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यूसीसीः उत्तराखंड ने कमेटी बनाई, केंद्र सरकार की अब तक कोई पहल नहीं

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2019 के मौके पर अपना जो चुनाव घोषणा पत्र जारी किया था, उसमें देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लाने की बात कही थी। गोवा के बाद उत्तराखंड दूसरा ऐसा राज्य है जिसने यूसीसी लागू करने के लिए एक ड्राफ्ट कमेटी बना दी है। यूपी, हिमाचल प्रदेश समेत कई बीजेपी शासित राज्य अपने यहां यूसीसी लाने की घोषणा कर चुके हैं। महत्वपूर्ण यह है कि बीजेपी शासित केंद्र सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ाया है। समझा जाता है कि वो अपनी राज्य सरकारों से यूसीसी पर घोषणाएं करवाकर अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया देखना चाहता है। बीजेपी यूसीसी के जरिए बड़े ध्रुवीकरण की उम्मीद कर रही है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (भाग IV) एक समान नागरिक संहिता की स्थापना का प्रावधान करता है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) में यूसीसी शामिल है। जिसे राज्य सरकारें लागू कर सकती हैं।

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उत्तराखंड में बनी कमेटी

उत्तराखंड सरकार ने शुक्रवार को यूसीसी लागू करने के लिए एक ड्राफ्ट कमेटी गठित की है। पांच सदस्यीय कमेटी की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना देसाई होंगी, जो अभी भारतीय परिसीमन आयोग की प्रमुख हैं।
समिति के अन्य सदस्यों में दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज प्रमोद कोहली, राज्य के पूर्व मुख्य सचिव और 1983 बैच के आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, दून यूनिवर्सिटी की कुलपति सुरेखा डांगवाल और एक अन्य पूर्व मुख्य सचिव मनु गौर शामिल हैं। 
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने चंपावत में एक जनसभा में कहा कि राज्य सरकार ने हाल के विधानसभा चुनावों से पहले यूसीसी को अपनाने का वादा किया था और इसे जल्द ही लागू किया जाएगा। धामी ने कहा, यूसीसी लागू करने वाला गोवा के बाद उत्तराखंड दूसरा राज्य होगा। हम लोगों के लिए यूसीसी लाएंगे, चाहे वे किसी भी धर्म और समाज के वर्ग से हों। 
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कांग्रेस का हमला

कांग्रेस ने राज्य सरकार पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाया गया है। रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए कांग्रेस सांसद प्रदीप टम्टा ने धामी सरकार से इस पर और स्पष्टीकरण की मांग की कि यूसीसी राज्य के अधिकार में है या नहीं।
टम्टा ने कहा, मुझे यूसीसी के लिए कोई जनता की मांग नहीं दिख रही है जैसा कि पुष्कर धामी दावा कर रहे हैं। मोदी सरकार पिछले 8 साल से देश पर राज कर रही है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि यूसीसी राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं। 
बता दें की बीजेपी लंबे समय से देश में समान नागरिक संहिता की वकालत करती रही है। विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और रखरखाव जैसे नागरिक मामलों में यूसीसी व्यक्तिगत कानूनों का स्थान लेता है और विभिन्न धर्मों के सदस्यों के लिए समान नियमों की मांग करता है। 1985 में प्रसिद्ध शाह बानो मामले के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने भी यूसीसी का सुझाव दिया था। 
हालांकि बीजेपी बीच में कई बात केंद्र की सत्ता में आई लेकिन यूसीसी पर उसने कोई पहल नहीं की। हालांकि यह मुद्दा उसके घोषणापत्र में हर बार शामिल रहा है। 2019 में जब बीजेपी प्रचंड बहुमत लेकर केंद्र की सत्ता में दोबारा पहुंची तो बीजेपी समर्थकों ने यूसीसी की मांग जोरशोर से की, लेकिन बीजेपी ने इसे केंद्र के जरिए लागू करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। 2024 के आम चुनाव को लेकर बीजेपी अभी से चुनावी मोड में है लेकिन प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री समेत केंद्र के किसी भी मंंत्री ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर एक भी शब्द नहीं बोला है। अलबत्ता उसके द्वारा शासित राज्य सरकारें अब यूसीसी की घोषणा कर रही हैं।
2 मई को, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने घोषणा की कि जल्द ही राज्य में यूसीसी पेश किया जाएगा। यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अप्रैल में ट्वीट करके बताया था कि यूपी में भी जल्द ही यूसीसी लाया जाएगा। इस पर काम शुरू हो चुका है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने भी हाल ही में इसका समर्थन करते हुए कहा कि यूसीसी को मुस्लिम महिलाओं के सर्वोत्तम हित में अपनाया जाना चाहिए।

गोवा में क्या है

गोवा के बाद उत्तराखंड यूसीसी को अपनाने वाला दूसरा भारतीय राज्य होगा। गोवा वर्तमान में एक समान नागरिक संहिता वाला एकमात्र राज्य है, जो गोवा के विलय के समय का है। भारत ने 1867 पुर्तगाली नागरिक संहिता को रखा है, जो सभी राज्य निवासियों पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। राज्य में सभी विवाहों को गोवा नागरिक संहिता के तहत पंजीकृत होना आवश्यक है।
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