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अयोध्या: संतुलन बनाने की कोशिश के बावजूद कोर्ट के फ़ैसले पर उठते सवाल

क्या माननीय न्यायालय का अयोध्या विवाद पर आया फ़ैसला ‘संपूर्ण न्याय’ से ज़्यादा बीते कई दशकों से व्याप्त उत्तर भारत के एक बड़े सियासी-सांप्रदायिक विवाद को सुलझाने की न्यायिक-प्रशासकीय कवायद ज़्यादा है? क्या यह फ़ैसला जाने-अनजाने बहुसंख्यक आबादी की आस्था और कुछ सियासी अभियानों के दबाव के प्रति कुछ झुका हुआ या उनसे समाज को उन्मुक्त करने की इच्छा से प्रेरित दिखता है?
उर्मिेलेश

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच माननीय न्यायाधीशों की पीठ ने 1045 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में कहा कि उन्होंने यह फ़ैसला इतिहास, विचारधारा, धार्मिक विश्वास या आस्था के आधार पर नहीं अपितु क़ानून के आधार पर किया है। उन्होंने भारतीय संविधान के बुनियादी उसूलों की भी चर्चा की है कि हमारे संविधान की रोशनी में क़ानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं, चाहे वे किसी भी धर्म, संप्रदाय, विश्वास या विचार के हों! माननीय न्यायाधीशों ने बिल्कुल सही कहा है। लेकिन अयोध्या के मंदिर-मसजिद विवाद पर उनके एकमत फ़ैसले का आधार क्या वाक़ई सिर्फ़ क़ानून है, इसमें आस्था, विश्वास, कथा या इतिहास, किसी भी अन्य पहलू की कोई भूमिका नहीं है? मैं कोई क़ानूनविद् या विधिशास्त्र का छात्र नहीं हूँ। एक आम नागरिक और पत्रकार के नाते इस ऐतिहासिक फ़ैसले के सबसे अहम् हिस्सों को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के उक्त दावे पर कुछ सवाल उठते हैं।

फ़ैसले का सबसे अहम् हिस्सा है कि 2.77 एकड़ ज़मीन, जिसमें विध्वंस का शिकार हुई बाबरी मसजिद का सारा हिस्सा शामिल है, अब यह हिस्सा रामलला विराजमान यानी कथित हिन्दू-पक्ष के पास चला गया। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादास्पद ज़मीन के इस हिस्से को तीन भागों- राम लला विराजमान या कथित हिन्दू पक्ष, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में बराबर-बराबर बाँट दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसे ग़लत फ़ैसला माना।

अयोध्या विवाद से ख़ास

अपने फ़ैसले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या के किसी प्रमुख स्थान पर मसजिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन देने का केंद्र सरकार को आदेश देते हुए बेंच ने अपने फ़ैसले को संतुलित बनाने की कोशिश भी की है। रामजन्म भूमि स्थल पर अपने ‘सबसे पुराने प्राधिकार’ का दावा करने वाले निर्मोही अखाड़े को ज़्यादा कुछ नहीं मिला सिवाय इसके कि उन्हें भी सरकार उस मंदिर ट्रस्ट में नुमाइंदगी देगी, जिसका गठन अगले तीन महीने में किया जाना है। व्यावहारिक तौर पर देखें तो सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट में संघ-विहिप आदि के सदस्यों का ही वर्चस्व होना है।

इस फ़ैसले पर क़ानूनी दृष्टि से सबसे पहला सवाल उठता है- माननीय न्यायाधीशों ने किन ठोस साक्ष्यों के आधार पर 2.77 एकड़ ज़मीन, जिसमें सन् 1528 में निर्मित बाबरी मसजिद की समूची संरचना, जो सन् 1992 तक खड़ी थी, को प्रस्तावित मंदिर के लिए देने का फ़ैसला किया?

अगर फ़ैसले को बारीकी से देखें तो एकमात्र बड़ा आधार माना गया है- राम चबूतरा (जिसे सन् 1992 में बाबरी मसजिद के साथ ही क्षतिग्रस्त किया गया था!) के आसपास के गलियारे या आँगन में सन् 1857 के पहले और बाद में जारी रहने वाला भजन-कीर्तन या पूजा आदि। माननीय न्यायाधीशों के मुताबिक़ मुसलिम पक्ष अपने इस दावे के पक्ष में ठोस साक्ष्य नहीं पेश कर सका कि अंदरुनी संरचना पर उनका क़ब्ज़ा या अधिकार सन् 1857 के पहले से यानी 1528 से 1857 के दौर में था। माननीय कोर्ट का कहना है कि इस दौर में वहाँ नमाज़ पढ़े जाने का मुसलिम पक्ष कोई साक्ष्य नहीं पेश कर सका? फिर रामलला पक्ष ही मसजिद वाले दायरे या आसपास की ज़मीन पर अपना वैधानिक क़ब्ज़ा होने का कौन-सा साक्ष्य पेश कर सका? यहाँ यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर 1528 से 1857 के बीच मसजिद या पास की ज़मीन पर किसका क़ब्ज़ा था? अगर माननीय न्यायमूर्ति-गण यह मान रहे हैं कि सन् 1949 में मसजिद परिसर में कुछ हिन्दू मूर्तियों का रखा जाना ‘क़ानून का घोर उल्लंघन’ था तो इससे क्या मसजिद का लंबे समय से चला आ रहा वजूद स्वतःसिद्ध नहीं होता है? 

