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ओमिक्रॉन के ख़तरे के बाद क्या प्रधानमंत्री मोदी रैलियाँ बंद करेंगे?

ओमिक्रॉन वैरिएंट के ख़तरे के बीच चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में लगातार ताबड़तोड़ रैली कर रहे प्रधानमंत्री मोदी ने आज भी जनसभा को संबोधित किया। वाराणसी में इस कार्यक्रम के लिए जोर शोर से तैयारियाँ की गईं। ख़ूब प्रचार किया गया। 21 सौ करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास है तो बड़ी संख्या में लोग भी जुटे या जुटाए गए। तो सवाल है कि क्या इससे ओमिक्रॉन या कोरोना के दूसरे वैरिएंट के फैलने का ख़तरा नहीं होगा?

इस सवाल का जवाब तो प्रधानमंत्री मोदी भी जानते होंगे! तभी वह उस जनसभा में जा रहे हैं। और फिर उस जनसभा के बाद वह आज ही कोरोना पर समीक्षा बैठक भी लेने वाले हैं। उस समीक्षा बैठक में इसकी समीक्षा की जा सकती है कि कोरोना का ख़तरा अब कितना है, ओमिक्रॉन से निपटने की तैयारी कैसी है और आपात व्यवस्था कैसी है? क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं?

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लेकिन सवाल है कि क्या इस समीक्षा बैठक में इसकी समीक्षा की जाएगी कि चुनावी रैलियों, जनसभाओं, रोड शो में जो बड़ी-बड़ी भीड़ उमड़ रही है, उससे कोरोना के ओमिक्रॉन वैरिएंट के फैलने का ख़तरा रहेगा?

यह सवाल इसलिए कि उत्तर प्रदेश में अगले कुछ महीनों में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसको लेकर बीजेपी से लेकर सपा, कांग्रेस, बसपा जैसे दल मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। इनके कार्यक्रमों में बड़ी तादाद में भीड़ उमड़ रही है। लेकिन ऐसी भीड़ के बावजूद न तो मास्क का इस्तेमाल किया जा रहा है और न ही सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन। ऐसे में ओमिक्रॉन जैसे सबसे तेज़ संक्रामक बीमारी से क्या हालात होंगे! 

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ओमिक्रॉन डेल्टा से भी 70 फ़ीसदी तेज़ी से फैलता है। खुद केंद्र सरकार ने ही कहा है कि ओमिक्रॉन डेल्टा से कम से कम 3 गुना ज़्यादा तेज़ गति से फैलता है। केंद्र सरकार राज्यों को आगाह कर चुका है और वार रूम स्थापित करने के निर्देश दिए हैं।

तो क्या इतने ख़राब हालात की आशंका के मद्देनज़र चुनावी रैलियों पर राजनीतिक दल अपनी ओर से कुछ पहल करेंगे?

क्या वह ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री मोदी उठाएंगे कि आगे चलकर कुछ ऐसा उदाहरण पेश करें कि वह ओमिक्रॉन फैलने से रोकने के लिए चुनावी रैली, जनसभाएँ नहीं करेंगे? देश के प्रधानमंत्री होने के नाते क्या वह यह नेतृत्व क्षमता दिखाएँगे?

उनसे ऐसी उम्मीद इसलिए भी की जाती है क्योंकि देश के प्रधानमंत्री होने के नाते कोरोना को फैलने से रोकने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है। कोरोना नियंत्रित होगा तो प्रधानमंत्री के नेतृत्व की तारीफ़ होगी। लेकिन सवाल है कि क्या वह ऐसा करेंगे? 

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हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश की उनकी ताबड़तोड़ रैलियों और जनसभाओं से ऐसा होता तो नहीं दिखता है। पिछले दस दिन में आज वह दूसरी बार वाराणसी में हैं। दो दिन पहले उन्होंने प्रयागराज में ऐसी ही जनसभा की थी। उसमें बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर हैंडल पर ही उत्तर प्रदेश में उनकी सभाओं की तसवीरें और वीडियो भरे पड़े हैं।

ऐसी ही तसवीरें तब भी आई थीं जब इस साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल सहित पाँच राज्यों में चुनाव हुए थे। रैलियों में भीड़ जुटाने की होड़ लगी थी। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी तक 'अप्रत्याशित भीड़' का बखान कर रहे थे। क्या मौजूदा हालात इससे अलग लगते हैं?

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तब डेल्टा वैरिएंट आया था। हर रोज़ संक्रमण के मामले क़रीब 3 लाख से ज़्यादा आ रहे थे, 4 हज़ार मौतें हो रही थीं और चुनावी रैलियाँ बदस्तूर चल रही थीं। तब ख़बरें आई थीं कि अस्पताल में बेड नहीं मिल रहे थे, मेडिकल ऑक्सीजन के बिना लोगों की जानें जा रही थीं। गंगा में शव तैरते मिले थे और रेतों में शव दफनाए जाने वाली तसवीरें सामने आई थीं। भारत ने ऐसी तबाही शायद ही कभी देखी हो।

चुनावी रैलियों और जनसभाओं में कोरोना नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गई थीं। चुनाव आयोग ने आख़िरी के दो चरणों में रोड शो, बाइक व साइकिल रैली पर प्रतिबंध लगाया था। तब सार्वजनिक सभाओं में संख्या 500 तक सीमित कर दी गई थी। लेकिन यह फ़ैसला लेने में काफी देर हो चुकी थी। तो क्या इस बार पिछली बार के हालात से राजनीतिक दल और नेता सीख लेंगे? क्या ओमिक्रॉन को फैलने से रोकने के लिए प्रयास होता दिखेगा?

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