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अनुच्छेद 370: शेख अब्दुल्ला को हटाना था, मुखर्जी की मौत बहाना था

अनुच्छेद 370 पर विशेष : संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद 370 और कश्मीर मुद्दे को एक बार फिर से छेड़ दिया है। बीजेपी इस मुद्दे को क्यों हवा देती रही है? क्यों शेख अब्दुल्ला की सरकार को हटाया गया था? ऐसा लगता है कि नेहरू सरकार लंबे समय से शेख अब्दुल्ला को रास्ते से हटाने का मौक़ा खोज रही थी। क्या शेख को हर हाल में जाना था और मुखर्जी की मौत बस एक बहाना था? कश्मीर सीरीज़ पर पहली कड़ी और दूसरी कड़ी में अनुच्छेद 370 और विलय पत्र पर चर्चा के बाद आज पेश है तीसरी कड़ी।
नीरेंद्र नागर

नेहरू लोकतांत्रिक विचारों के नेता थे और उन्होंने जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह का प्रस्ताव इसलिए दिया ताकि देश और दुनिया के सामने यह संदेश नहीं जाए कि भारत ने कश्मीर या किसी भी रियासत को वहाँ की प्रजा की इच्छा के विरुद्ध जाकर भारत में शामिल किया है। इसीलिए वे हर विवादित राज्य में रायशुमारी चाहते थे और देश के गृहमंत्री पटेल भी उनसे सहमत थे। जूनागढ़ में भी इसीलिए जनमत संग्रह करवाया गया, हालाँकि वहाँ की जनता हिंदू-बहुल थी। मुसलिम-बहुल जम्मू-कश्मीर में तो यह और ज़रूरी था। लेकिन जब वहाँ यह संभव होता नहीं दिखा तो उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया जो जनमत संग्रह न होते हुए भी एक तरह से जनता की राय का ही पर्याय माना जा सकता था। वह रास्ता यह था कि राज्य में चुनाव करवाकर जन प्रतिनिधि चुने जाएँ और वे यदि राज्य के भारत में विलय पर मुहर लगा दें तो मान लिया जाए कि जम्मू-कश्मीर की जनता भारत के साथ विलय की पक्षधर है।

अनुच्छेद 370- पार्ट-1 व 2

वैसे भी विलय पत्र में जम्मू-कश्मीर के लिए स्वायत्तता की जो शर्त रखी गई थी, उसके तहत राज्य के लिए अलग संविधान बनाने के मक़सद से एक राज्य संविधान सभा का गठन होना ही था। इस संविधान सभा के सदस्य यदि जनता ही चुने तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है? फलतः आगे के सालों में दो बातें हुईं। एक, 1950 में भारत का जो संविधान लागू हुआ, उसमें अनुच्छेद 370 डाला गया जिसमें विलय पत्र की शर्तों के अनुसार ही राज्य के लिए स्वायत्तता, अलग संविधान, केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों के बँटवारे, राज्य के लिए अलग प्रधानमंत्री आदि की व्यवस्था की गई थी। दो, 1951 में राज्य संविधान सभा के गठन के लिए चुनाव हुए।

इस काम के लिए नेहरू को जिस व्यक्ति से सबसे ज़्यादा मदद की उम्मीद थी, वह थे शेख अब्दुल्ला जो एक सेक्युलर नेता थे और धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे। विलय के बाद राज्य की आपातकालीन सरकार के वह प्रमुख थे और मार्च 1948 में राज्य का प्रधानमंत्री बनने के बाद तो जम्मू-कश्मीर की सत्ता उन्हीं के हाथों में आ गई थी। महाराजा हरि सिंह जून 1948 में ही राज्य छोड़कर मुंबई चले गए थे। उनकी जगह उनके बेटे कर्ण सिंह ने ले ली थी।

