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अल्काज़ी : स्टेज का ‘तुग़लक़’ जिसने भारतीय रंगमंच को जड़ों से काट दिया! 

जब थिएटर नहीं बचेगा तो थिएटर में कॅरियर कहाँ बचेगा? इब्राहिम अल्काज़ी के अपने निर्देशकीय काल में ही हिंदी रंगकर्म बिखराव की उलटी सीढ़ी गिरने लगा था। उनके अपने शिष्यों का बड़ा समूह 'पासआउट' करते ही थिएटर को धता बताकर मुंबई फ़िल्म उद्योग की राह भागने लगा था। अल्काज़ी इसे देख रहे थे। थिएटर का यह 'तुग़लक़' अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को किरिच-किरिच बिखरते नहीं देख सकता था।
अनिल शुक्ल

यद्यपि 43 साल पहले ही इब्राहिम अल्काज़ी ने रंगकर्म को बाय-बाय कह दिया था लेकिन तब भी भारतीय (विशेषकर हिंदी) रंगमंच में उनकी धमक बरक़रार रही और रहेगी भी। उनके नाटकों के प्रोडक्शन, उनकी रंग परिकल्पनाएँ (स्टेज क्राफ़्ट), उनके पैदा किये अभिनेतागण और सबसे ज़्यादा उनका बनाया संस्थान- नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय रंगमंच के 'आर्काइव' में उनके अमिट योगदान की गाथा सुनाते रहेंगे। नाटकों को अलविदा कहने के बाद 'कला पारखी' के रूप में उन्होंने अपनी नई पहचान से देश को अवगत कराया। अस्सी के दशक में 'डिज़ायनों' पर आई उनकी किताबें और दिल्ली में उनकी 'आर्ट हैरिटेज गैलरी' की स्थापना- अल्काज़ी का व्यक्तित्व और प्रतिरूप दोनों ही जगहों पर साफ़-साफ़ झलकता है।

अल्काज़ी का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने छितरे-बिखरे भारतीय रंगकर्म को अनुशासनबद्ध किया। निर्देशक और शिक्षक के रूप में उन्होंने आधुनिक रंगमंच को शास्त्रीय निबद्धता प्रदान की। आलीशान रंग परिकल्पनाओं वाले सेट निर्माण और जादुई रंगदीपन (स्टेज लाइटिंग) के बीच शास्त्रीयबद्ध 'ब्लॉकिंग' और 'मूवमेंट्स' में उनके अभिनेता का आरूढ़ संचालन महानगरों के रंगकर्मियों और दर्शकों को तो चौंधियाता रहा ही, हिंदी के छोटे शहरों के रंगकर्मियों और निर्देशकों के लिए भी प्रेरणा बिंदु बना रहा।

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'बॉम्बे नाट्य अकेडमी' के प्रिंसिपल के रूप में उन्होंने शास्त्रबद्ध थिएटर की जिस छोटी सी वाटिका को संजोया था, 'एनएसडी' के बड़े मंच और खुले हाथ से ख़र्च करने को मिलने वाले बजट ने उसे वृहद बग़ीचे में परिवर्तित कर दिया। उसमें उगने वाले फूलों की सुगंध समूचे देश में पसर गयी और अल्काज़ी 'इंडियन मॉडर्न थिएटर' के 'मोनार्क' (सम्राट) बन गए।

उनके हाथों सँवारे गए उनके शिष्यों में नामचीन निर्देशक के रूप में उभरे बी वी कारंथ, विजया मेहता, सई परांजपे, बंसी कॉल, एम के रैना, रामगोपाल बजाज, देवेन्द्रराज अंकुर, प्रसन्ना, रतन थियम, बृजमोहन शाह, भानु भारती, सतीश कौशिक, तिग्मांशु धूलिया आदि हैं। इसी तरह उनके चरणों में बैठकर शानदार अभिनेता के रूप में विकसित होकर देश भर में ख्याति बटोरने वालों में ओम शिवपुरी, नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, रोहिणी हटंगणी, अनुपम खेर, राज बब्बर, पंकज कपूर, नीना गुप्ता, मनोहर सिंह आदि-आदि हैं।

