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फ़ोटो साभार - सोशल मीडिया

अफ़ज़ल को फाँसी तो बलवंत सिंह राजोआना को क्यों नहीं?

पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री बेअंत सिंह की हत्या में शामिल आतंकवादी बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सज़ा को घटा कर उम्रक़ैद में बदलने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। हालाँकि अब तक केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर सज़ा कम किए जाने के फ़ैसले का एलान नहीं किया है, पर इसके इर्द-गिर्द होने वाली राजनीति पर सवाल उठने लगे हैं। 
गृह मंत्रालय इस पर विचार कर रहा है कि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव के 550वें जन्मदिन के मौके पर 8 सज़ायाफ़्ता क़ैदियों को मानवता के आधार पर रिहा किया जाएगा। इसके साथ ही राजोआना की सज़ा कम कर दी गई। ये सभी आतंकवादी व विध्वसंक  गतिविधि (निरोधक) अधिनियम के तहत गिरफ़्तार किए गए थे। यह अधिनियम अब खत्म किया जा चुका है।  
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पंजाब से आतंकवाद ख़त्म करने का श्रेय तत्कालीन मुख्य मंत्री बेअंत सिंह को दिया जाता है। वह 31 अगस्त, 1995 को जब चंडीगढ़ स्थित अपने दफ़्तर से निकल कर गाड़ी में बैठ रहे थे, ज़ोरदार धमाका हुआ और उनकी मौत हो गई। उन पर आत्मघाती हमला आतंकवादी गुट बब्बर ख़ालसा के दिलावर सिंह बब्बर ने किया था। बाद की जाँच में पता चला कि यदि किसी तरह बेअंत सिंह उसमें बच जाते तो दूसरा धमाका राजोआना करता। दोनों ने मिल कर साजिश रची थी और सिक्का उछाल कर फ़ैसला हुआ था कि कौन पहला हमला करेगा, कौन दूसरा।

मुक़दमा लड़ने से इनकार

सीबीआई की विशेष अदालत ने 1 अगस्त, 2007 को राजोआना को मौत की सज़ा सुनाई। इसी मामले में जगतार सिंह हवारा को भी मौत की सज़ा सुनाई गई थी, पर 2010 में उसकी  सज़ा घटा कर उम्रक़ैद में तब्दील कर दी गई। राजोआना की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा गया और उसे 31 मार्च 2012 को फाँसी देना तय हुआ। राजोआना ने दया याचिका दायर नहीं की थी, पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने यह याचिका दायर की थी। इसे देखते हुए राजोआना की सज़ा टाल दी गई।
राजोआना ने आतंकवादी हमले में शामिल होने की बात क़बूली और मुक़दमा लड़ने से इनकार कर दिया था। उसने कहा था कि सिख विरोधी दंगे के दोषियों को जिस न्यायपालिका ने सज़ा नहीं दी, उस पर उसे भरोसा नहीं है, वह न्यायपालिका उसके साथ भी न्याय नहीं करेगी।
सज़ा-ए-मौत पर लगी रोक की जानकारी दिए जाने पर राजोआना ने कहा था, ‘मैंने अपना जीवन पंथ को समर्पित कर दिया और मुझे अपने किए पर पछतावा नहीं है। इसलिए सज़ा पर रोक से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। यह खालसा पंथ की असली जीत होगी कि सिख राष्ट्र का हर आदमी उठ खड़ा हो और ख़ालसा पंथ के लिए मर मिटने को तैयार हो जाए।’

मैं फाँसी पर लटकने को तैयार हूँ और जिंदा तब तक हूँ, जब तक ईश्वर की इच्छा है। मौत की सज़ा पर रोक लगाने को मेरी कमज़ोरी न समझी जाए। मैं इस पर खुश नहीं हूँ। मैं इस पर खुश ज़रूर हूँ कि इस घटना ने पूरे क़ौम को जगा दिया है और दिल्ली की दीवालों को ज़ोरदार झटका दिया है।


