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क्रिकेट डॉन ब्रैडमैन का नहीं हुआ तो धोनी का क्या होगा!

धोनी ने बिंदास क्रिकेट खेला है। अपनी शर्तों पर खेला है। वह किसी का एहसानमंद नहीं है। ऐसे में जब उसको लेकर सवाल उठते हैं तो तकलीफ़ होती है। धोनी के लिए अब टीम में जगह बन सकती है। वह कुछ और मैच खेल सकता है। पर उससे उसकी कीर्ति में चार चाँद नहीं लगने वाले। हो सकता है वह एकाध मैच जिता भी दे लेकिन इससे क्या उसके पुराने दिन वापस आ पायेंगे?
आशुतोष

महेंद्र सिंह धोनी। यह नाम था एक खिलाड़ी का जिसके बारे में मैंने कभी सुना नहीं था। इसलिये हैरान रह गया जब पता चला कि भारतीय टीम में लेने के लिये उस पर चर्चा हो रही है। मैंने अपने स्पोर्ट्स संवाददाता विमल से पूछा, ‘ये कौन है?’ विमल बोला, ‘राँची से है और बड़ा तगड़ा लप्पा मारता है।’ ‘क्या इसका सेलेक्शन होगा?’ विमल ने बताया, ‘सेलेक्टर बहुत हाइली रेट करते हैं।’ टीम में उसका मुक़ाबला था दिनेश कार्तिक से। विकेटकीपर बैट्समैन। धोनी टीम में आ गया। लंबे बेढब बाल। लापरवाह क़द-काठी। पहले कुछ मैचों में तो कुछ ख़ास नहीं दिखा। लगा धोनी भी दो-चार मैच खेल कर बाहर हो जायेगा। वैसे भी यूपी-बिहार-झारखंड वालों को क्रिकेट टीम में कौन पूछता है! कोई बड़ा खिलाड़ी तो निकला नहीं था। फिर मन में यह भी सवाल था कि दिल्ली-मुंबई की लॉबी काफ़ी मज़बूत है। कहाँ ज़्यादा चांस मिलेगा। पर एक मैच में ताबड़तोड़ 142 रन बना कर धोनी ने भारतीय क्रिकेट की दिशा ही बदल दी। धोनी जिसका कोई ‘गॉडफ़ादर’ नहीं था और जिसने कभी क्रिकेट छोड़कर रेलवे की नौकरी कर ली थी, वह भारतीय क्रिकेट का नया ‘गॉडफ़ादर’ बन गया। 

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धोनी को लेकर आजकल ये अटकलें लगायी जा रही हैं कि उसे संन्यास ले लेना चाहिए। 38 साल की उम्र में वह टीम का भविष्य नहीं हो सकता। टेस्ट क्रिकेट वह पहले ही छोड़ चुका है। वनडे और टी-20 में उसकी जगह अभी भी है। कप्तान विराट कोहली उसे पसंद करते हैं। ख़ासतौर पर कप्तानी के लिए कोहली को धोनी की राय बहुत मायने रखती है। धोनी के मैदान पर रहते कोहली बेफ़िक्र हो कर डीप में फ़ील्डिंग कर लेते हैं और फ़ील्डिंग लगाने का ज़िम्मा धोनी पर छोड़ देते हैं। पर इस विश्व कप में धोनी की कमज़ोरी काफ़ी झलकी। ऐसा लग रहा था जैसे गेंद पर हावी होकर बैटिंग करने वाला धोनी धीमा पड़ गया है। स्ट्राइक रोटेट करने और रन रेट को तेज़ बढ़ाने में वह सक्षम नहीं हो रहा था। जबकि एक ज़माना था कि धोनी चौके-छक्के मारे या न मारे रन उसके बल्ले से निकलते रहते थे। ऐसे में जब भारतीय टीम सेमी फ़ाइनल में हार गयी, विश्व कप जीतने का सपना टूट गया तो बहस चल पड़ी कि धोनी पर ज़्यादा भरोसा करना उचित नहीं है। वह उम्र के उस पड़ाव पर है जब रिफ़्लेक्सेस धीमे हो जाते हैं, दिमाग और शरीर के बीच को-ऑर्डिनेशन टूटने लगता है और खिलाड़ी अपने बेहतरीन दिनों की परछाई मात्र रह जाता है।

