाह रहा है। चीन की पाकिस्तान में कराची और ग्वादर बंदरगाहों तक भी पहुँच है और वहाँ इसकी पनडुब्बियों और युद्धपोतों के लिए सुविधाएँ हैं।

भारत की ऐसी तैयारी इसलिए भी अहम है कि चीन हाल के वर्षों में भारत के ख़िलाफ़ आक्रामक रूप से पेश आता रहा है। तीन महीने से ज़्यादा समय से लद्दाख क्षेत्र के पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी घुसपैठ उसकी आक्रमकता और उसके विस्तारवाद का ही नतीजा है। हालाँकि ऐसा लगता है कि चीन सीधे-सीधे भारत से युद्ध नहीं चाहता और भारत को सीमा विवाद में उलझाए रखना चाहता है। इसके साथ ही वह भारत की घेराबंदी भी जारी रखे हुए है। ऐसे में भारत का जापान जैसे देशों से आपसी सहयोग का समझौता और चीन की घेरेबंदी की नीति काफ़ी अहम है। 

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए


गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
अमित कुमार सिंह
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

देश से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें