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नये साल में हिंसा की राजनीति का सामना कैसे करें?

नए साल की अगवानी के लिए मेरे पास क्या है? वह क्या है जो 2023 से लेकर मैं 2024 की अभ्यर्थना करूँ? भारत और विश्व के वर्तमान और भविष्य के लिए आशंका से काँपता हुआ ह्रदय भर? या अपेक्षाविहीन, आशाहीन न्यायबोध जो साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट को वह साहस देता है कि वे राज्य सत्ता के समक्ष, जो अन्याय से संयुक्त है, एकाकी प्रतिवाद दर्ज करा सकें? यह जानते हुए कि न सिर्फ़ उनका प्रतिवाद एकाकी होने को अभिशप्त है बल्कि न्याय की उनकी माँग की चारों तरफ़ से खिल्ली भी उड़ाई जाएगी? उनपर लानतें भेजी जाएँगी और पत्थर फेंके जाएँगे जब वे इंसाफ़ की अपनी माँग के साथ सड़क पर निकलेंगी? 
साक्षी मलिक ने अपने आँसुओं से लड़ते हुए टी वी कैमरों के सामने टेबल पर अपने जूते रखे। इससे अधिक ईमानदार साहस की और कोई तस्वीर नहीं हो सकती थी। साहस और आँसू के बीच के रिश्ते के बारे में हमने सोचा नहीं है। ये आँसू उस समाज के लिए थे जो धीरे धीरे न्याय का बोध गँवा बैठा है। इस वजह से एक प्रकार की असहायता का अहसास इन आँसुओं में व्यक्त हुआ। यह कोई झूठे विश्वास वाला साहस न था। लेकिन इसका मतलब यह भी था कि पराजय की अनिवार्यता सत्य के प्रति आग्रह को शिथिल नहीं कर सकती। 
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2023 के अंतिम दिन इस साल की सबसे ताकतवर तस्वीर हमने देखी: दिल्ली की धुंधभरी सड़क पर खिलाड़ी विनेश फोगाट अपने राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ प्रधानमंत्री आवास की तरफ़ बढ़ती हुई।अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीत कर देश का मान बढ़ानेवाली इस खिलाड़ी के साथ कम ही लोग थे। वह कोई मुस्कुरा नहीं रही थी। चेहरे पर उदासी थी, आँसू भले न थे। वह प्रधानमंत्री को प्रतिवादस्वरूप अपने राष्ट्रीय पुरस्कार वापस करने जा रही थी। पुलिस ने रोक दिया तो कर्तव्य पथ पर ही अपने पुरस्कार रख कर लौट आईं। इस सड़क का नाम आज सार्थक हुआ। विनेश ने जनतंत्र की नागरिक के रूप में अपना कर्तव्य पूरा किया। वह कर्तव्य है न्याय के संघर्ष को जीवित रखना। नागरिक के अपने अधिकार की हर क़ीमत पर हिफ़ाज़त करना। नागरिक अधिकार की वह गरिमा किसी भी पुरस्कार से कहीं क़ीमती है। 

विनेश ने अपने खुले पत्र में प्रधानमंत्री को कहा कि जब उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की तो उन्हें देश ने अपना गौरव बतलाया लेकिन जब वे अपने सम्मान के लिए संघर्ष करने सड़क पर उतरीं तो उन्हें देशद्रोही ठहराया गया। उस वक्त राज्य की योजनाओं के लिए विज्ञापन में उनके नाम का इस्तेमाल किया गया, लेकिन जब उन्होंने अपनी गरिमा की रक्षा की माँग की तब उनके साथ जो बर्ताव हुआ उससे उन्हें अहसास हुआ कि उनकी ज़िंदगी उन विज्ञापनों की तरह नहीं है। फिर उन्होंने बजरंग पुनिया को अपना पद्मश्री लौटाते हुए देखा और उन्हें अपने पुरस्कारों पर घिन आई।