धोनी ने बिंदास क्रिकेट खेला है। अपनी शर्तों पर खेला है। वह किसी का एहसानमंद नहीं है। ऐसे में जब उसको लेकर सवाल उठते हैं तो तकलीफ़ होती है। धोनी के लिए अब टीम में जगह बन सकती है। वह कुछ और मैच खेल सकता है। पर उससे उसकी कीर्ति में चार चाँद नहीं लगने वाले। हो सकता है वह एकाध मैच जिता भी दे लेकिन इससे क्या उसके पुराने दिन वापस आ पायेंगे? क्या लंबे बालों वाला धोनी जिसकी तारीफ़ पाकिस्तान के सैनिक शासक परवेज़ मुशर्रफ ने की थी, पुराने रंग में दिख सकता है। नहीं। उम्र और समय कभी लौट कर नहीं आते। उनका पीछा भी नहीं करना चाहिए। क्रिकेट तो डॉन ब्रैडमैन का नहीं हुआ जिन्हें इस खेल का सही मायनों में भगवान कहा जा सकता है। वह भी अपनी आख़िरी पारी में ज़ीरो पर आउट हो गये थे, एक निहायत ही मामूली गेंदबाज़ की गेंद पर। अगर उन्होंने मात्र चार रन बना लिये होते तो उनका प्रति पारी रन औसत 100 होता। न भूतो न भविष्यति। फिर धोनी को क्रिकेट क्यों बख्शेगा? 

फिर धोनी यह क्यों भूल जाता है कि उसके कहने पर 2013 में सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग की टीम से छुट्टी कर दी गयी थी। सचिन लंबे समय से टीम में लुढ़क रहे थे पर उनको हटाने की हिम्मत सेलेक्टरों में नहीं थी।

तब धोनी ने अंगद के पैर की तरह पाँव अड़ा दिया कि 2015 विश्व कप में अगर भारत को चैंपियन बनना है तो नये खिलाड़ियों को मौक़ा मिलना चाहिये। टीम से इन खिलाड़ियों की छुट्टी हो गयी। नये खिलाड़ी आये। नया उत्साह दिखा। और भारत देखते-देखते विश्व की सबसे बेहतरीन टीम बन गयी। कोहली, खिल कर सामने आया और अब यह कहा जा रहा है कि कोहली ‘दबाव में खेलने के मामले में’ सचिन से कहीं बेहतर बल्लेबाज़ है। उसके आँकड़े तुलनात्मक रूप से सचिन से कहीं आगे हैं। उसी तरह वनडे में रोहित शर्मा ने रनों का अंबार लगा दिया। अगर पुराने खिलाड़ियों पर दाँव लगा कर चलते तो आज भारतीय टीम विश्व कप हारने के बाद भी दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम नहीं मानी जाती। धोनी को अब संन्यास ले लेना चाहिए। आईपीएल खेलना चाहे तो खेले लेकिन भारतीय टीम में बने रहने के लिए उसकी जगह नहीं है और न ही टीम को उस पर दाँव लगाना चाहिए। इमरान ख़ान कहते थे कि खिलाड़ी को तब खेलना छोड़ देना चाहिये जब वह शिखर पर हो। तब नहीं जब लोग कहने लगे कि छोड़ते क्यों नहीं।

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किसी लॉबी का हिस्सा नहीं रहे

