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प्रेमचंद 140 : छठी कड़ी-  प्रेमचंद : दीन और इंसानियत

प्रेमचंद किसी भी तरह हिंदुओं की असुरक्षा के तर्क को मानने को तैयार नहीं। वे इस बात को भी नहीं क़बूल कर सकते कि इस देश में मुसलमानों या अन्य धर्मालंबियों को हिंदुओं की शक्ल में ढल जाना चाहिए।
 

अपूर्वानंद

‘इस शरारत का बदला किसी ग़रीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरख़्वास्त है।”

“मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है - सिर्फ़ यह इल्तजा करती हूँँ कि आपके मुल्क में अक़लियत का कोई मज़लूम हो तो याद कर लीजिएगा।’

क्या आपको नहीं  लगता कि ये दोनों वाक्य एक ही लेखक के हैं? लेकिन जैसा हम पिछली कड़ी में देख आए हैं, पहला प्रेमचंद का है और दूसरा उनसे नितांत भिन्न स्वभाव के अज्ञेय का। लेकिन ज़्यादा महत्त्वपूर्ण वाक्य अज्ञेय की पात्र जैबू का इसके बाद है: कोई सताया हुआ अल्पसंख्यक अगर भारत में देविंदरलाल जैसे हिंदू को मिले तो उसका फ़र्ज़ होगा उसकी मदद करना,  इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, बल्कि ‘इसलिए कि आप इंसान हैं।’ 

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पाठक अज्ञेय के इस वाक्य को उसकी प्रेमचंदीय सरलता के कारण अमूमन पढ़कर पन्ना पलट देता है। लेकिन इस वाक्य में एक गहरी चुनौती छिपी है: इंसान रह पाना या बन पाना इतना भी आसान नहीं है। उसके लिए बहुत सारे सहज, स्वाभाविक-से लगते भावों, जैसे प्रतिशोध, का विसर्जन करना पड़ता है। दूसरे, अपनी न्याय भावना को निरंतर सजग रखते हुए उसका परिष्कार करते रहना होता है। तीसरे, इस विशेष संदर्भ में इस बात को समझना, जो प्रेमचंद ने एक निबंध में लिखी, 

‘रहा तबलीग़ का मसला। ….हर मज़हब को इसका काफ़ी अख़्तियार है बशर्ते कि उद्देश्य सच्चे अर्थों में धर्म का संस्कार और सिद्धांतों का प्रचार हो। जब उसमें कोई राजनीतिक उद्देश्य छिपा होता है तो वह फ़ौरन एक सियासी मामले की सूरत अख़्तियार कर लेता है। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में धर्म विश्वासों के संस्कार का साधन नहीं, राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बना दिया गया है।उसकी हैसियत पागलपन की-सी हो गयी है जिसका उसूल है कि सबकुछ अपने लिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं। जिस दिन यह आपस की होड़ और दूसरे से आगे बढ़ जाने का खयाल धर्म से दूर हो जायगा, उस दिन धर्म-परिवर्तन पर किसी के कान न खड़े होंगे।’

‘मनुष्यता का अकाल’

यह संयोग नहीं कि प्रेमचंद के इस निबंध का शीर्षक है, ‘मनुष्यता का अकाल।’ इस लेख में वे हिंदुओं की इस वजह से भर्त्सना करते हैं कि उन्होंने ख़िलाफ़त के सवाल को महात्मा गाँधी जैसे व्यापक नज़रिए से न देखा। प्रेमचंद पर आरंभिक प्रभाव आर्य समाज का था, लेकिन वे इसकी द्वेषपूर्ण संकीर्णता के ख़तरे को समझ पाए थे और शुद्धि-आंदोलन के सख़्त मुख़ालिफ़ थे। इसी लेख में वे कहते हैं, 

‘हिंदू क़ौम कभी अपनी राजनीतिक उदारता के लिए मशहूर नहीं रही और इस मौक़े पर (ख़िलाफ़त) उसने जितनी संकीर्णता का परिचय दिया है, उससे मजबूरन इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि इस क़ौम का राजनीतिक दिवाला ही निकल गया वर्ना कोई वजह न थी सारी हिंदू क़ौम सामूहिक रूप से कुछ थोड़े से उन्मादग्रस्त तथाकथित देशभक्तों की प्रेरणा से इस तरह पागल हो जाती।…अगर हिन्दुओं में एक भी किचलू, मुहम्मद अली या शौक़त अली होता तो हिन्दू -संगठन और शुद्धि की इतनी गर्मबाज़ारी न होती।’

प्रेमचंद अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं कि भले ही सांगठनिक तौर पर कांग्रेस इस शुद्धि अभियान में शामिल न हो, उसके सदस्य व्यक्तिगत हैसियत से इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। 
वे मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, लाला भगवानदीन और लाला श्रीप्रकाश की भी आलोचना करते हैं कि उनमें इस शुद्धि आंदोलन का विरोध करने का नैतिक साहस नहीं है।

