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विभाजनकारी नारों से लोकतंत्र नहीं होगा मजबूत

जब से भगवान का राजनीतिक स्वामित्व हुआ है, 'राम रामजी' का अभिवादन बहुमत सांस्कृतिक उत्पीड़न का प्रतीक बन चुका है। इसी तरह अलग-अलग राजनीतिक रैलियों और सामाजिक कार्यक्रमों में  ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए जाते थे और यह कभी भी विभाजनकारी नहीं रहा है।
प्रभु चावला

राजनीतिक एकीकरण की शब्दावली में पार्टियों के नारों से काडर और अनुयायियों में एकता बढ़ती है। पर इस चुनाव में वे क़त्ल, उन्माद और विभाजनकारी उत्तेजना जैसे शब्दों के हिस्सा बन गए हैं। उत्तर और पश्चिम भारत में ‘राम राम जी’ अभिवादन का सबसे आम और सबसे ग़ैर-सांप्रदायिक तरीका है। कई हिन्दू और सफ़ेद कपडे पहने मुसलमान कई बार एक दूसरे से हाथ नहीं मिला सकते, लेकिन एक-दूसरे को राम राम करते हैं।  
अब नहीं। जब से भगवान का राजनीतिक स्वामित्व हुआ है, यह अभिवादन बहुमत सांस्कृतिक उत्पीड़न का प्रतीक बन चुका है। इसी तरह अलग-अलग राजनीतिक रैलियों और सामाजिक कार्यक्रमों में  ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए जाते थे और यह कभी भी विभाजनकारी नहीं रहा है। दुखद है कि ये दोनों ही आज के भारत के राजनीतिक डिक्शनरी में नकली शब्दों के रूप में जुड़ गए हैं।
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‘जय महाकाली, कलकत्ता वाली'

लोकसभा चुनाव के प्रचार के अंतिम दो चरणों में नरेंद्र मोदी ने जय श्रीराम कहने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए ममता बनर्जी की तीखी आलोचना की। ‘यदि लोग जय श्रीराम का नारा भारत में नहीं लगा पाएँगे तो कहाँ लगाएँगे?’, उन्होंने पूछा। ममता ने पलटवार करते हुए नारा दिया, ‘जय महाकाली, कलकत्ता वाली।’
बंगाल में चुनाव मोदी के राम और ममता की काली के बीच धर्मयुद्ध बन गया, विडंबना है कि दोनों ही हिन्दू देवी-देवता हैं और दीदी ने धर्मनिरपेक्ष नारा ही दिया है। नकल एक तरह की चाटुकारिता हो सकती है, पर इस चुनाव उत्सव में वह मिमिक्री बन कर रह गई है और वह भी तुच्छता के साथ।
विपक्ष पर हिन्दुत्व के बदले तुष्टीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है, उसने बीजेपी को हिन्दू देवी-देवताओं के नाम पर ही जवाब देने का फ़ैसला किया है। वे राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए राम को ‘सभी हिन्दुओं के भगवान’ से किसी दल की ख़ास राजनीतिक जायदाद में तब्दील कर देने का आरोप लगाते हैं।

'टेंपल रन'

हालाँकि अयोध्या के भगवान आस्था के सबसे सम्मानित प्रतीक हैं, देश में कई दूसरे देवी-देवताओं की भी पूजा वैसी ही की जाती है। धर्म ग्रन्थों में कहा गया है कि हिन्दुओं के 33 करोड़ देवी-देवता हैं, मोदी के विरोधी भारतीय राजनीतिक नैरेटिव को और अधिक जटिल बनाने के लिए कई देवी देवताओं को ढूंढ कर निकाल रहे हैं। राहुल गाँधी समेत तमाम मोदी विरोधी एक राज्य से दूसरे राज्य में मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं ताकि वे ख़ुद को अधिक से अधिक हिन्दू धर्म से जुड़ा दिखा सकें।
बीजेपी के सिद्धांतों की ऊर्जा से पैदा हुई गर्मी राष्ट्रवाद और धर्म के अत्यधिक इस्तेमाल से पूरे चुनाव को झुलसा रही है। बीजेपी और प्रधानमंत्री ने यह निष्कर्ष निकाला है कि धर्मनिरपेक्ष बहस और प्रशासनिक हस्तक्षेप में टकराव है। यह चुनिंदा सांस्कृतिक हमले का समर्थन करता है और इससे भारत की हिन्दू पहचान को ख़तरा है। 1990 के दशक में बीजेपी ने अपने जन्म के बाद ही पूरा खेल बदल कर रख दिया, इसने हिन्दुओं को अपने साथ जोड़ने के लिए एक नारा दिया, एक विचार दिया। इसका भगवा प्रभाव विंध्य के पार और पूरब के बाहर भी देखा जा सकता है। लाल कृष्ण आडवाणी ने 1990 में राम रथ यात्रा के ज़रिए हिन्दुओं के राजनीतिक जागरण का रोड मैप तैयार कर दिया था। 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर और देश के दूसरे हिस्सों में आतंकवादी हमलों के लिए कट्टरपंथी इसलाम को ज़िम्मेदार ठहराया था। मंदिर और अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना बीजेपी के सबसे अधिक प्रभावी समसामयिक नारे हो गये जिसके ज़रिए वह पूरे विपक्ष को हिन्दू विरोधी के रूप में बदनाम करने लगी।

