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जातिवाद और परिवारवाद की भेंट चढ़ गया लालू-मुलायम का समाजवाद

मुलायम और लालू ने समाजवाद से जो यात्रा शुरू की थी वह जातिवाद की टूटी-फूटी सड़क से होकर परिवारवाद पर आकर ख़त्म होती दिखाई दे रही है। फिलहाल जिस तपती ज़मीन पर दोनों पार्टियाँ पहुँच गई हैं, वहाँ से आगे का रास्ता तो है लेकिन आसान नहीं है। क्या आखिलेश और तेजस्वी अपनी ज़मीन को बचाने के लिए उतनी मेहनत कर सकते हैं जितनी मेहनत मुलायम और लालू करते थे। 
शैलेश

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की हार के साथ ही समाजवादी आंदोलन का एक युग समाप्त होता दिखाई देता है। ये दोनों ही पार्टियाँ अपनी पूर्ववर्ती समाजवाद समर्थक पार्टियों के गर्भ से पैदा हुई थीं और देश के पिछड़ा वर्ग आंदोलन का हरावल दस्ता बन कर उभरी थीं। देश भर में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के व्यापक दर्शन से आरंभ होकर ये पार्टियाँ अंतत: परिवारवाद की दहलीज पर दम तोड़ती दिखाई दे रही हैं।
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ऐसा नहीं है कि यह हस्र सिर्फ़ इन्हीं दो पार्टियों का हो रहा है। स्वाधीनता आंदोलन की ध्वजवाहक कांग्रेस, तेलगू अस्मिता के रूप में उभरी तेलगू देशम और राष्ट्रवाद के व्यापक उद्घोष के साथ जन्मी राष्ट्रवादी कांगेस पार्टी भी कमोबेश स्मृति शून्य की स्थिति में है। उनके पीछे-पीछे तमिलनाडु की डीएमके और तेलंगाना राष्ट्र समिति भी इसी राह पर है। यह अलग बात है कि इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन ने अभी उनकी बुनियाद को बचा लिया है।   
सबसे पहले समाजवादी पार्टी पर गौर करते हैं। इसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक उत्थान डॉ.राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन से हुआ। लोहिया स्वतंत्रता संग्राम की उपज थे। लोहिया ने एक स्वतंत्र समाजवादी अर्थव्यवस्था की कल्पना की थी जो सामंतवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ थी लेकिन समाजवादी व्यवस्था से अलग थी। यानी पूँजी और निजी संपत्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था में जगह थी लेकिन वह ज़मींदारी और शोषण के ख़िलाफ़ थी। 
मुलायम ने आगे चलकर लोहिया के संघर्ष को आगे बढ़ाया। यह लोहिया का ही नारा था ‘सैकड़े में साठ’ मतलब यह कि लोहिया ने पिछड़े वर्गों के लिए साठ फ़ीसदी आरक्षण की माँग की थी। अस्सी के दशक में यह आंदोलन तेज़ी से उभरा। इसी के साथ मुलायम आगे बढ़ते गए।
1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करके पिछड़ों को आरक्षण देने की शुरुआत होते ही मुलायम और लालू दोनों का ग्राफ़ तेज़ी से ऊपर गया। जनता दल को पीछे छोड़ कर मुलायम ने समाजवादी पार्टी की और लालू ने राष्ट्रीय जनता दल की नींव रखी। आरंभ में इन दोनों को सभी जातियों के समाजवादियों का समर्थन मिला। मुलायम सिंह यादव के साथ बेनी प्रसाद वर्मा (कुर्मी), जनेश्वर मिश्र ( ब्राह्मण) राम शरण दास (गूजर) और मोहन सिंह (राजपूत) जैसे बड़े नेता मौजूद थे। उधर, बिहार में लालू भी शिवानंद  तिवारी (ब्राह्मण), रघुवंश प्रसाद सिंह (राजपूत), नीतीश कुमार (कुर्मी) जैसे तेज़-तर्रार नेताओं की मदद से आगे बढ़े। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव में इनका दबदबा बढ़ा और जीत का स्वाद चखा, वैसे-वैसे इनका आधार संकुचित होने लगा। दोनों ही लम्बे समय तक सभी पिछड़ों के नेता नहीं बने रह सके।
दरअसल, चुनावी जीत के लिए दोनों ही दलों ने एम-वाई का नया फ़ॉर्मूला खोज लिया। एम-वाई का मतलब है मुसलिम और यादव। कुछ समय तक ग़ैर यादव पिछड़ी जातियाँ इनके साथ बनीं रहीं, लेकिन धीरे-धीरे अन्य जातियों का मोहभंग होना शुरू हो गया।
