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कुतुब मीनार विवाद में 9 जून को आएगा फ़ैसला

दिल्ली की साकेत जिला कोर्ट ने मंगलवार को कुतुब मीनार मामले में की गई अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। ये अपील दिल्ली की सिविल अदालत के द्वारा दिसंबर 2021 में दिए गए फैसले के खिलाफ की गई थी। जिला कोर्ट 9 जून को इस मामले में अपना फैसला सुनाएगी। 

सिविल अदालत में बीते साल दायर याचिका में कहा गया था कि कुतुब मीनार परिसर में स्थित कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद को हिंदू और जैन धर्म के 27 मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था। 

तब सिविल अदालत ने कहा था कि यह मुकदमा पूजा स्थल कानून 1991 का उल्लंघन करता है और इसलिए इस याचिका को खारिज कर दिया गया था। 

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सिविल अदालत ने यह भी कहा था कि अतीत की गलतियों के कारण वर्तमान की शांति को भंग नहीं किया जा सकता है और अगर इसकी अनुमति दी जाती है तो इससे संविधान के ताने-बाने और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान होगा।

लेकिन इसके बाद इस फैसले को साकेत की जिला अदालत में चुनौती देने वाली अपील में एडवोकेट हरिशंकर जैन ने देवताओं की फिर से पूजा करने की अनुमति देने की मांग की थी। 

जैन ने कहा, "इस बात को स्वीकार किया जाता है कि पिछले 800 सालों से इस जगह को मुसलमानों द्वारा इस्तेमाल नहीं किया गया है और मस्जिद से पहले जब वहां एक मंदिर था तो इसे फिर से बहाल क्यों नहीं किया जा सकता।"

जैन ने अपने तर्क के लिए प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 की धारा 16 का संदर्भ दिया। यह संदर्भ किसी भी पूजा स्थल के दुरुपयोग को रोकता है। 

हरिशंकर जैन ने अयोध्या विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्देश का भी हवाला दिया। जैन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अगर किसी जगह पर एक बार देवता होते हैं तो वहां पर हमेशा देवता होते हैं और अगर किसी मंदिर को ध्वस्त कर दिया जाता है तो इससे उसकी अहमियत कम नहीं हो जाती। 

जैन ने अपनी दलील में कहा, मैं भी एक उपासक हूं और अभी भी कुतुब मीनार परिसर में देवताओं के चित्र मौजूद हैं, उन्हें देखा जा सकता है और यदि देवता जीवित हैं तो मेरे द्वारा पूजा करने का अधिकार बना रहता है।"

इस पर अदालत ने कहा कि सवाल यह है कि क्या पूजा का अधिकार एक स्थापित अधिकार है, क्या यह कोई संवैधानिक या कोई किसी अन्य तरह का अधिकार है। अदालत ने कहा कि सवाल यह भी है कि क्या याचिकाकर्ता को उसके किसी भी कानूनी हक से वंचित किया गया है और इस मामले में आगे क्या किया जा सकता है। 

अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि आप चाहते हैं कि इस स्मारक को मंदिर में बदल दिया जाए लेकिन अदालत का सवाल यह है कि आप यह कैसे दावा करेंगे कि वादी को यह मानने का कानूनी अधिकार है कि यहां लगभग 800 साल पहले मंदिर मौजूद था। 

जज ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि अगर देवता बिना पूजा के 800 साल तक जीवित रह सकते हैं तो उन्हें इसी तरह रहने दीजिए।

लेकिन हरिशंकर जैन ने कहा कि सिविल अदालत के आदेश से संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हिंदू समुदाय के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है। इस पर अदालत ने पूछा कि क्या पूजा का अधिकार कोई मौलिक अधिकार है। 

इस पर जैन ने कहा, “अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि देवता जीवित रहते हैं, वह कभी कहीं नहीं जाते और इससे मेरा पूजा का अधिकार जीवित रहता है।” 

मूर्तियां हैं मौजूद

मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग यानी एएसआई ने स्वीकार किया कि कुतुब मीनार परिसर में भगवान गणेश के चित्र भी हैं और कई मूर्तियां भी मौजूद हैं। लेकिन एएसआई ने यह भी कहा कि 1958 के कानून के मुताबिक, ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत किसी भी स्मारक पर पूजा शुरू की जा सकती है। 

एएसआई ने अदालत में कहा कि इस बात के कोई सुबूत नहीं हैं कि कुतुब मीनार परिसर में स्थित मस्जिद किसी ध्वस्त किए गए ढांचे के ऊपर बनाई गई है।
एएसआई ने यह भी कहा कि इस बात के भी कोई सबूत नहीं हैं कि लोहे के स्तंभ और मंदिरों के कथित अवशेष भी यहीं पर थे या इन्हें बाहर से लाया गया था। एसआई ने आगे कहा कि कुतुब मीनार कभी भी पूजा स्थल नहीं था। 
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एएसआई की ओर से पेश हुए एडवोकेट सुभाष गुप्ता ने कहा कि जब कोई स्मारक 1958 के कानून के अंतर्गत एएसआई के तहत आ जाता है तब उसके खिलाफ आपत्ति करने के लिए 60 दिन का वक्त होता है और इस वजह से देश भर में कई ऐसे स्मारक हैं, जो पूजा स्थल हैं और कई ऐसे हैं जो पूजा स्थल नहीं हैं। 

उन्होंने इस दौरान पूजा स्थल कानून 1991 का भी हवाला दिया और कहा कि यह कानून किसी भी धर्म स्थल के चरित्र में किसी तरह के बदलाव को रोकता है। जबकि 1958 का जो कानून है वह स्मारकों के संरक्षण के लिए है।

Quwwat Ul Islam Masjid in Qutub Minar Complex  - Satya Hindi

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निश्चित रूप से देश के अंदर टीवी से लेकर सोशल मीडिया और अखबारों तक इन मामलों को लेकर जबरदस्त बहस का माहौल है और राजनेताओं के बयानों ने भी इन्हें लेकर जारी बहस को और बढ़ा दिया है। 

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