संविधान सभा में सिर्फ़ नेशनल कॉन्फ़्रेंस के प्रतिनिधि

सितंबर-अक्टूबर 1951 में राज्य की संविधान सभा के गठन के लिए चुनाव हुए। चूँकि राज्य का एक-तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के क़ब्ज़े में था इसलिए कुल 100 सीटों में से केवल 75 सीटों पर ही ‘चुनाव’ हो पाए जिनमें 43 सीटें कश्मीर में, 30 जम्मू में और 2 लद्दाख क्षेत्र की थीं। लेकिन ये चुनाव इस तरह हुए कि उसमें जनता को भाग लेने का मौक़ा ही नहीं मिला। कश्मीर क्षेत्र की जो 43 सीटें थीं, उनमें नेशनल कॉन्फ़्रेंस (एनसी) को छोड़कर किसी पार्टी का कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं हुआ और ये सारी-की-सारी सीटें नेशनल कॉन्फ़्रेंस बिना लड़े ही जीत गई। जम्मू क्षेत्र में जम्मू प्रजा परिषद नाम की पार्टी जो नाम से ‘प्रजा’ लेकिन असल में ‘राजा’ समर्थक थी, उसके 13 उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए गए जिसके बाद पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार कर दिया। 2 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी आख़िरी समय में पर्चा वापस ले लिया। इस तरह जम्मू की 30 सीटें भी एनसी की झोली में चली गईं। उधर लद्दाख में एनसी के सहयोगी सदस्य के रूप में दो प्रत्याशी विजयी घोषित हुए। 

संविधान सभा में जो 75 जन प्रतिनिधि ‘चुने’ गए थे, वे सबके-सब नेशनल कॉन्फ़्रेंस के थे। न जनता ने वोट डाले, न प्रतिपक्षी दल ने चुनावों में भाग लिया और ‘जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली’ संविधान सभा का गठन हो गया।

ऐसी विवादास्पद परिस्थितियों में गठित इस संविधान सभा ने 31 अक्टूबर 1951 से अपना काम शुरू किया। 5 नवंबर 1951 को अपने पहले भाषण में शेख अब्दुल्ला ने सदस्यों के सामने जो चार उद्देश्य रखे थे, उनमें से एक था भारत के साथ विलय के बारे में निर्णय करना। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि इस संविधान सभा को भारत के साथ विलय पर मुहर लगानी ही है, लेकिन उनके पूरे भाषण से समझा जा सकता था कि यह एक तय मसला था। शंका बस इस बात की थी कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य को जितनी स्वायत्तता देने का वादा कर चुकी है, वह उसका पालन भविष्य में करेगी या नहीं।

शेख की यही शंका अलग-अलग समय में उनके द्वारा दिए गए बयानों में भी नज़र आती है। 10 नवंबर 1947 को उन्होंने श्रीनगर में संवाददाताओं से कहा था कि अब जनमत संग्रह की ज़रूरत ही नहीं रही तो 14 अप्रैल 1949 को एक ब्रिटिश अख़बार से भेंट में उन्होंने टिप्पणी की कि न सिर्फ़ भारत और पाकिस्तान, बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और राष्ट्रसंघ के बाक़ी देश भी कश्मीर की स्वतंत्रता की गारंटी दें।

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हिंदू-मुसलिम का पेच

शेख अब्दुल्ला की इस आशंकित मन:स्थिति का एक कारण यह भी था कि जम्मू का एक ताक़तवर समूह शुरू से ही उनके ख़िलाफ़ था और स्वायत्तता की उनकी माँग का पहले दिन से विरोध कर रहा था। यह ज़मीदारों और संपन्न लोगों का वह समूह था जिसने डोगराशाही में ‘सुख के दिन’ देखे थे और जो नहीं चाहता था कि राज्य को स्वायत्तता मिले और शेख अब्दुल्ला निरंकुश राज करें। विलय से पहले यह समूह ‘राज्य की स्वतंत्रता’ के पक्ष में था क्योंकि महाराजा ख़ुद भी स्वतंत्रता चाहते थे। लेकिन क़बायली हमले के बाद वह राजा के साथ-साथ ख़ुद भी भारत के साथ विलय के पक्ष में हो गया। इसके बाद जब उसने देखा कि स्वायत्त कश्मीर का शासक उनका हिंदू (डोगरा) राजा न होकर एक मुसलिम नेता होने वाला है तो उसने राजशाही बनाम लोकतंत्र की इस लड़ाई को हिंदू-मुसलिम संघर्ष का रूप दे दिया। इसी समूह के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थी प्रजा परिषद जिसके प्रत्याशियों के आवेदन संविधान सभा के चुनाव में ख़ारिज कर दिए गए थे।

संविधान सभा के चुनावों का बहिष्कार करने के बाद प्रजा परिषद का विरोध और मुखर हो गया। उसने राज्य के भारत के साथ ‘पूर्ण एकीकरण’ की माँग करते हुए ‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान’ का नारा दिया। जम्मू में राज्य के अलग झंडे के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए जिसके बाद स्थिति इतनी बिगड़ी कि तीन दिनों का कर्फ़्यू लगा और सेना बुलानी पड़ी। अगले साल जब देश में भारतीय जनसंघ का गठन हुआ तो प्रजा परिषद राज्य में उसकी सहयोगी पार्टी बनी। प्रजा परिषद, जनसंघ, हिंदू महासभा, रामराज्य परिषद आदि सभी हिंदूवादी संगठनों ने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध करना शुरू कर दिया। ये संगठन पूरी कोशिश कर रहे थे कि संविधान सभा राज्य के लिए संविधान न बना सके। जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, उसका विरोध बढ़ता जा रहा था।