इब्राहिम अल्काज़ी ने न सिर्फ़ अपनी रंग परिकल्पना को 'प्रोसीनियम' थिएटर की चाहरदीवारी में की गयी अपनी दर्जनों प्रस्तुतियों में रचाया-संवारा बल्कि खुले रंगमंच पर भी उसे अद्भुत विस्तार प्रदान किया। दिल्ली के पुराने क़िले के भीतर गिरीश कर्नाड के 'तुग़लक़' की प्रस्तुति हो या रवींद्र भवन के खुले मंच पर मोहन राकेश के 'आषाढ़ का एक दिन' जैसी तमाम प्रस्तुतियाँ, दर्शकों के लिए ये परफ़ॉर्मेंस अगले दो या ढाई घंटे जादू बरसने वाली साबित होती थीं जिनमें वह उतनी देर आकंठ डूबा रहता था।   

नाट्य सम्राट ने न सिर्फ़ रंगकर्मियों के लिए एक शास्त्र का निर्माण किया, उन्होंने दर्शकों के लिए भी एक अनुशासन का विधान तैयार किया था।

उनकी प्रस्तुतियों के शुरू हो जाने के बाद दर्शकों को प्रवेश की अनुमति नहीं होती थी चाहे वह कितना ही बड़ा सूरमा क्यों न हो। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी उनका नाटक देखने जब 10 मिनट के विलम्ब से पहुँचीं तो उन्हें स्वयं निर्देशक ने बैरंग उनकी कार तक वापस छोड़ा।

ये सारी ख़ूबियाँ हैं जो उन्हें भारतीय रंगमंच की महान विभूति के रूप में खड़ा करती हैं। उनका आकलन करते समय लेकिन उनकी उन नकारात्मकताओं की भी चर्चा करनी ज़रूरी है जिसके चलते वह जाने-अनजाने भारतीय (ख़ासकर हिंदी) रंगकर्म की दुनिया के गुनहगार भी साबित हुए।

आज़ादी के बाद से इस बात की कोशिशें हो रही थीं कि दिल्ली में थिएटर और प्रस्तुति कलाओं का एक राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किया जाये। 'संगीत नाटक अकेडमी' की बैठकों में (अध्यक्ष की हैसियत से) प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस बाबत प्रायः अपनी चिंताएँ प्रकट करते थे। 'भारतीय नाट्य संघ' ने 'यूनेस्को' की सहायता से 1958 में 'एटीआई' (एशियाई थिएटर इंस्टीट्यूट) की स्थापना की। अगले ही साल 'एटीआई' का प्रभुत्व 'संगीत नाटक अकेडमी' को दे दिया गया। 'संगीत नाटक अकेडमी' के नेतृत्व में ही अगले साल 'एटीआई' को 'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' में तब्दील कर दिया गया 2 वर्ष के लिए जिसके पहले निदेशक सेतु सेन बने। सन 1962 में इसकी कमान संभालने के लिए इब्राहिम अल्काज़ी बंबई से दिल्ली लाए गए। 

चुनौतियाँ

कहा जाता है कि चार्ज लेने के तुरंत बाद 'संगीत नाटक अकेडमी' के अध्यक्ष की हैसियत से पंडित नेहरू से हुई पहली भेंट में ही उन्होंने 'स्कूल' की अपनी परिकल्पना पर विस्तार से चर्चा की। बताया जाता है कि पंडित नेहरू ने कहा कि वह चाहते हैं कि 'स्कूल' भारतीय रंगमंच की अवधारणा का प्रतिरूप बने और इसके केंद्र में हिंदी रंगमंच हो। 

पुणे में जन्मे और बंबई में सक्रिय रहे इब्राहिम अल्काज़ी की समस्या यह थी कि भारतीय रंगमंच का अभी तक का उनका सफर हिंदी से कोसों दूर था लेकिन उनके सामने चुनौती हिंदी रंगमंच को केंद्र में रख कर विकसित होने वाले राष्ट्रीय 'नाट्य प्रशिक्षण संस्थान' को स्थापित करने की थी।

यहीं से उनके क्रियाकलापों में जो अंतर्विरोध पैदा हुए, उसने न तो हिंदी रंगमंच को उसकी अपनी मिट्टी में रचे-बसे रंगकर्म के अनुरूप विकसित होने दिया और न ही वह बहुभाषी-बहुसांस्कृतिक राष्ट्र का रंगकर्म बना सके।

इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंदी पट्टी में 100 सालों से अपनी धरती पर फलने-फूलने वाला शहरी हिंदी रंगकर्म अल्काज़ी के 'मॉडर्न थिएटर' की चकाचौंध को 'कूद-कूद' कर थामने के लालच में अपने हाथ-पाँव तुड़वा बैठा। छोटे-छोटे हिंदी शहरों के रंगकर्मियों और दर्शकों को शुरू-शुरू में तो लगा कि यह 'दमक रहा है' लेकिन अंततः नतीजे जो सामने आए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी जड़ों से कटता चला गया और 2 ही दशकों में सूख कर मुरझा गया।