धोनी का एक स्वभाव रहा है। उसने कभी किसी की परवाह नहीं की और न ही किसी लॉबी का हिस्सा रहा। मुझे याद पड़ता है कि धोनी की शादी की ख़बर आयी थी। किसी को हवा नहीं थी कि वह कहाँ है। तब उसने उत्तराखंड में एक जगह शादी की थी। उसमें जॉन अब्राहम, सुरेश रैना को छोड़ कर शायद ही किसी को निमंत्रण दिया था। मोबाइल के युग में वह कई-कई दिनों तक फ़ोन छोड़ कर मस्ती करने चला जाता है और बोर्ड और समकालीन खिलाड़ी उसे खोजते रह जाते हैं। लोग भूल जाते हैं कि धोनी ने जिस टीम की कप्तानी की वह भारत की सबसे बेहतरीन टीम थी। जिसमें सचिन तेंदुलकर के अलावा सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग, वी. वी. एस. लक्ष्मण, ज़हीर ख़ान, हरभजन सिंह और अनिल कुंबले जैसे महान खिलाड़ी थे। इस टीम की कप्तानी करना आसान नहीं था। पर धोनी कभी किसी के दबाव में नहीं आया। सबका सम्मान उसने हासिल किया और दो-दो वर्ल्ड कप जीते। 2007 में टी-20 जीता और 2011 में वनडे विश्व कप। आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स को उसने रिकॉर्ड तोड़ जिताया। और यह कहने में ज़रा भी झिझक मुझे नहीं है कि धोनी भारत का सबसे कामयाब और सबसे बेहतरीन कप्तान रहा है। वह सौरव से भी आगे है। गावस्कर, पटौदी और कोहली से भी बेहतर। यह सही है उसकी टीम बहुत अच्छी थी पर ऐसी टीम में बड़े-बड़े खिलाड़ियों की इगो को संभालते हुए अच्छा खेल खिला पाना, एक बेहतरीन कप्तान की सबसे बड़ी कसौटी है।

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सौरव बनाम धोनी

सौरव ने टीम को जीतना सिखाया। वह भी महान कप्तान था। पर उसकी टीम में गुट थे। धोनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। सौरव भारत के लिए विश्व कप नहीं जीता पाया। और आईपीएल में भी उसकी कप्तानी में कोलकाता नाइटराइडर्स कोई कमाल नहीं कर पायी। सौरव की ग्रेग चैपेल से ज़बर्दस्त लड़ाई हुई। बाद में आईपीएल में भी शाहरुख़ ख़ान से नहीं पटी। धोनी के करियर पर ऐसा कोई दाग़ नहीं हैं। धोनी सौरव की तरह किसी आभिजात्य परिवार से नहीं था। वह सामान्य मध्य वर्ग से था। राँची से आया था जहाँ क्रिकेट का कोई बड़ा इतिहास नहीं था, आज भी नहीं है। लिहाज़ा संघर्ष करते हुए अपनी क़ाबिलियत पर ही जगह बनानी थी। वह फिसलता तो कोई मदद नहीं करता। धोनी ने न केवल अपनी जगह बनाई बल्कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे बड़े शहरों का एकाधिकार तोड़ा। छोटे-छोटे शहरों के लड़कों को मौक़े मिले। क्रिकेट धोनी के आने के बाद सही अर्थों में ‘अखिल भारतीय खेल’ बना या यों कह सकते हैं कि क्रिकेट इसकी वजह से ‘लोकतांत्रिक खेल’ हो पाया और मेरठ, कानपुर, आगरा, ग़ाज़ियाबाद, राजकोट, बड़ौदा, नागपुर, कोचीन से भी खिलाड़ी आने लगे। वह भले ही सौरव-राहुल-सचिन की तरह अंग्रेज़ी न बोल पाये लेकिन अगर गेंद फेंकनी आती थी तो मुनाफ पटेल को भी टीम में जगह मिली।

धोनी के बाद कौन?

धोनी से पहले विकेटकीपर बल्लेबाज़ी भी कर लेते थे। धोनी ने एडम गिलक्रिस्ट की तरह विकेटकीपर बल्लेबाज़ की भूमिका को ‘रिवोल्युशनाइज़’ किया है। धोनी के बाद चाहे ऋषभ पंत हो या कोई और अब चुनौती धोनी के मानदंडों पर ख़रा उतरने की होगी। ये सवाल हमेशा उठते हैं जब भी कोई महान खिलाड़ी रिटायर होता है। पर हर बार जवाब यही मिलता है कि खेल नहीं रुकता। जैसे सचिन के बाद कोहली आया, हो सकता है धोनी से बेहतर कोई और आ जाए।

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