मुलायम और लालू पर आरोप है कि सत्ता मिलने के बाद उन्होंने ज़्यादातर मलाई यादवों को और खुरचन मुसलमानों को दी। ग़ैर यादव पिछड़ों की दुखती रग पर सबसे पहले हाथ रखा नीतीश कुमार ने। नीतीश ने अति पिछड़ा और अति दलित का नया समीकरण खोज निकाला।
नीतीश ख़ुद भी कुर्मी और अति पिछड़े वर्ग से आते हैं। अपने नए सामाजिक समीकरण से नीतीश ने रामविलास पासवान पर भी निशाना साधा। दलितों में पासवान सबसे ज़्यादा समृद्ध हैं। नीतीश ने दूसरी दलित जातियों को अपने साथ जोड़ा और उनका नया नेता खोज निकाला। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी मुसहार समाज से आते हैं जो दलितों में भी सबसे पीछे हैं। उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं को आगे बढ़ाने में भी नीतीश की भूमिका रही है।
मुलायम जब राजनीति में स्थापित हो गए और समाजवादी पार्टी अपने बूते पर बहुमत लाने की स्थिति में आ गयी तो उनका उदार समाजवाद सिकुड़ने लगा। धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी में मुलायम परिवार का वर्चस्व बढ़ने लगा।
मुलायम के भाई शिवपाल यादव पार्टी संगठन में सबसे मज़बूत हो गए। दूसरे भाई राम गोपाल यादव का रुतबा भी बढ़ा। आगे चलकर जब उत्तराधिकारी चुनने की बारी आयी तब मुलायम ने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी दे दी। अखिलेश के पास कोई ख़ास राजनीतिक अनुभव नहीं था। उनमें मुलायम जैसी राजनीतिक समझ और दक्षता भी नहीं थी, लेकिन उत्तराधिकार उन्हीं को मिला। नाराज़ शिवपाल यादव ने पार्टी से अलग हो कर अपनी पार्टी बना ली। यही हाल लालू यादव का भी था। चारा घोटाले में गिरफ्तारी की नौबत आयी तो पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं और समाजवादी साथियों को पीछे धकेल कर उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। और 2017 के चुनावों के बाद बेटे तेजस्वी यादव को नीतीश सरकार में उप मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवा दी। बड़े बेटे तेजप्रताप को भी मंत्री बनाया गया।
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ख़ैर, नीतीश के साथ गठबंधन ज़्यादा नहीं चल सका और राष्ट्रीय जनता दल को सरकार से बाहर होना पड़ा। लालू के जेल में होने के कारण तेजस्वी यादव पार्टी के प्रमुख भी हो गए। तेजस्वी को अभी राजनीतिक अनुभव नहीं है। महागठबंधन बना कर तेजस्वी ने एक राजनीतिक दाँव की रचना तो की लेकिन नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे माहिर खिलाड़ियों का दाँव भारी पड़ा है।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश ने मायावती से हाथ मिलाकर पार्टी को उभारने की कोशिश की लेकिन मोदी लहर ने उनके गठबंधन को भी ज़्यादा आगे नहीं आने दिया। मायावती ज़रूर फ़ायदे में रहीं जिनके सांसदों की संख्या दस तक पहुँच गई। जबकि 2014 में वह शून्य पर थीं।
और इस तरह मुलायम और लालू ने समाजवाद से जो यात्रा शुरू की थी वह जातिवाद की टूटी-फूटी सड़क से होकर परिवारवाद पर आकर ख़त्म होती दिखाई दे रही है। फिलहाल जिस तपती ज़मीन पर दोनों पार्टियाँ पहुँच गई हैं, वहाँ से आगे का रास्ता तो है लेकिन आसान नहीं है। क्या आखिलेश और तेजस्वी अपनी ज़मीन को बचाने के लिए उतनी मेहनत कर सकते हैं जितनी मेहनत मुलायम और लालू करते थे। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके पास कोई ऐसी योजना है जिसके जरिए बाक़ी जातियाँ खासकर ग़ैर यादव और दलितों को जोड़ा जा सके। सवर्ण जातियों में भी लोहिया के समाजवादी विचारधारा के समर्थकों की लंबी कतार है। क्या दोनों सुपुत्र उन्हें इकट्ठा कर पाएँगे।   
शैलेश
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