थिएटर में कॅरियर

जब थिएटर नहीं बचेगा तो थिएटर में कॅरियर कहाँ बचेगा? इब्राहिम अल्काज़ी के अपने निर्देशकीय काल में ही हिंदी रंगकर्म बिखराव की उलटी सीढ़ी गिरने लगा था। उनके अपने शिष्यों का बड़ा समूह 'पासआउट' करते ही थिएटर को धता बताकर मुंबई फ़िल्म उद्योग की राह भागने लगा था। अल्काज़ी इसे देख रहे थे। थिएटर का यह 'तुग़लक़' अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को किरिच-किरिच बिखरते नहीं देख सकता था। उनके 'स्कूल' छोड़ने की मुख्य वजह यही है, कारण जो भी बताये जाते रहे हों। बाद में तो हालत यह हुई कि 'ड्रामा स्कूल' के छात्र अंतिम वर्ष की परीक्षाओं की लिस्ट निकलते ही महीनों पहले अंतिम दिन की परीक्षा वाली शाम का मुंबई का रेल रिज़र्वेशन करवा लेते ताकि उनके कॅरियर की प्रगति में एक दिन की भी देरी न हो जाये। 

फ़िल्मों में काम करना कोई सांगेय अपराध नहीं है लेकिन तब उसके लिए 'पूना फ़िल्म संस्थान' जैसे केंद्र होने चाहिए। 'एनएसडी' हिंदी फ़िल्मों के लिए सॉफ्टवेयर बनाए, यह कहीं से तर्कसंगत नहीं और इसकी वजह ही यही है कि हिंदी थिएटर मृतप्राय है और वहाँ जाकर 'एनएसडी' का स्कॉलर करे तो क्या करे?

आज़ादी के बाद ज़रूरत इस बात की थी कि हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के रंगकर्म को उनकी अपनी मिट्टी में रोपने, उन्हें पुष्प-पल्लवित होने की छूट मिले। अल्काज़ी को न तो उस मिट्टी का अंदाज़ था न ही उनका वैसा प्रशिक्षण ही था। 

उनके बाद भारत सरकार की स्कॉलरशिप पर 'राडा' जाने वाले दूसरे भारतीय रंगकर्मी हबीब तनवीर थे। हबीब तनवीर ने उस कोर्स को बीच में ही छोड़ने के लिए लन्दन स्थित भारतीय उच्चायोग को आवेदन किया। उनकी दलील थी कि जिस क़िस्म का प्रशिक्षण उन्हें यहाँ दिया जा रहा है, वह उनकी भारतीय पृष्ठभूमि में नहीं चलने वाला, अतः यहाँ समय बर्बाद करने का कोई अर्थ नहीं। 

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तत्कालीन उच्चायुक्त की समझ में उनकी दलील नहीं आयी, उन्होंने उन्हें फटकार कर पढ़ाई जारी रखने के लिए वापस भेज दिया। हबीब साहब बेमन से वापस लौट आये। कुछ दिनों बाद नए उच्चायुक्त की नियुक्ति पर यह फिर अपना आवेदन लेकर पहुँच गए। यह शख़्स कुछ ज़्यादा संवेदनशील था। उसने इन्हें बुलवाकर इनकी समस्या पूछी। हबीब तनवीर ने उदाहरण के तौर पर अपने कंधे उचकाकर दिखाया कि यह मानवीय पद्धति सिर्फ़ यूरोपीय इंसानों पर ही लागू हो सकती है, भारतीय इंसान पर नहीं। जब हम अभिनय में इस शैली का इस्तेमाल करेंगे तो हमारा भारतीय दर्शक इसे स्वीकार नहीं करेगा। यही फर्क़ पूरे रंगकर्म का है।

उच्चायुक्त की समझ में फ़ौरन पूरी बात आ गयी और उन्होंने उनको 'रिलीव' किये जाने की सिफ़ारिश कर दी और इस तरह हबीब तनवीर अपना खूँटा तुड़ा कर लन्दन से भाग कर भारत आये और यहाँ उन्होंने अपने 'छत्तीसगढ़ी' लोक रंगमंच को विकसित किया, जो उनके अपने छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रचा- बसा था और जिसके दम पर उन्होंने सारा देश और दुनिया नाप ली थी। 

अल्काज़ी साब यही नहीं कर पाए।

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