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जेएनयू हिंसा का विरोध: मुंबई के युवा क्या इतिहास दोहराएँगे?

कभी आंदोलनों की जन्म स्थली रही मुंबई देखते-देखते मायानगरी बन गयी और इस शहर को न थमने वाला शहर, आर्थिक राजधानी जैसी अनेक उपमाएँ दी जाने लगीं। देश के राष्ट्रीय मुद्दे रहे हों या बेरोज़गारी और श्रमिकों के सवाल सड़क पर उतर कर सरकार को चुनौती देने का जज़्बा ग़ायब-सा ही हो गया। जो छिटपुट आंदोलन होते भी थे तो जाति, आरक्षण तक ही सीमित रहे। यहाँ के कॉलेज और विश्वविद्यालयों को पिछले काफ़ी अरसे से छात्रसंघ की राजनीति से दूर रखने की वजह से यहाँ दिल्ली जैसे छात्र आंदोलन नहीं हुए। लेकिन आज मुंबई का युवा सड़कों पर उतरा है। यह युवा खड़ा हुआ है देश की राजधानी दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में घुसकर विद्यार्थियों के साथ मारपीट करने के मुद्दे पर।

एक पर्यटन स्थल के रूप में पहचान रखने वाले और शहर का प्रतीक गेट-वे ऑफ़ इंडिया पर पिछली रात जो तसवीर थी वह 'इंडिया गेट' जैसी नज़र आयी जो अक्सर आंदोलनों-धरनों-प्रदर्शनों का गवाह रहा है। बड़ी संख्या में युवा, विद्यार्थी जमा हुए और उन्हें साथ देने के लिए बॉलीवुड के सितारे और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग भी गेट-वे ऑफ़ इंडिया पहुँच गए। दक्षिण मुंबई के अधिकांश इलाक़ों में धरना-प्रदर्शन की इजाज़त नहीं है और उस क्षेत्र में स्थायी रूप से धारा 144 घोषित है, उसके बाद भी 36 घंटों तक विद्यार्थी यहाँ जमे रहे। 

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पुलिस ने सोमवार सुबह उनसे वहाँ से हटने की अपील की और बिना किसी बल प्रयोग के उनके आंदोलन को आज़ाद मैदान में स्थानान्तरित कर दिया। पुलिस के इस रुख़ में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के उस बयान का भी असर दिखाई दिया जिसमें उन्होंने जेएनयू पर हमले की निंदा की थी और कहा था कि देश का युवा यदि ग़ुस्से में है तो हमें उन्हें समझाने की ज़रूरत है न कि उनके ख़िलाफ़ बल प्रयोग कर मारने-पीटने की। 

यह पहली बार नहीं है कि मुंबई में विद्यार्थियों ने जेएनयू या किसी अन्य शैक्षणिक संस्थान में विद्यार्थियों के ख़िलाफ़ होने वाली कार्रवाई पर अपना विरोध दर्ज कराया। लेकिन पहले जहाँ विरोध के स्वर कॉलेज परिसर में ही दब कर रह जाते थे इस बार वे गेट-वे ऑफ़ इंडिया पर गूँजे और ज़ोर-शोर से गूँजे।

भले ही अधिकाँश न्यूज़ चैनल इस ख़बर को नहीं दिखाएँ लेकिन विद्यार्थियों का जो जज़्बा यहाँ देखने को मिला उसने संकेत दे दिया है कि दिल्ली ही नहीं, मुंबई में भी विरोध तेज़ होगा। इस विरोध के मज़बूती से खड़े होने का एक कारण यह भी है कि प्रदेश की सत्ता में नया गठबंधन है। आज सत्ताधारी तीनों पार्टियाँ अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के ख़िलाफ़ मुखर हैं। इसीलिए सड़कों पर शिवसेना का छात्र संगठन विद्यार्थी सेना भी उतरा तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के छात्र संगठन के पदाधिकारियों ने भी विरोध दर्ज कराया।

मुंबई में यदि यह विरोध का स्वर बढ़ा तो वाक़ई केंद्र की दिल्ली सरकार के लिए वह परेशानी का सबब ही साबित होगा। इसके पीछे एक कारण मुंबई से जन्मे आंदोलनों का इतिहास भी है।

मुंबई की भूमि से शुरू हुए लोकमान्य तिलक का 'स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' और महात्मा गाँधी के 'रौलेट एक्ट' का विरोध व 'भारत छोड़ो' आंदोलन ने देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यही नहीं, 1946 के 'नौसेना विद्रोह' या 'बम्बई विद्रोह' जिसमें तीन सौ नाविकों व नागरिकों ने अपनी जान की आहुति दी, ने अंग्रेज़ों की शीघ्र ब्रिटेन वापसी के लिए विवश कर दिया था। 22 फ़रवरी, 1946 को मुंबई के सबसे रक्तरंजित दिनों में गिना जाता है। इस दिन नौ सैनिकों के समर्थन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आम हड़ताल का आह्वान किया था। दक्षिण मुंबई की सड़कों पर अजब समाँ था। बैरकों से 'तलवार' जहाज की ओर तांता बंधा था और रास्तों में लोग अपने-अपने काम छोड़कर उसमें शामिल होते जा रहे थे। अनुमानत: इस दिन तीन लाख मज़दूर काम पर नहीं गए और विद्यार्थियों और दूसरे नागरिकों से मिलकर सड़कों पर बैरिकेड खड़े करके पुलिस और सेना से लोहा लेते रहे। बावर्ची, सफ़ाई कर्मचारी और नेवी बैंड के लोग भी हथियार लूटकर लड़ रहे थे। 

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मुंबई के केंटल ब्रांच और मराठा लाइट इन्फेंट्री के विद्रोही नाविकों के बीच फ़ायरिंग कई घंटे चलती रही। जहाजों के साथ गेट-वे ऑफ़ इंडिया और ताजमहल होटल के निकट स्थित रॉयल नेवी की कोस्टल ब्रांच में तैनात नाविकों ने अंग्रेज़ अफ़सरों को उनके कमरों और बाथरूम में बंद कर दिया। अंग्रेज़ इस बात को लेकर ख़ास डरे हुए थे कि लूटे हुए हथियारों और बारूद से कहीं विद्रोह कर रहे नाविक ताजमहल होटल पर ही हमला न कर बैठें। विद्रोह को सेना और पुलिस की टुकड़ियों ने बहुत बर्बरता से कुचला। दो दिन बाद जब ये हिंसक झड़पें थमीं, तो हताहतों का आँकड़ा देखकर लोग कांप गए। सरकारी अनुमान के मुताबिक़ ही इन संघर्षों में क़रीब तीन सौ लोग मारे गए और 1700 घायल हुए। असल संख्या दरअसल, इससे कहीं ज़्यादा आँकी गई है। इसी दिन सुबह 'हिन्दुस्तान' जहाज से आत्मसमर्पण कराने के लिए कराची में भी भारी लड़ाई हुई। विद्रोह की समाप्ति 23 फ़रवरी को समर्पण करने के रूप में हुई।

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आज़ादी के बाद सत्तर और अस्सी के दशक में जार्ज फर्नांडीस का रेल आंदोलन और दत्ता सावंत के नेतृत्व में मुंबई की कपड़ा मिलों में श्रमिकों की हड़ताल भी मुंबई के आंदोलन का एक ऐसा इतिहास है जिसने शास्रकारों को हिलाया है। वर्तमान में जेएनयू के अलावा नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर भी मुंबई में जो प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं वह लोगों के ग़ुस्से के रूप में देखे जा रहे हैं।

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