अगर मसजिद पर मुसलमानों का हक़ नहीं होता तो फिर दूसरे धर्म के कुछ खुराफाती तत्व उसमें रात के अंधेरे में मूर्ति क्यों रखते?

स्वयं कोर्ट ने इस तथ्य को माना है कि कुछ शरारती तत्वों द्वारा रामलला और अन्य की मूर्तियाँ रखने के बाद और वहाँ सुबह देखा गया कि कुछ लोग भजन-कीर्तन कर रहे हैं। कोर्ट ने तभी तो इस परिघटना को ‘क़ानून का घोर उल्लंघन’ कहा है। उस वक़्त इस कथित हिन्दू पक्ष द्वारा कहा जाने लगा कि ‘राम लला’ अपने-आप वहाँ अवतरित हुए हैं। इस घटनाक्रम का विस्तार से ज़िक्र फ़ैज़ाबाद से छपने वाले अख़बार जनमोर्चा के प्रतिष्ठित संपादक शीतला प्रसाद सिंह ने अपनी किताब ‘अयोध्याः रामजन्मभूमि बाबरी मसजिद का सच’ (सन् 2018) में किया है। इस घटना के बाद ही विवाद और टकराव से बचने के लिए मुसलमानों ने वहाँ नमाज़ पढ़ना बंद कर दिया था। बाद में रामलला आदि के लिए टेंट की अस्थायी संरचना खड़ी की गई। सन् 1992 के 6 दिसम्बर को विहिप-बीजेपी-आरएसएस-शिवसेना के नेताओं के आह्वान पर कथित हिन्दू पक्ष द्वारा समूची मसजिद ही गिरा दी गई।

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फ़ैसले का ठोस क़ानूनी आधार क्या?

माननीय न्यायालय के फ़ैसले के सबसे अहम् पहलू पर यहाँ कुछ ज़रूरी सवाल उठते हैं: अयोध्या में बाबरी मसजिद के पास के राम चबूतरे और अंदरूनी आंगन वाले इलाक़े में भजन-कीर्तन करने वालों का ज़िक्र कुछ विदेशी पर्यटकों के यात्रा-वृत्तांत में मिलता है। इस बात का हवाला कोर्ट-जजमेंट में आया है। न्यायालय ने पाया है कि सन् 1857 में दीवार बन जाने के बाद भी भजन-कीर्तन आदि जारी रहा। क्या सिर्फ़ ऐसे ही ‘साक्ष्यों’ से अयोध्या के विवादित परिसर की समूची 2.77 एकड़ ज़मीन ‘रामलला विराजमान’ या उनके पक्षधर कथित हिन्दू पक्ष को सौंपने का ठोस क़ानूनी आधार बनता है?

मजे की बात है कि बाबरी मसजिद जहाँ खड़ी थी, उसके नीचे किसी मंदिर की ठोस संरचना के होने या उसे ध्वस्त कर मसजिद बनाए जाने के कथित हिन्दू-पक्ष या एएसआई के किसी अधिकारी या उनकी खोजपरक रिपोर्ट के दावे को माननीय पीठ ने भी ठोस साक्ष्य नहीं माना है।

कोर्ट कई जगह एएसआई की रिपोर्ट की चर्चा करता है पर उसकी साफ़ मान्यता है कि एएसआई की ऐसी कोई रिपोर्ट उसके फ़ैसले का आधार नहीं बन सकती, जहाँ ज़मीन का मालिकाना हक़ तय किया जाना है। इसका फ़ैसला क़ानूनी सिद्धांत के आधार पर ही किया जाएगा।

कोर्ट के इस मंतव्य से किसी मंदिर को ध्वस्त करके मुग़ल बादशाह बाबर या उसके किसी प्रतिनिधि द्वारा वहाँ जबरन मसजिद बनाने का आरएसएस-बीजेपी का दुष्प्रचार स्वतः नामंज़ूर होता है। पर यह नहीं समझ में आया कि सदियों से मसजिद के भौतिक वजूद और उसे सन् 1992 में गिराए जाने के ठोस तथ्यों के बावजूद विद्वान न्यायाधीशों की माननीय पीठ गलियारे, आंगन या चबूतरे पर उस स्थल को रामलला का जन्म स्थान समझते हुए भजन-कीर्तन या पूजा आदि जैसी हिन्दू धार्मिक क्रिया में लिप्त होने के कुछ विदेशी पर्यटकों के किताबी ब्यौरे को ही कथित हिन्दू-पक्ष के भूमि पर अधिकार के लिए ज़्यादा ठोस आधार क्यों और कैसे मान लेती है? कोर्ट के फ़ैसले के पैरा 786, 797 और 798 को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।

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क्या यह पूर्ण न्याय है?

