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कौशलेंद्र प्रपन्नफ़ेसबुक/पंकज चतुर्वेदी

शिक्षा पर कौशलेंद्र प्रपन्न के सवाल से ‘घबरा’ गया था सिस्टम?

कौशलेंद्र प्रपन्न ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। मालूम हुआ कि उन्हें नौकरी से निकाला गया। बाद में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। यह कोई बड़ी ख़बर नहीं बन सकती। इस घटना और उनकी मौत के बीच कार्य कारण संबंध स्थापित करना मुमकिन नहीं। लेकिन क्या उनके अधिकारी एक बार आईना देखते वक़्त कौशलेंद्र को याद कर पाएँगे? उनके साथ जो बर्ताव उन्होंने किया, क्या उसके लिए उन्हें एक पल को भी पछतावा होगा?
अपूर्वानंद

कौशलेंद्र प्रपन्न नहीं रहे। दिल के दौरे के बाद अस्पताल में मौत से जूझते हुए उन्हें हार माननी पड़ी। लेकिन यह हार कोई उनकी हार नहीं है। मौत से शायद ही कोई जीत पाया है। कौशलेंद्र की मृत्यु तकनीकी रूप से दिल के दौरे के बाद की पेचीदगियों से हुई। इसके लिए किसी व्यक्ति या संस्था को किसी भी अदालत में ज़िम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी कौशलेंद्र की मौत से जुड़े हुए सवाल हैं जिनका जवाब अगर हम न दें या अगर उनका सामना हम न करें तो मान लेना चाहिए कि दिमाग़ी तौर पर हम मृत हो चुके हैं।

कौशलेंद्र शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय थे, वह भी स्कूली शिक्षा। यह एक ऐसा इलाक़ा है जिसे आप महतोजी का दालान या खाला का घर कह सकते हैं जिसमें घुस आने और जम जाने के लिए आपको किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं होती। इसलिए वह बैंक हो या कोई कंपनी या अख़बार, सभी शिक्षा के क्षेत्र में कुछ न कुछ करते हुए दिखलाई पड़ते हैं। बल्कि ये सब अब शिक्षा के सिद्धांतकार भी बन चुके हैं। वे शिक्षकों का प्रशिक्षण भी कर रहे हैं, यह भी बता रहे हैं कि स्कूल किस क़िस्म के होने चाहिए और पाठ्यक्रम कैसे बनाए जाएँ।

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ये सारी कम्पनियाँ सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाने के नाम पर बस एक काम जानती हैं, और वह है शिक्षा। इनके पास जो पैसा है, वह इन्हें शिक्षा में नेता भी बना देता है। बड़े से बड़े शिक्षाविद भी इन्हें मान्यता देने में गुरेज़ नहीं करते।

कौशलेंद्र इन्हीं में से एक में काम कर रहे थे। वह क़ाबिल थे। शिक्षा के मामलों पर उनकी पेशेवर पकड़ थी। इसके अलावा वह उन कुछ चुने हुए लोगों में थे जो लगातार लिखते भी थे। यह अलग से कहना ज़रूरी नहीं होना चाहिए फिर भी कहना पड़ता है कि वह हिंदी में लिखते थे। क्योंकि अंग्रेज़ी में शिक्षा पर लिखने पर ही आप उसके विशेषज्ञ माने जाते हैं, हिंदुस्तानी ज़ुबान में लिखने पर आपको पत्रकार या आपके लेखन को अख़बारी कह दिया जाता है। मानो, आप अगर हिंदी में लिखें तो वह शिक्षा का ज्ञान नहीं है, वह अंग्रेज़ी में पैदा किए गए ज्ञान का जनसाधारण के बीच प्रचार या वितरण है। आम तौर पर इस शिकायत को किसी हीन भावना का परिचायक बताया जाता है। कौशलेंद्र में यह हीन भावना नहीं थी।

स्कूली इलाक़े में हर कोई शिक्षक को कुछ न कुछ सिखाने पर आमादा रहता है। उसे शिक्षा के दर्शन, उसके उद्देश्य से कोई लेना देना नहीं, वह उसे लेन देन के रिश्ते में ही समझ सकता है। चूँकि अभी भी स्कूली शिक्षा पर सरकारों का नियंत्रण है, ये कॉरपोरेट संस्थाएँ सरकारी स्कूलों को सुधारने या उनकी मदद करने में एक-दूसरे से होड़ करती हैं। क्या निजी, व्यावसायिक मक़सद से खोले गए स्कूलों को किसी सुधार या मदद की दरकार नहीं?

कौन थे कौशलेंद्र?