 ‘…इन सभी लोगों ने एक रोज़ अपने विरोध और अपनी आशंका को व्यक्त करके दूसरे रोज़ उसका खंडन कर दिया और डंके की चोट पर यह कहा कि शुद्धि और संगठन के बारे में हमने जो खयाल जाहिर किया था वह गलतफहमियों पर आधारित था। जब ऐसे-ऐसे लोग दबाव में आ जायँ तो फिर इंसाफ़ की उम्मीद किससे की जाये।’ 

शुद्धि आंदोलन का स्वामी दयानंद के नेतृत्व वाले आर्य समाज का रिश्ता है। लाला लाजपत राय, जो खुद आर्य समाज के सदस्य थे, इसके बारे में लिखते हैं कि पहले तो कट्टर आर्यसमाजी कहा करते थे कि आर्य समाज में शामिल होने के लिए हिन्दुओं को भी अपनी शुद्धि करानी होगी. लेकिन इसका व्यावहारिक पक्ष था अन्य धर्मावलंबियों को हिंदू धर्म के दायरे में ले आना। इसके पीछे ख़याल यह था कि ये सब पहले हिंदू ही थे। ध्यान मलकान लोगों पर केंद्रित किया गया जिनके रीति रिवाज बहुत कुछ हिन्दुओं से मिलते थे। मलकान मुसलमानों की दिलचस्पी जितनी हिंदू धर्म में न थी, उतनी इसमें कि उन्हें राजपूत माना जाए। इसके लिए हिंदू राजपूत तैयार न थे। लाला लाजपत राय आगे लिखते हैं :

‘शुद्धि का सिद्धांत अब हिंदू महासभा के द्वारा स्वीकार कर लिया गया है. और मैं स्वीकार करता हूँ कि इस निर्णय के पीछे आंशिक रूप से राजनीतिक, आंशिक रूप से साम्प्रदायिक और आंशिक मानवतावादी प्रेरणा है…’

इसके साथ ही ‘संगठन’ के आंदोलन का जिक्र करते हुए ‘संगठन’ और आर्य समाज के बीच तनाव को नोट करते हैं। लाला लाजपत राय भी स्वीकार करते हैं कि शुद्धि और संगठन के कारण मुसलमानों में प्रतिक्रिया हुई और तबलीग़ और तंजीम का जन्म हुआ।
इन दोनों से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव और वैमनस्य बढ़ेगा, इससे एक में ‘मुसलमान विरोधी भावना और दूसरे में हिंदू विरोधी भावना बनाए रखी जाएगी।’

महात्मा गाँधी ने भी स्वामी दयानंद को सावधान किया था। स्वामी श्रद्धानंद की वीरता और निडरता का उल्लेख करते हुए उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया कि वे सोचते हैं कि प्रत्येक मुसलमान को आर्य धर्म में दीक्षित किया जा सकता है। स्वामी दयानंद को उन्होंने लिखा कि एक उदार और व्यापक धर्म को संकीर्ण बनाया जा रहा है। शुद्धि और संगठन जैसे आंदोलनों से सिर्फ हिंदुओं के भीतर असुरक्षा और मुसलमानों के खिलाफ़ द्वेष पैदा किया जा रहा था।

असुरक्षा का तर्क

प्रेमचंद किसी भी तरह हिंदुओं की असुरक्षा के तर्क को मानने को तैयार नहीं। वे इस बात को भी नहीं क़बूल कर सकते कि इस देश में मुसलमानों या अन्य धर्मालंबियों को हिंदुओं की शक्ल में ढल जाना चाहिए, 

 ‘….हिन्दू-संगठन की पुकार ने हिन्दू-मुसलिम एकता को जो ठेस पहुँचाई है, उसका बुरा असर अगर दूर भी होगा तो बहुत दिनों में होगा। हिन्दू और मुसलमान न कभी दूध-चीनी थे, न होंगे और न होने चाहिए। दोनों की अलग-अलग सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी।'