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‘पूर्ण एकीकरण’ की माँग

जून 1952 में जब संविधान सभा ने राज्य से राजशाही के ख़ात्मे के प्रस्ताव को स्वीकार किया तो प्रजा परिषद ने दिल्ली जाकर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा और राज्य के ‘पूर्ण एकीकरण’ की अपनी स्थायी माँग दोहराई। लेकिन वह राजशाही का अंत नहीं रोक पाई। उसी साल नवंबर में राज्य में राजशाही पूरी तरह ख़त्म हो गई जब राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी कर अनुच्छेद 370 में राज्य प्रमुख के रूप में उल्लिखित ‘जम्मू-कश्मीर के महाराजा’ वाक्यांश को हटाकर ‘राज्य विधानसभा द्वारा अनुशंसित सदर-ए-रियासत’ कर दिया। इसकी प्रतिक्रिया में प्रजा परिषद ने सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया। जनसंघ, हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद दिल्ली में उसके समर्थन में आंदोलनरत हो गए।

उन दिनों कश्मीर में किसी भी बाहरी व्यक्ति को जाने के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। इसके विरोध में जनसंघ के अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ‘भारत के किसी भी हिस्से में दाख़िल होने के अपने नागरिक अधिकार’ का दावा करते हुए मई 1953 में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का प्रयास किया जिसके अपराध में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। उनके साथ जम्मू, पंजाब और दिल्ली में हज़ारों लोग गिरफ़्तार हुए। 23 जून 1953 को हिरासत में ही श्यामाप्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। इसकी देशभर में भीषण प्रतिक्रिया हुई। राज्य में भी स्थिति बेक़ाबू होने लगी।

सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह ने शेख अब्दुल्ला की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया और उनके बाद के नंबर दो बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद को प्रधानमंत्री बना दिया। शेख अब्दुल्ला जेल में डाल दिए गए। निश्चित तौर पर कर्ण सिंह यह काम केंद्र सरकार और ख़ासकर नेहरू के आदेश के बिना नहीं कर सकते थे।

नेहरू और शेख में दूरियाँ पिछले कुछ सालों से बढ़ रही थीं। शेख को लग रहा था कि नेहरू स्वायत्तता के अपने वादे से उलट रहे हैं तथा राज्य सरकार के अधिकारों में अधिक से अधिक कटौती करना चाहते हैं। उधर नेहरू को लगता था कि शेख भारत के साथ विलय के अपने क़रार से पीछे हट रहे हैं। आपसी संशय मिटाने के लिए जुलाई 1952 में नेशनल कॉन्फ़्रेंस के प्रतिनिधिमंडल को दिल्ली बुलाया गया ताकि भारतीय संविधान किन-किन मामलों में राज्य पर लागू होगा, उसके बारे में और अधिक स्पष्टता हो सके। इस समझौते को दिल्ली अग्रीमेंट के नाम से जाना जाता है। लेकिन इस समझौते के एक साल बाद भी संविधान सभा ने विलय का अनुमोदन नहीं किया तो अगस्त 1953 में 5-सदस्यीय कैबिनेट का विश्वास खोने के नाम पर शेख की सरकार बर्ख़ास्त कर दी गई और 'कश्मीर षड्यंत्र' के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। शेख अब्दुल्ला को सदन में विश्वास मत पेश करने की अनुमति तक नहीं दी गई। ऐसा लगता है कि नेहरू सरकार लंबे समय से शेख अब्दुल्ला को रास्ते से हटाने का मौक़ा खोज रही थी। मुखर्जी की मौत और उसके बाद उपजी परिस्थिति उसके लिए वरदान बन गई।

शेख को हर हाल में जाना था, मुखर्जी की मौत बस एक बहाना था।

शेख की गिरफ़्तारी के बाद केंद्र सरकार के इशारों पर बख़्शी ’ग़ुलाम’ मुहम्मद की नई सरकार ने और उसके बाद की सरकारों ने क्या-क्या किया, और आज 66 सालों बाद स्वायत्तता के नाम पर जम्मू-कश्मीर के पास अनुच्छेद 370 के झुनझुने के अलावा क्या बचा है, इसके बारे में हम जानेंगे अगली कड़ियों में।

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