आत्म सम्मान किसी भी राष्ट्रीय सम्मान से बड़ा है। यह बात आम तौर पर हमारी समझ में नहीं आती और जो भी इसका दावा करती है उस पर हम टूट पड़ते हैं। राज्य को इंसान से बड़ा मानने की बीमारी समाज में गहरी है और वह एक व्यक्ति को सर उठाकर खड़ा होते देख हमारे भीतर हिंसा भर देती है। लेकिन उस अकेले व्यक्ति के संघर्ष की तस्वीर कहीं अधिक सुंदर होती है। 
इसलिए खिलाड़ियों के यौन शोषण के अभियुक्त और भारतीय जनता पार्टी के सांसद बृजभूषण सिंह के पिट्ठुओं ने जब रेसलिंग फ़ेडेरशन ऑफ़ इंडिया पर क़ब्ज़ा कर लिया तो इन खिलाड़ियों के सामने उनके दबदबे को क़बूल कर लेने और आत्म गरिमा के बीच चुनाव का सवाल था। उन्होंने अपनी गरिमा चुनी। उसके जीतने की गारंटी के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि जीत और हार से परे इंसान की यह गरिमा महत्त्वपूर्ण है।
विनेश की तस्वीर के आसपास ही गजा से एक तस्वीर आई। इज़राइली हमले का मुक़ाबला कर रहे एक लड़ाके की। यह वीडियो इज़राइली फ़ौज के प्रचार विभाग ने प्रसारित की। एक फ़िलिस्तीनी लड़ाके को इज़राइल का ड्रोन निशाना बनाता है। वह ज़ख़्मी होकर लड़खड़ाता है। गिरता है। उसे इसका अन्दाज़ है कि इसकी फ़िल्म बनाई जा रही है। वह किसी तरह सँभलता है।और ड्रोन को अपनी तर्जनी दिखलाकर मानो बतलाता है कि वह उसके आगे लाचार नहीं। फिर वह अल्लाह के सामने दोजानू होकर ज़मीन पर सिर टिका देता है। इज़राइल की ताक़त से बड़ी एक ताक़त है जिसके आगे वह झुकता है। इज़राइल ने यह वीडियो फ़िलिस्तीनियों की हिम्मत तोड़ने के लिए प्रसारित किया। लेकिन इसका असर उलटा हुआ है। आसमान की तरफ़ उठी उसकी तर्जनी जैसे दुनिया की सबसे ख़ूँख़ार फ़ौज को चुनौती देती हो।और फिर उसके बाद अल्लाह के आगे दोज़ानू होकर इस ज़िंदगी से विदा लेने की उसकी मुद्रा भी इज़राइल की ताक़त को धता बतलाती है। 
फ़िलिस्तीनी लड़ाके की यह तस्वीर फ़िलिस्तीनियों के आध्यात्मिक साहस और जीवट की शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। इज़राइली क़ब्ज़े की हिंसा के आगे टिकने और उसके प्रतिरोध का राज इसमें छिपा है और इसे कोई गोलाबारी तोड़ नहीं सकती।

इसके साथ ही हम उस तस्वीर को याद रखें जो 18 साल के इज़राइली यहूदी ताल तिलमिक की है। उसकी गिरफ़्तारी के पहले की। वह उन 200 इज़राइली युवाओं में एक है जिन्होंने फ़ौज में शामिल होने से इंकार किया है। इज़राइल में हर 18 साल के व्यक्ति का फ़ौज में शामिल होना अनिवार्य है और इसे न मानने पर सज़ा हो सकती है। ताल ने कहा कि वह दमन और खूँरेजी के चक्र को जारी रखने में शामिल नहीं होना चाहता। वह ऐसी फ़ौज का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो शांति के लिए नहीं बल्कि फ़िलिस्तीनियों के उत्पीड़न के लिए ही काम करती है।वह अपने वतन में दूसरों के लिए सम्मान चाहता है, ऐसा मुल्क जहां सब अपनी गरिमा के साथ रह सकें। 

ताल तिलमिक की तरह ही यहूदी इज़राइली युवती सोफ़िया ओर ने फ़ौज में शामिल होने से इंकार किया।वह इज़राइल के दमन और नस्लभेद और कभी न ख़त्म होनेवाली खूँरेजी की नीति को लागू करने में शामिल नहीं होना चाहती।
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इन तस्वीरों के साथ हम नए साल में प्रवेश करते हैं। इन तस्वीरों में हिंसा के दबदबे के अहंकार के सामने इंसानी गरिमा की आध्यात्मिकता की स्थिरता है।ये तस्वीरें यही बतलाती हैं कि इंसान का फ़र्ज सच और इंसाफ़ के लिए लड़ने का है और उसके ज़रिए वह अपनी इंसानियत का ऐलान करता है। 2023 के 31 दिसंबर के गुजरने के साथ न तो इज़राइल अपनी क्रूरता बंद कर देगा, न भारत में भारतीय जनता पार्टी अपनी घृणा और हिंसा की राजनीति बंद कर देगी। उस क्रूरता और अन्याय का सामना फ़िलिस्तीन की जनता या साक्षी, बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट के आत्म बल से किया जाएगा। 
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अपूर्वानंद
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