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बीजेपी ने ‘मैं भी अन्ना’ की नक़ल मारकर बनाया ‘मैं भी चौकीदार’

गलियाँ बोली मैं भी अन्ना, कूचा बोला मैं भी अन्ना।

समय देखकर, काम छोड़कर जनता बोली - मैं भी अन्ना।। 

भ्रष्ट तंत्र का मारा बोला, महंगाई से हारा बोला। 

बेबस और बेचारा बोला, मैं भी अन्ना-मैं भी अन्ना।। 

अगस्त 2011 में यह नारा देश की गली-गली में गूंजा था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी सोच रही है कि अब ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा गूंजे और उसकी सत्ता में वापसी हो जाए। इस नारे को जारी करने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी पूरी सरकार, भारतीय जनता पार्टी और उसका ‘मीडिया’ यह दावा करते रहे कि रफ़ाल में कोई घोटाला नहीं है और देश की जनता तो उसके बारे में जानती भी नहीं है। 
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तमाम चैनल सर्वे दिखाते रहे कि चुनावों में रफ़ाल कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी और उसके अध्यक्ष ने ‘चौकीदार चोर है’ का जो राग शुरू किया उसे विराम ही नहीं दिया। नारों का हमारे देश में एक अलग ही महत्व है।
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, लेकिन हमारे देश में जब चुनाव आते हैं तो सरकारें अपने काम को लेकर जनता के बीच में जाने के बजाय किसी नारे की तलाश में जुट जाती हैं।
घोर मंथन के बाद सरकारें एक नारा गढ़ती हैं और जनता के बीच उसे उछालकर स्वप्न दिखाने और सहानुभूति बटोरने का काम करती हैं। ग़रीबी हटाओ, इंदिरा लाओ देश बचाओ, अच्छे दिन आएँगे जैसे नारे सत्ता दिलाने में सफल रहे तो इंडिया शाइनिंग या फ़ील गुड ने सत्ता का स्वाद किरकिरा कर विपक्ष में बैठा दिया। दरअसल, नारे लोगों में जोश भरने का काम करते रहे हैं और आंदोलन खड़ा करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। 
बाल गंगाधर तिलक का नारा ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा’ ने ना सिर्फ़ ब्रितानिया सरकार के ख़िलाफ़ आजादी के संघर्ष को एक नई दिशा दी बल्कि ए. ओ. ह्यूम की उस कांग्रेस का चरित्र ही बदल दिया जिसकी स्थापना अंग्रेजी हुकुमत के सलाहकार की भूमिका निभाने के लिए की गई थी।
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भगत सिंह का इंकलाब जिंदाबाद, महात्मा गाँधी का करो या मरो - अंग्रेजों भारत छोडो, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का - ‘चलो दिल्ली’ ऐसे नारे थे जिनकी छाप देश के जनमानस पर पड़ी और इतिहास रचा। लेकिन लोकतांत्रिक भारत में नारे सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियों तक ही सीमित रह गए। 
ग्लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ तो नारे भी नए बनने लगे और उनमें से मज़दूर-किसान और नौजवानों के संघर्ष की कहानी ग़ायब हो गई।

‘मैं भी अन्ना’ का हुआ गहरा असर

2011 में एक नारा आया और उसमें देश के मज़दूर-किसान और नौजवानों का ना सिर्फ़ दर्द छलका, बल्कि वे घर से निकलकर सड़क पर आए। यह नारा उठा जनलोकपाल आन्दोलन से और नारा था - ‘मैं भी अन्ना’। यह नारा किसी राजनीतिक दल ने नहीं दिया था लेकिन इसका देश के जनमानस पर जो असर दिखा वह बहुत गहराई तक पहुँचा था। 

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अन्ना आंदोलन में उमड़े लोग 

फ़ुटपाथ से लेकर आलीशान दफ़्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों से लेकर छात्रों तक देश के हर तबके़ ने इस आंदोलन के समर्थन में नारा बुलंद किया। लोग अपना रोज़गार और कामकाज छोड़ कर आंदोलन को समर्थन देने के लिए दिल्ली पहुँचे। जो दिल्ली नहीं पहुँच सके उसने अपने शहर की रैलियों में हिस्सा लिया। 13 दिन तक देश के टीवी चैनलों ने लगातार अन्ना और उनके आंदोलन पर ही अपना ध्यान लगाए रखा और पल-पल की घटनाओं से देश को वाकि़फ़ कराते रहे। अन्ना की टोपी पूरे देश की एक राष्ट्रीय पहचान बन गई और अब लोग इसी टोपी के सहारे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के अभियान पर निकल पड़े थे। 

‘मैं भी अन्ना’ कहने पर लोग गर्व महसूस करने लगे थे। इस नारे और आंदोलन ने देश की सबसे पुरानी और मजबूत राजनीतिक पार्टी जो कभी 400 से ज़्यादा लोकसभा सीटें जीती थी, को 44 के आंकड़े पर ला दिया था।

‘चौकीदार चोर है’ को फ़ेल करने की कोशिश

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष का रूप ले चुके ‘मैं भी अन्ना’ नारे की तर्ज पर बीजेपी ने अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए नारा गढ़ा है, ‘मैं भी चौकीदार’। बीजेपी का यह नारा कांग्रेस के नारे, ‘चौकीदार चोर है’ को फ़ेल करने के लिए बनाया गया है और इसके द्वारा यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बीजेपी के नेता-पदाधिकारी सभी चौकीदार हैं और भ्रष्टाचार पर नज़र रखते हैं।

बीजेपी शायद अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से ‘मैं भी चौकीदार’ नारे को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाने की कोशिश करेगी। लेकिन क्या जनमानस पर यह नारा ‘मैं भी अन्ना’ वाला प्रभाव उकेर पाएगा?

दरअसल, ‘मैं भी अन्ना’ नारा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष का एक विचार बन गया था। उसकी सफलता के पीछे जो एक बड़ी वजह थी, वह यह कि उस दौर में सरकार के नित नए घोटाले उजागर हो रहे थे। जबकि आज रफ़ाल प्रकरण में रोज नए तथ्य सामने आ रहे हैं और सत्ताधारी दल अपने आप को ईमानदार साबित करने के लिए ‘चौकीदार’ बनने की कोशिश कर रहा है। 

मोदी राज में विदेश भागे लुटेरे 

नरेंद्र मोदी के लिए चौकीदार शब्द कोई नया नहीं है। साल 2014 में जब वह सत्ता पाने के लिए प्रचार कर रहे थे तब उन्होंने देश के खजाने की चौकीदारी करने की बात जनसभाओं में की थी। लेकिन उनकी चौकीदारी में विजय माल्या, ललित मोदी, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी जैसे दर्जनों घोटालेबाज देश का पैसा लूटकर भाग चुके हैं। 

इन घोटालेबाजों के कर्ज का ठीकरा नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रियों ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के सिर मढ़ने का बहुत प्रयास भी किया लेकिन सफल नहीं हो पाए। ऐसे में अब ‘मैं भी चौकीदार’ लोगों को कितना लुभा पाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। 

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संजय राय
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