राष्ट्रवादी युद्ध उन्माद

दो दशकों में बीजेपी ने ध्रुवीकरण करने वाले हिन्दुत्व के नारों को राष्ट्रवादी युद्ध उन्माद में तब्दील कर दिया है, आधुनिक हिन्दू राष्ट्र को बताने के लिए ‘सबसे पहले भारत’ का नारा दिया जो जीत का पासवर्ड बन चुका है। सरकार के पाँच साल के कामकाज पर चर्चा करने के बजाय राष्ट्रवाद को वोट देने की बात पार्टी के नारों और मोदी के भाषणों में अनुपात से बहुत अधिक रहती है।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक नारेबाजी के सुर-ताल सिद्धान्तों के बजाय पार्टी में नेताओं के उत्थान के साथ बदलते रहे हैं। किसी समय नारे नेता और उसके शासन के वैकल्पिक स्वरूप को जताने के लिए गढ़े जाते थे। 
साठ के दशक तक भारत के राजनीतिक भूगोल पर जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में कांग्रेस का दबदबा था। इंदिरा गाँधी ने पार्टी और देश पर कब्जा कर लिया, उसके बाद विपक्ष और सिंडिकेट के लोग उन्हीं पर ज़ोरदार हमले करते रहे।
जनसंघ पहली पार्टी थी, जिसने इंदिरा गाँधी पर निजी हमले किए और ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया। उनकी पार्टी ने इसका जवाब दिया, ‘वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहता हूं देश बचाओ’।

‘ग़रीबी हटाओ’

इसके बाद के चुनाव में कांग्रेस ने नारा दिया, ‘ग़रीबी हटाओ’ और इसके बल पर लोकसभा की दो-तिहाई सीटें उसे मिल गई थीं। हालाँकि इंदिरा गाँधी 1977 का चुनाव हार गईं, लेकिन वह सिर्फ़ 32 महीने बाद ‘उस सरकार को चुनिए जो काम करे’ के नारे के बल पर सत्ता में वापस आ गईं। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में चल रही सरकार के दौरान फैली अफरातफरी और गुटबाजी को दिखाने के लिए यह काफ़ी था।
राजनीतिक नारों का प्रभाव 2014 तक सीमित रहा, पर मोदी ने ‘अच्छे दिन’ और 'मजबूत भारत' के नारे दिए और राष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से छा गए। ये बातें उन लोगों से सीधे जुड़ती थीं जो ऐसा नेता चाहते थे जो भ्रष्टाचार से लड़ना चाहता हो।

भावनात्मक हमला

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का कामकाज कई पूर्ववर्ती नेताओं से बेहतर रहा है। इसके बावजूद उन्होंने भविष्य का अपना अजेंडा बताने के बजाय भावनात्मक हमले कर अपनी पार्टी को फिर से जिताने की अपील की। दूसरे लोकतांत्रिक देशों में आक्रामक और भावनात्मक नारे वाले नेताओं को और पहले से स्थापित पार्टियों को लोगों ने उखाड़ फेंका है। मार्गरेट थैचर ने 1979 में लेबर यूनियन का पूरा फ़ायदा उठाया जो यूनाइटेड किंग्डम की अर्थव्यवस्था को हड़तालों से पंगु बनाए हुए थे। थैचर ने नारा दिया, ‘लेबर काम नहीं करता है।’
मोदी के कई प्रशंसकों को लगता है कि उन्हें उन अंतरराष्ट्रीय नेताओं से सीखना चाहिए जिन्होंने चुनाव जीते हैं या दुबारा चुनाव मैदान में हैं। उदाहरण के लिए बराक ओबामा हैं, जिन्होंने 2008 में अमेरिकी भावनाओं को यह कह उभारा, ‘हाँ। हम यह कर सकते हैं। हम इस देश के घाव भर सकते हैं।’
इसके बाद 2012 में उन्होंने अमेरिका के लोगों को आश्वस्त किया कि वह देश को आगे ले जा सकते हैं। अनजान और वाशिंगटन के उदार वर्ग की हँसी के पात्र डोनल्ड ट्रंप उम्मीद खो चुके नागरिकों को ‘हम अमेरिका को फिर महान बनाएँगे’ का नारा देकर  ह्वाइट हाउस पहुँचने में कामयाब रहे।
छोटे, तेज और झन्नाटेदार नारे लोगों को छूते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। लोगों की भावनाओं से जुड़ने वाले और अनुप्रास वाले चटपटेदार, मसालेदार व्यंग्यात्मक नारों से अधिक सीटें मिलती हैं। भारत जैसी विविधता वाले देश को ऐसे नारों की ज़रूरत है जो इसकी बहुलता पर ज़ोर दे, सिर्फ राष्ट्रीयता पर नहीं। लेकिन यदि इस तरह के छोटे नारे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक संवेदनाओं से ताल मेल नहीं बिठाती हैं तो सिर्फ़ अर्थहीन शब्द बन कर रह जाएँगी। 2019 के नारों ने भारत को बीच से बाँट दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनावी नाटक के नतीजे इसके प्रचार के क्रोध और गंदगी की तरह नहीं होंगे।
(साभार: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस)
प्रभु चावला
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