बलवंत सिंह राजोआना, बेअंत सिंह हत्या में सज़ायाफ़्ता क़ैदी

मामला अफ़ज़ल गुरु का

राजोआना की सज़ा कम किए जाने पर कश्मीरी आंतकावदी अफ़जल गुरु का मामला उठना स्वाभाविक है। अफ़जल गुरु को संसद पर हमले के मामले में गिरफ़्तार किया गया था। इस हमले में सुरक्षा बलों के 8 लोगों के अलावा एक माली भी मारा गया था। इसके अलावा 16 लोग ज़ख़्मी हुए थे। 
अफ़जल गुरु ने पहले अपना अपराध स्वीकार कर लिया। पर बाद में उसने कहा कि उसने भयानक असहनीय यंत्रणा और परिवार वालों को परेशान किए जाने के डर से हमले में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली थी। गुरु को 18 दिसंबर, 2002 को मौत की सज़ा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2005 को दिए अपने फ़ैसले में मौत की सज़ा बरक़रार रखी। उसकी दया याचिका 10 अगस्त 2011 को खारिज कर दी गई। गुरु को 9 फरवरी 2013 को फाँसी दे दी गई। 
कई मानवाधिकार संगठनों का कहना था कि अफ़ज़ल गुुरू के साथ न्याय नहीं हुआ, क्योंकि उसके मामले की सुनवाई ठीक से नहीं हुई थी। इनका मानना था कि पुलिस ने पूरे मामले की जाँच भी ठीक से नहीं की थी।
लेखक अरुन्धति राय और प्रफुल्ल बिदवई ने भी कहा था कि गुरु के साथ न्याय नहीं हुआ। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने अफ़ज़ल गुरु की दया याचिका को स्वीकार कर लेने की अपील की थी। 

क्या कहा था बीजेपी ने?

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर मुसलमानों के तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया था। उसने पूरे देश में प्रचारित किया था कि कांग्रेस सरकार मुसलमानों को खुश कर उनका वोट पाने के लिए ही इस मामले में देरी कर रही है। लालकृष्ण आडवाणी ने 12 नवंबर, 2006 को ही कहा था, ‘इस मामले में देरी की बात मैं नहीं समझ पा रहा हूँ। सरकार ने मेरी सुरक्षा बढ़ा दी है, पर ज़रूरत इस बात की है कि अदालत के फ़ैसले को तुरन्त लागू किया जाए।’
बीजेपी के तत्कालीन प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था : 

जो लोग यह माँग कर रहे हैं कि अफ़ज़ल गुरु को मौत की सज़ा न दी जाए, वे लोगों की भावनाओं से तो खेल रहे ही हैं, आतंकवादियों का मनोबल भी बढा रहे हैं।


प्रकाश जावड़ेकर, बीजेपी नेता

नरेंद्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्य मंत्री थे। उन्होंने अफ़ज़ल को फाँसी देने में हो रही देरी का बार-बार विरोध किया था और कांग्रेस की आलोचना करते रहे। गुरु को सजा-ए-मौत दिए जाने के बाद उन्होंने कहा था, ‘भले ही इसमें देरी हुई, पर देर होना नही होने से बेहतर है।’

अफ़ज़ल बनाम राजोआना

जहाँ अफ़ज़ल गुरु अंत अंत तक ख़ुद को निर्दोष बताता रहा, मानवाधिकार संगठनों और कुछ वकीलों ने भी कहा कि उसकी सुनवाई ठीक से नहीं हुई, वहीं राजोआना ने खुले आम स्वीकार किया कि वह हमले में शामिल था। अफ़ज़ल की याचिका को खारिज कर दिया गया, पर राजोआना ने खुद तो याचिका देने से इनकार कर ही दिया, उसने मौत की सज़ा पर रोक लगने के बाद भी कहा कि वह इससे खुश नहीं है। 
क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिये कि आतंकवाद पर किसी तरह का समझौता नहीं करने की बात करने वाली बीजेपी एक आतंकवादी को छूट कैसे दे सकती है? नरेंद्र मोदी, प्रकाश जावड़ेकर और लाल कृष्ण आडवाणी क्यों चुप हैं?
क्या इससे ख़ालिस्तानियों को बल नहीं मिलेगा ? ख़ालिस्तानी आंदोलन से जुड़े पाकिस्तानी नागरिक गोपाल सिंह चावला से मुलाक़ात करने पर कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू की ज़बरदस्त आलोचना करने वाली बीजेपी एक आतंकवादी को छूट देने का फ़ैसला कैसे कर सकती है?
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो के साथ आए प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक खालिस्तान समर्थक मंत्री के होने पर खुले आम आलोचना करने और कनाडा को विरोध पत्र सौंपने वाली सरकार ने एक सज़ायाफ़्ता आतंकवादी की सज़ा क्या राजनीतिक कारणों से कम कर देगी?
इन सवालों के जवाब न सरकार देगी, न बीजेपी, न ही कोई और। इसकी ज़रूरत भी शायद नहीं है, उत्तर सबको पता है। अफ़जल गुरु और बलवंत सिंह राजोआना होने का यही फ़र्क है।
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