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रिज़र्व बैंक से पैसे लेने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़ी सरकार

रिज़र्व बैंक के जिस रिज़र्व सरप्लस को लेकर केंद्रीय बैक और केंद्र सरकार के बीच काफ़ी दिनों से रस्साकशी चल रही थी और अंतत: गवर्नर उर्जित पटेल को पद छोड़ना पड़ा था, अब सरकार ने इस दिशा में पहली बाधा पार कर ली है। वैसे तो शक्तिकांत दास के गवर्नर बनते ही इस बात की संभावना बढ़ गई थी कि रिज़र्व सरप्लस सरकार को देने की दिशा में क़दम जल्द उठ सकता है। अब बिमल जालान की अध्यक्षता में छह सदस्यों की एक समिति बनाई गई है जो इस मुद्दे पर फ़ैसला करेगी कि रिज़र्व बैंक का इकनॉमिक फ्रेमवर्क क्या हो और सरकार को सरप्लस दिया जाए या नहीं, और दिया जाए तो कितना। 

पहले ऐसी ख़बरें थीं कि सरकार और उर्जित पटेल में पैनल के अध्यक्ष पद को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। सत्यहिंदी.कॉम ने भी इस विषय पर एक रिपोर्ट की थी। कहा जा रहा था कि सरकार पैनल के अध्यक्ष पद के लिए बिमल जालान को चाहती है, लेकिन पटेल राकेश मोहन को इसका अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव कर रहे थे। 

संतुलन की कोशिश

जालान इस राय के माने जाते हैं कि रिज़र्व सरप्लस सरकार को देने में कोई हर्ज़ नहीं है। जबकि दूसरी तरफ़ राकेश मोहन सार्वजनिक तौर पर सरप्लस देने की बात की आलोचना कर चुके थे। राकेश मोहन का कहना था कि जोख़िम के लिए सुरक्षित रखे पैसे का इस्तेमाल सरकार को अपने खर्च के लिए नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि यह एक तरह का शॉर्टकट है और इससे अर्थव्यवस्था भी मजबूत नहीं होती है। 

इकनॉमिक फ्रेमवर्क समिति का अध्यक्ष बिमल जालान को बनाया जाना इसलिए अहम है कि उनके विचार सरकार के विचार से मिलते हैं। उनका साफ़ मानना है कि रिज़र्व बैंक केंद्र सरकार के प्रति ज़िम्मेदार है और वह फ़ालतू पड़े पैसे उसे दे दे। यही तो सरकार चाहती है।

चूंकि पैनल की अध्यक्षता के सवाल पर उर्जित पटेल और और सरकार के बीच गहरे मतभेद उभर आए थे और ये मतभेद सार्वजनिक भी हो गए थे, इसलिए अब जो पैनल बना है उसमे संतुलन साधने की कोशिश की गई है और जालान और मोहन, दोनों को शामिल किया गया है। 

इस पैनल में बाकी के चार सदस्यों में दो भरत दोषी और सुधीर मांकड़ रिज़र्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड के सदस्य और एक बैंक के डिप्टी गवर्नर एन. एस. स्वामीनाथन हैं। लेकिन इसी समिति में आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव एस. सी. गर्ग हैं। वे सरकार के विचार रखेंगे क्योंकि वे सरकार के ही अधीन काम करते हैं। 

सरकार का तर्क रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक में रिज़र्व सरप्लस कुल संपत्ति का 27 फ़ीसद है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानक 13-14 प्रतिशत ही रहता है। इसीलिए सरकार मानती है कि आरबीआई के पास अधिक पैसे फ़ालतू पड़े हुए हैं। 

राकेश मोहन ने आशंका जताई है कि कैपिटल रिज़र्व से पैसे निकाल कर देना एक ग़लत परंपरा की शुरूआत होगी और सरकार इसे शॉर्टकट मान लेंगे, पर इससे अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी। इसके उलट केंद्रीय बैंक जोख़िम की स्थिति में क्या करेगी, यह सवाल उठ खड़ा होगा।

चुनाव के पहले रिपोर्ट

समिति को 90 दिनों में अपनी रिपोर्ट देनी है। लेकिन समिति यदि अपनी यह रिपोर्ट जल्दी देती है और सरकार को सरप्लस पैस देने की सिफ़ारिश करती है तो चुनाव के ठीक पहले सरकार की बाछें खिल जाएँगीं। पैसे के मामले में  सरकार के हाथ अभी काफ़ी तंग है, राजकोषीय घाटा उसके लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। इसलिए उसे अपने ख़र्चों पर लगाम लगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। ऐसे में अगर उसे रिज़र्व बैंक से पैसे मिल जाते हैं तो वह ताबड़तोड़ कई लोक-लुभावन स्कीमें लेकर आ सकती है। और चुनाव प्रचार के दौरान इसका लाभ उठा सकती है। 

पाँच विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार से यह संकेत गया कि किसान उससे नाराज़ हैं। हो सकता है कि सरकार किसानों की क़र्ज़माफी की कोई बड़ी योजना ले कर आए। यह भी हो सकता है कि सरकार बाकी बचे पैसे से आधारभूत संरचना से जुड़ी कई योजनाएँ लेकर आए या तरह तरह के दूसरी स्कीमें पेश करे। 

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