यह लेख इस लिहाज़ से दिलचस्प है कि प्रेमचंद बार-बार अफ़सोस करते हैं कि हिन्दू-मुसलिम एकता के लिए जान लड़ा देनेवाले हिंदुओं में नहीं दिखलाई पड़ते। सवाल सिर्फ़ राजनीतिक उदारता का नहीं, आम तौर पर एक व्यापक मानवीय उदारता का है। लेकिन जैसा पहले कहा गया, उदारता का अर्थ न्याय की संवेदना से ख़ाली होना नहीं है। उदारता, सांस्कृतिक एकता, पवित्रता के भाव में साझेदारी और उसके उल्लंघन की गंभीरता इन प्रश्नों ‘मंदिर-मसजिद’ नामक अपनी कहानी में वे उठाते हैं।
चौधरी इतरत अली बड़े जागीरदार हैं। पाँचों वक्त के नमाज़ी, तिलावत करना न भूलनेवाले, शरा के पाबंद और तीसों रोज़े रखनेवाले, यानी पक्के मुसलमान। लेकिन रोज़ाना गंगा में नहाना, गंगाजल ही पीना और साधुओं का वैसे ही स्वागत करना जैसे फ़क़ीरों का। चाहे तो कोई इससे यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि आदर्श मुसलमान ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन प्रेमचंद का ध्यान इसपर नहीं है। 

चौधरी साहब का विश्वस्त चपरासी है ठाकुर भजन सिंह, जिसकी बदौलत वे दुश्मनों की चौखट पर भी इत्मीनान से सो सकते थे। चौधरी साहब की इस मिलावटी ज़िंदगी से शुद्धतावादी मुसलमान हैरान थे और उनसे जलते थे। हिंदुओं को नीचा दिखलाने की जुगत तलाशते हुए आख़िर उन्हें एक मौक़ा मिल गया।

ठाकुरद्वारे में कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। भजन कीर्तन चल रहा है कि पत्थर बरसने लगते हैं। शोर मच जाता है। चौधरी साहब को ख़बर होती है कि मंदिर पर बदमाशों ने हमला कर दिया है तो वे भजन सिंह को उन्हें समझाने भेजते हैं, ‘न माने तो दो चार हाथ चला भी देना,  मगर ख़ून खच्चर न हो पाये।’

भजन सिंह को मुँहमाँगी मिलती है। वे मंदिर में घुस आए लोगों की बुरी तरह पिटाई करते हैं। इसमें उनका शिकार हो जाता है शाहिद जो चौधरी साहब का दामाद है। 

‘ठाकुर ने थरथर काँपते हुए कहा-मालिक, भगवान जानते हैं, मैंने पहचाना नहीं।

चौधरी-- नहीं, मैं तुम्हारे ऊपर इलज़ाम नहीं रखता। भगवान के मंदिर में किसी को घुसने का अख़्तियार नहीं है। अफ़सोस यही है कि ख़ानदान का निशान मिट गया और तुम्हारे हाथों!

 … ख़ुदा को जो मंज़ूर था वह हुआ। मैं अगर खुद शैतान के बहकावे में आकर मंदिर में घुसता और देवता की तौहीन करता, और तुम मुझे पहचानकर भी क़त्ल कर देते, तो मैं अपना खून माफ़ कर देता। किसी के दीन की तौहीन करने से बड़ा और कोई गुनाह नहीं है।’

दीन की हिफाज़त 

दीन किसी का भी हो, उसकी हिफ़ाज़त करना हर किसी का फ़र्ज़ है। इस तरह चौधरी साहब भी ‘हिंसा परमो धर्म:’ के जामिद की तरह ही बौड़म ठहरते हैं। लेकिन पावन का वास उन जैसे पक्के मुसलमान के लिए सिर्फ़ मसजिद में नहीं। भजन सिंह के हाथों उनके दामाद को सज़ा मिलती है इस पवित्रता का उल्लंघन करने की। 

चौधरी ठाकुर भजन सिंह को पुलिस से छिपाते हैं और फिर उसका मुक़दमा लड़कर उसे बचा लेते हैं। इसे मुसलमानों में बुरा माना जाता है और हिंदू इसे हिंदू धर्म के प्रति उनके झुकाव का नतीजा मानते हैं:

‘….साम्प्रदायिक द्वेष ने इस सत्कार्य को और ही आँखों से देखा- मुसलमान झल्लाए, हिंदुओं ने बग़लें बजायीं। मुसलमान समझे, इनकी रही-सही मुसलमानी भी ग़ायब हो गयी। हिंदुओं ने ख़याल किया, अब इनकी शुद्धि कर लेनी चाहिए, इसका मौक़ा आ गया।’

चौधरी साहब का नज़रिया न तो हिंदू समझ पाते हैं और न मुसलमान। दोनों अलग अलग संगठित होने लगते हैं, यहाँ तक कि 

‘ठाकुर के कदम भी इस रेले में उखड़ गये।….ज़िंदगी में कभी एक लोटा जल तक शिव को न चढ़ाया था, अब देवी देवताओं के नाम पर लठ चलाने को उद्यत हो गए।’