माननीय पीठ ने सन् 1949 के दिसम्बर महीने में रात के अंधेरे में कुछ शरारती तत्वों द्वारा बाबरी मसजिद अहाते में हिन्दू देवताओं की मूर्ति रखने और फिर 6 दिसम्बर, सन् 1992 को मसजिद विध्वंस करने को घोर ग़ैर-क़ानूनी माना है। पर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित अनेक लोगों, जो इस ग़ैर-क़ानूनी क़दम के अभियुक्त हैं, के ख़िलाफ़ बरसों से कोई कार्रवाई नहीं हुई! क़ानून के घोर उल्लंघनकर्ताओं के ख़िलाफ़ आज तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। 

विडम्बना यह है कि ‘क़ानून का घोर उल्लंघन’ करने या कराने वालों के पक्ष या पक्षकारों को ही 2.77 एकड़ ज़मीन का मालिकाना हक़ भी मिल गया! क्या यह विस्मयकारी नहीं है? क्या इसे ‘पूर्ण न्याय’ कहा जाना चाहिए?

पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ‘पूर्ण न्याय’ करने के आशय से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या के किसी प्रमुख स्थान पर मसजिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन देने का सरकार को निर्देश दिया है। थोड़ी देर के लिए हमारे पाठक हमारी तरह ही भूल जाएँ कि वह हिन्दू हैं या मुसलमान, सिर्फ़ तर्क और तथ्य की रोशनी में इस फ़ैसले को पढ़ने की कोशिश करें। 

क्या हमारी तरह पाठकों के दिमाग़ में यह सवाल नहीं उठता कि अयोध्या के किसी प्रमुख स्थान पर राम मंदिर बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन देने का फ़ैसला क्यों नहीं हुआ? अयोध्या के उक्त भूखंड में मंदिर होने का साक्ष्य ज़्यादा ठोस था या मसजिद होने का?

क्या हमारी या हमसे पहले की पीढ़ियों को उक्त स्थल पर कभी कोई मंदिर दिखा था? जब 1560-70 के आसपास ‘रामचरित मानस’ लिखने वाले राम के अनन्य भक्त तुलसी दास को नहीं दिखा तो फिर और किसे दिखता!

मंदिर बनाने के लिए कथित हिन्दू पक्ष को जो 2.77 एकड़ ज़मीन दी गई है, क्या ज़मीन के उसी टुकड़े के एक हिस्से में वह बाबरी मसजिद 470 साल तक नहीं खड़ी थी? क्या वह धार्मिक संरचना सन् 1528 से सन् 1992 तक किसी पक्ष के हक़ या अधिकार के बगैर खड़ी थी? अगर यह मान भी लिया जाए कि किसी ख़ास कालखंड में उक्त मसजिद में नमाज़ पढ़े जाने का ठोस साक्ष्य नहीं मिलता तो भी उसके उपासना-स्थल होने के वजूद पर तो कोई सवाल नहीं है! ऐसे में क़ानून या तर्क की दृष्टि से ज़मीन पर उसके दावे को कथित हिन्दू पक्ष के दावे से कमज़ोर कैसे माना जाएगा? कुछ विदेशी पर्यटकों के इस ब्यौरे को कि वहाँ चबूतरे या आंगन में भजन-कीर्तन या पूजा आदि करने वालों की मौजूदगी देखी गई थी, क्या मसजिद के 470 साल के वजूद से भी ज़्यादा वजनदार साक्ष्य माना जाना चाहिए?

विभाजन की राजनीति पर अंकुश लगेगा?

क्या माननीय न्यायालय का यह फ़ैसला ‘संपूर्ण न्याय’ से ज़्यादा बीते कई दशकों से व्याप्त उत्तर भारत के एक बड़े सियासी-सांप्रदायिक विवाद को सुलझाने की न्यायिक-प्रशासकीय कवायद ज़्यादा है? क्या यह फ़ैसला जाने-अनजाने बहुसंख्यक आबादी की आस्था और कुछ सियासी अभियानों के दबाव के प्रति कुछ झुका हुआ या उनसे समाज को उन्मुक्त करने की इच्छा से प्रेरित दिखता है? क्या सिर्फ़ न्यायिक होने से ज़्यादा इसमें न्याय और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन तलाशने की कोशिश भी दिखती है? इन विचारणीय मुद्दों के बावजूद अगर इस फ़ैसले से उत्तर भारत में मनुवादी-हिन्दुत्व प्रेरित सांप्रदायिक टकराव, विद्वेष और विभाजन की राजनीति पर अंकुश लगता है तो कुछेक पहलुओं पर न्यायिक और क़ानूनी दृष्टि से दोषपूर्ण फ़ैसला होने के बावजूद भारतीय समाज को इसका अभिनंदन करना चाहिए। मैं तो निश्चय ही इसका अभिनंदन करूँगा। क्या ऐसा होगा?

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