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क्या हम वास्तव में ग़रीबी को हरा रहे हैं? 

जुलाई के आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2016 के बीच भारत में 27.1 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी की हालत से बाहर आ गए। इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और कैम्ब्रिज पोवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव ने संयुक्त रूप से तैयार किया है और इसमें विश्व के 101 देशों में व्याप्त बहुआयामी ग़रीबी का वर्ष 2006 से 2016 के बीच का आकलन किया गया है। बहुआयामी ग़रीबी के आकलन में स्वास्थ्य, शिक्षा, हिंसा, संपत्ति, खाना पकाने के ईंधन, पोषण, स्वच्छता, बिजली, आवास और साफ़ पानी पर विशेष जोर दिया दिया जाता है। 
रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी ग़रीबी से निजात पाने में भारत ने सराहनीय काम किया है। वर्ष 2006 में जहाँ देश की 51.1 प्रतिशत आबादी ग़रीब थी वहीं 2016 में यह संख्या 27.9 प्रतिशत ही रह गयी। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि वर्ष 2006 से 2014 तक देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी, जबकि इसके बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार आयी। इसका सीधा सा मतलब है कि एक बड़ी आबादी को ग़रीबी रेखा से बाहर लाने में मनमोहन सिंह की सरकार ने सराहनीय काम किया था। भारत में 27.1 करोड़ आबादी ग़रीबी रेखा से बाहर आयी और यह संख्या दुनिया के किसी भी देश से अधिक है।
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दुनिया के 10 देश ऐसे हैं जिनकी कुल मिलाकर 1.3 अरब आबादी बेहद ग़रीब है, ये देश हैं - बांग्लादेश, कम्बोडिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो, इथियोपिया, हैती, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, पेरू और वियतनाम। इसमें से भारत ने सराहनीय प्रयास किया है पर दुनिया से ग़रीबी मिटाने के लिए अन्य देशों को भी युद्ध स्तर पर प्रयास करने होंगे।
ग़रीबी उन्मूलन का काम झारखंड जैसे बहुत पिछड़े क्षेत्रों में करने के लिए भारत की सराहना भी रिपोर्ट में की गयी है। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट ने मई, 2018 में बताया था कि अब भारत में बेहद ग़रीबों की सबसे बड़ी संख्या नहीं है, बल्कि यह जगह अब नाइजीरिया ने ले ली है। बेहद ग़रीब आबादी वह है, जिसकी दैनिक आय 1.9 डॉलर से कम है।
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ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट ने वैश्विक स्तर पर ग़रीबी की घड़ी का इजाद किया है, जिसमें किसी भी समय किसी भी देश में ग़रीबों की संख्या देखी जा सकती है। इस घड़ी के अनुसार मई 2018 में भारत में 7.06 करोड़ ग़रीब थे जबकि नाइजीरिया में यह आबादी 8.7 करोड़ थी। मई 2018 के पहले कई सालों तक दुनिया में ग़रीबों की सबसे बड़ी आबादी भारत में थी। भारत ने इस क्षेत्र में लगातार प्रगति की जबकि नाइजीरिया समेत अनेक अफ़्रीकी देश इस मामले में पिछड़ते जा रहे हैं। मई 2018 में भारत में प्रति मिनट 44 व्यक्ति ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ रहे थे जबकि इसी अवधि में नाइजीरिया में 6 लोग ग़रीब होते जा रहे थे।
भारत में अनुमान है कि वर्ष 2021 तक केवल 3 प्रतिशत आबादी ही ग़रीब रहेगी। अफ़्रीका में वर्तमान में दो-तिहाई आबादी ग़रीब है और यदि हालात ऐसे ही रहे तो वर्ष 2030 तक इसकी 90 प्रतिशत आबादी ग़रीब की श्रेणी में होगी।
एशिया में पहले चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम जैसे देशों ने ग़रीबी उन्मूलन के संदर्भ में सराहनीय प्रयास किये और अब भारत भी इसी दिशा में बढ़ रहा है। विश्व बैंक के अनुसार वर्ष 1990 के बाद से दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ गयी है। 

क्या सिर्फ़ आंकड़ों की बाजीगरी है?

अब सवाल यह उठता है कि क्या सही में हमने ग़रीबी मिटाने के लिए इतने काम किये हैं, या फिर यह भी आंकड़ों की बाज़ीगरी है। हमारे देश में बड़े शहर हों, कस्बे हों या फिर गाँव हों, हरेक जगह भूखे, कुपोषित, बेसहारा और बेरोज़गार लोगों की फ़ौज मिल जायेगी, बहुत बड़ी संख्या में लाचार किसान मिल जायेंगे। ग़रीबी से तंग आकर जितने किसान हमारे देश में आत्महत्या करते हैं उतने कहीं नहीं करते, फिर भी ग़रीबी पर विजय मिलना अटपटा ज़रूर लगता है।
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विश्व बैंक ने विकासशील देशों में ग़रीबी के आकलन के लिए कुछ वर्ष पहले प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय के पुराने आंकड़े 1.90 डॉलर को संशोधित कर 3.20 डॉलर कर दिया था। अब अधिकतर देश, जिसमें अफ्रीकी देश भी सम्मिलित हैं, संशोधित दर से ग़रीबी का आकलन करते हैं, जबकि हमारे देश में अभी तक वही पुराना फ़ॉर्मूला चलता आ रहा है। 

ऐसे में ज़ाहिर है, वैश्विक सन्दर्भ में हम ग़रीबी को मात दे रहे हैं जबकि अफ़्रीकी देशों में ग़रीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भारत में यदि 3.20 डॉलर की दर से ग़रीबी का आकलन किया जाए तब देश की एक-तिहाई से अधिक आबादी ग़रीब होगी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने फ़रवरी, 2019 में एक समाचार प्रकाशित किया था, जिसके अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक सरकारी रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं होने दिया। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में भारत में ग़रीबी दर सबसे अधिक थी। दुनिया के सबसे ग़रीब बच्चों में से 30.3 प्रतिशत भारत में हैं। ग़रीबों की संख्या बढ़ती रहेगी, ग़रीबी बढ़ती रहेगी पर आंकड़ों में हम ज़रूर ग़रीबी मिटा कर दम लेंगे। 

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महेंद्र पाण्डेय
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