इन संस्थाओं को ऐसी प्रतिभाओं की ज़रूरत रहती है जो अपनी पेशेवर दक्षता के बल पर इनके हस्तक्षेप को वैधता दिला सकें। कौशलेंद्र ऐसी ही प्रतिभा थे।

वह सिर्फ़ नौकर नहीं थे। बुद्धिजीवी थे, लिखते थे, कम्पनी के प्रवक्ता की तरह नहीं आज़ाद दिमाग़ की तरह। वरना वह सरकार के प्रति आलोचनात्मक स्वरवाले लेख नहीं लिखते।

मालूम हुआ कि हिंदी के एक अख़बार में लिखी उनकी एक टिप्पणी से उनकी कंपनी घबरा गई कि कहीं सरकार उसका हुक्का-पानी बंद न कर दे। इस कारण कौशलेंद्र के अधिकारियों ने अपनी नाराज़गी तो जताई ही, कौशलेंद्र को बाध्य कर दिया कि वह इस्तीफ़ा दे दें।

एक निम्न मध्य वित्त पृष्ठभूमिवाले मध्यवर्ग के व्यक्ति के लिए यह इतना आसान नहीं, फिर भी कौशलेंद्र ने अपनी आज़ादी की क़ीमत देना ही मुनासिब समझा।

इस घटना के कुछ दिन बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह अस्पताल से लौट न सके। हिंदी में शिक्षा की समझ की जगह और सिकुड़ गई। लेकिन यह क्या कोई ऐसा नुक़सान है जिसपर हम अपनी नींद हराम करें? इसका रोना ज़रूर रोया जाता है कि हिंदी में ज्ञान सृजन नहीं होता, लेकिन जिसमें यह ताक़त है उसके लिए इस समाज में कोई इत्मीनान नहीं! वह एक के बाद दूसरी नौकरी के लिए भटकता रहता है।

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कौशलेंद्र ने अपनी टिप्पणी में कोई रहस्योद्घाटन नहीं किया था, कोई क्रांतिकारी बात नहीं कही थी, सरकार का कोई राजफ़ाश नहीं किया था। वह कहा था जो अरसे से सरकारी दस्तावेज़ भी कहते चले आए हैं। वह यह कि सिर्फ़ कम्प्यूटर, स्मार्ट बोर्ड, स्मार्ट फ़ोन और निगरानी के कैमरे लगाकर और नए आँकड़े पैदा करके शैक्षणिक सुधार नहीं होता, यह सब आख़िरकार शिक्षक के उस वक़्त की क़ीमत पर किया जाता है जो उसे स्कूल में, छात्रों के साथ लगाना है। शैक्षिक कार्य के अलावा ढेर सारे दूसरे काम से उसे दबाव देना यह मानकर कि उसे किसी मानसिक अवकाश की ज़रूरत नहीं, यह मानकर कि वह छात्रों के माँ बाप का भी नौकर है, उसका अपमान है और यह उसे हतोत्साह ही करता है।

यह जो मैंने लिखा, वह सब सुना हुआ है। कौशलेंद्र ने सिर्फ़ इनकी याद दिलाई। हर सरकार को दुबारा, तिबारा यह सब याद दिलाना ही पड़ता है। यह पढ़कर उनके अधिकारी घबरा गए। उन्हें इसपर भी ऐतराज़ था कि कौशलेंद्र सिर्फ़ नौकरी नहीं बजाते, अपना दिमाग़ रखते हैं और अपनी ज़ुबान भी। उन्हें इस वजह से लानत-मलामत झेलनी पड़ी।

यह कोई बड़ी ख़बर नहीं बन सकती। जैसा मैंने कहा, इस घटना और उनकी मौत के बीच कार्य कारण संबंध स्थापित करना मुमकिन नहीं। लेकिन क्या उनके अधिकारी एक बार आईना देखते वक़्त कौशलेंद्र को याद कर पाएँगे? उनके साथ जो बर्ताव उन्होंने किया, क्या उसके लिए उन्हें एक पल को भी पछतावा होगा?

क्या उस मीडिया वेबसाइट को पश्चाताप होगा जिसने इस ख़बर को लगाया, फिर उतार दिया। यह वजह बताकर कि उनके पास उस कंपनी का पक्ष नहीं है जिसपर आरोप है कि उसने कौशलेंद्र के साथ दुर्व्यवहार किया! क्या यही वजह थी या कुछ और?

हम सबके पास जो हमने किया, उसके लिए काफ़ी तर्क हैं लेकिन वह सब कुछ एक ग़लत को जायज़ साबित करने की जुगत है। वह चतुराई है लेकिन हमें मालूम है कि कौशलेंद्र की मृत्यु इस समाज के इन सभी सभ्य तबक़ों के क्रूर स्वार्थ, आपराधिक धोखाधड़ी और कायरता के बिना सम्भव नहीं थी।

अपूर्वानंद
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