कहानी के उत्तरार्ध में ठाकुर की अगुवाई में मसजिद के आगे बाजे-गाजे के साथ जन्माष्टमी का जुलूस निकलता है। शाम की नमाज़ हो रही है। जामा मसजिद के आगे जुलूस पहुँचता है। बाजे रोकने को मुसलमान कहते हैं और हिंदू अड़ जाते हैं। जमकर मारपीट होती है: ‘ठाकुर हल्ला मारकर मसजिद में घुस गये…’चौधरी साहब को इसकी खबर होती है:

‘उनका मुख लाल था, त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं और आँखों से चिनगारियाँ-सी निकल रही थी। ख़ुदा का घर नापाक किया गया! यह ख़याल रह-रहकर उनके कलेजे को मसोसता था।…

….मुसलमान किसी मंदिर को नापाक करने के लिए जिस सज़ा के लायक़ हैं, क्या हिन्दू मसजिद को नापाक करने के लिए उसी सज़ा के लायक़ नहीं?’

उन्हें मालूम है कि यह हरकत उनके वफ़ादार ठाकुर भजन सिंह ने की है। 

‘लेकिन आज उसने ख़ुदा के घर को नापाक किया है, और उसे इसकी सज़ा मिलनी चाहिए। इसकी सज़ा क्या है? जहन्नुम!’

‘चौधरी साहब ने ठाकुर को क्रोधोन्मत्त आँखों से देखकर कहा-तुम मसजिद में घुसे थे?

—जानते हो, मसजिद ख़ुदा का घर है?

भजन सिंह-जानता हूँ हुज़ूर, क्या इतना भी नहीं जानता। 

चौधरी- मसजिद ख़ुदा का वैसा ही पाक घर है, जैसे मंदिर।’

चौधरी की न्यायभावना कहती है कि मुसलमान अगर मंदिर को अपवित्र करे तो उसकी सज़ा गर्दनजदनी है, वैसे ही अगर हिंदू मसजिद को नापाक करे तो उसके लिए भी यही सज़ा है। वे ठाकुर को उसके अपराध के लिए क़त्ल करना चाहते हैं:

‘…अब मैं तुमसे ख़ुदा की तौहीन का बदला लूँगा।…मैं क़त्ल करूँगा। तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुमसे मुतलक कीना नहीं है। मेरे दिल को कितना रंज है, यह ख़ुदा के सिवा और कोई नहीं जान सकता। लेकिन मैं तुम्हें क़त्ल करूँगा। यह मेरे दीन का हुक्म है।’

कल्पना और यथार्थ 

जैसे प्रेमचंद की ढेर सारी कहानियाँ लोक कथाओं की तरह असम्भव लगती हैं, यह भी वैसे ही नामुमकिन पात्रों और स्थितियों की कथा लगती है।

यह सारा कुछ प्रेमचंद की कल्पना है। कल्पना जिसे हमेशा यथार्थ के ऊपर दर्जा देते हैं। वह कैसा इंसान है जो चौधरी इतरत अली और ठाकुर भजन सिंह को गढ़ सकता है और यह हिमाक़त कर सकता है कि उसके पाठक, जो हिंदू भी हैं और मुसलमान भी, इन दोनों को सच्चा मानें!
कहानी का अंत इस तरह होता है,
‘ ….चौधरी साहब तलवार लेकर ठाकुर के सामने खड़े हो गये। विचित्र दृश्य था। एक बूढ़ा आदमी, सिर के बाल पके, कमर झुकी, तलवार लिए एक देव के सामने खड़ा था। ठाकुर लाठी के एक ही वार से उनका काम तमाम कर सकता था। लेकिन उसने सर झुका दिया। चौधरी के प्रति उसके रोम-रोम में श्रद्धा थी। चौधरी साहब अपने दीन के इतने पक्के हैं, इसकी उसने कभी कल्पना तक न की थी। उसे शायद धोखा हो गया था कि यह दिल से हिन्दू हैं। जिस स्वामी ने उसे फाँसी से उतार लिया, उसके प्रति हिंसा या प्रतिकार का भाव उसके मन में क्योंकर आता। वह दिलेर था, और दिलेरों की भाँति निष्कपट था। इस समय उसे क्रोध न था, पश्चाताप था। मरने का डर नहीं था, दुःख था।चौधरी साहब ठाकुर के सामने खड़े थे। दीन कहता था—मारो। सज्जनता कहती थी—छोड़ो। दीन और धर्म (!या दया?) में संघर्ष हो रहा था।’
कहानी ख़त्म होती है और हम अपनी दुनिया में लौट आते हैं। हमें मालूम है कि हमारी इस ज़िंदगी में न चौधरी इतरत अली मिलनेवाले हैं और न उनके आगे गर्दन झुकाए ठाकुर भजन सिंह। हमें मालूम है कि वह दिलेरी कितनी मुश्किल है जिसमें कपट न हो! यह सब असम्भव है, लेकिन क्या हमें यह नहीं चाहिए?

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