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कोरोना: देश के विभाजन की याद दिलाता महानगरों से मजदूरों का पलायन

पिछले लगभग एक हफ़्ते से हम उन लाखों मज़दूरों को भूखे-प्यासे सड़कों पर देख रहे हैं जो किसी तरह अपने वतन, अपने घर-गाँव पहुँच जाना चाहते हैं। शहरों ने इन्हें निकाल दिया है और गाँव तक पहुँचने के ज़रिए बंद कर दिए गए हैं। उनके पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि जान हथेली पर रखकर निकल पड़ें। घर पहुँच गए तो ठीक नहीं तो रास्ते में ही दम तोड़ देंगे। रास्ते में कुछ लोगों की मौत भी हो चुकी है। 

घर तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कितने और लोग मर जाएंगे। और अब तो एलान हो गया है कि उन्हें उनके राज्यों में घुसने नहीं दिया जाएगा, 14 दिनों के लिए बाहर ही रोक लिया जाएगा। 

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घर तक पहुँचते-पहुँचते न जाने कितने और लोग मर जाएंगे। और अब तो एलान हो गया है कि उन्हें उनके राज्यों में घुसने नहीं दिया जाएगा, 14 दिनों के लिए बाहर ही रोक लिया जाएगा। किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए ये दृश्य दिल दहला देने वाले हैं। इनकी पीड़ा, इनके दुख देखकर पत्थर भी पिघल जाएगा। जो नहीं पिघलेगा वह इंसान ही नहीं होगा। 

जा रहे लोगों के मंज़र को देखकर कई लोगों को भारत के विभाजन के दृश्य याद आ रहे हैं। विभाजन देखने वाली पीढ़ी के लोग अब बहुत कम बचे हैं। लेकिन बहुतों ने टीवी और सिनेमा के परदों पर इसके दृश्य देखे हैं और उन्हीं से इनकी तुलना कर रहे हैं।
यह सही है कि 1947 में हुए बँटवारे में जितनी हिंसा हुई थी उसके मुक़ाबले ताज़ा हालात में कुछ भी नहीं हुआ है। उस बँटवारे में दस से बीस लाख लोग मार दिए गए थे और सबके सिर पर ख़ून सवार था। क्या हिंदू, क्या मुसलमान और क्या सिख, सबके सब मार-काट में लगे हुए थे। करीब सवा करोड़ लोग इस बँटवारे में विस्थापित हुए थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बीसवीं सदी की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी। इसके घाव अब तक नहीं भर सके हैं। 

अगर आपको भारत के विभाजन के बँटवारे को सचमुच में महसूस करना है तो आपको धारावाहिक “तमस” देखना चाहिए। मोदी सरकार आपको यह धारावाहिक कभी नहीं दिखाएगी, क्योंकि वह उन प्रवृत्तियों को बेनकाब करता है जिसकी ये सरकार वाहक है। आप मंटो की कहानियाँ और यशपाल का “झूठा सच” पढ़कर भी इसे महसूस कर सकते हैं। खुशवंत सिंह की “ट्रेन टू पाकिस्तान” भी पढ़नी चाहिए। उस पर तो फ़िल्म भी बन चुकी है, जिसे आप देख सकते हैं। 

भारत के विभाजन का बँटवारा भयानक था मगर यह जो बँटवारा हम देख रहे हैं वह भी उससे किसी भी तरह कमतर नहीं है। भले ही इसमें हिंसा नहीं हो रही है, मगर करोड़ों लोगों का अपनी जगहों से पलायन अपने आप में एक बुरे ख़्वाब से कम नहीं है।

ये दृश्य हमें दिखा रहे हैं कि हिंदुस्तान असल में दो हिस्सों में बँटा हुआ है। एक वह हिंदुस्तान है जो पूरी तैयारी के साथ अपने घरों में बंद है। जो बाहर थे, वे हवाई जहाज़ या रेलगाड़ियों से पहले ही घर पहुँच चुके हैं। उन्हें देशबंदी सताती है मगर उस तरह नहीं जैसे बेघर कर दिए गए बेसहारा ग़रीब लोगों को। घर में बंद लोगों को केवल कोरोना वायरस का डर सता रहा है, मगर ग़रीब लोग महामारी से ज़्यादा भूख से डरे हुए हैं, बेरोज़गारी से डरे हुए हैं। 

पहला वर्ग इन ग़रीब लोगों को जाहिल बता रहा है, कोस रहा है कि कहीं ये कोरोना वायरस को पूरे देश में न फैला दें। उन्हें इनसे ख़ास हमदर्दी नहीं है, वह इनकी मदद के लिए आवाज़ नहीं उठा रहा। उल्टे वह माँग कर रहा है कि इन्हें किसी भी तरह रोक दो, ये जाने न पाएं। 

देश का दुर्भाग्य यह है कि सरकार भी ऐसा कहने वाले वर्ग की ही बात सुनती है, इनकी ही परवाह करती है। अगर उसे ग़रीबों-मज़दूरों की चिंता होती तो वह लॉकडाउन से पहले इनके बारे में ज़रूर सोचती। बल्कि देखा जाए तो हमारी सरकार की सोच उस अँग्रेज़ सरकार की सोच से काफी मिलती जुलती है जो देश से जाने से पहले बँटवारा कर देना चाहती थी। 

जिन सर सिरिल रेडक्लिफ को विभाजन के वक्त सीमाएं निर्धारित करने का ज़िम्मा सौंपा गया था। वह 8 जुलाई को भारत पहुँचे और पाँच हफ़्ते के अंदर उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान की सीमाएं निर्धारित कर दीं। वे अगले दिन इंग्लैंड वापस भी लौट गए। ऐसा लगता है कि रेडक्लिफ ने पेन से नहीं खंजर से लकीरें खींचीं थीं, इसलिए पूरा भारतीय महाद्वीप ख़ून से नहा गया। 

हमारे आज के शासकों की सोच क्या रेडक्लिफ से अलग है? प्रधानमंत्री ने अचानक लॉकडाउन की तारीख़ का एलान कर दिया। सोचा ही नहीं कि उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जो रोज़ कमाते-खाते हैं। उनका क्या होगा जिनके सिर पर छत नहीं है, जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं।

ध्यान रखिए कि बँटवारे के समय देश की आबादी केवल 36 करोड़ थी और अब 130 करोड़ से ज़्यादा हो चुकी है। इसमें से करीब 15 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अपने गाँव-घर से दूर जाकर काम कर रहे हैं। 

इन लोगों को देखकर आपको नहीं लगता कि दरअसल, इनका तो कोई वतन है ही नहीं। जहाँ काम कर रहे हैं वहाँ उनके साथ विदेशियों जैसा बर्ताव किया जाता है, जो छोड़कर आए हैं, वे भी एक किस्म से परायों जैसा ही सलूक कर रहे हैं। वास्तव में ये बेवतन लोग हैं। हमारे शासक इन्हें हिंदू-मुसलमान में बाँटकर इनका वोट ले लेते हैं और फिर मरने के लिए छोड़ देते हैं।

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हालाँकि कोरोना वायरस की महामारी से हमें लड़ना और बचना भी है लेकिन इसने हमें दिखा दिया है कि हम एक कौम नहीं हैं। हमारे यहाँ एक इंडिया है जिसमें सर्व सुविधा संपन्न लोग रहते हैं और दूसरा भारत है जिसमें वंचित और उपेक्षित लोग रहते हैं। इसलिए यह बँटवारा सन सैंतालीस के बँटवारे से कम नहीं है।  

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मुकेश कुमार
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