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आर्टिकल-15: ऊँची जाति ही दिला सकती है दलितों को इंसाफ़?

क्या फ़िल्म 'आर्टिकल 15' के ज़रिये अनुभव बाबा साहेब की रट लगाते-लगाते अंत में बाबा साहेब की तरह ही हार मान लेते हैं। बाबा साहेब तो बौद्ध बन गये थे। अनुभव ने क्यों ‘ब्राह्मण शरणम गच्छामि’ जाना स्वीकार किया। क्या यह उनका अपना वैयक्तिक जातिगत अपराधबोध है या जातिवादी व्यवस्था के आगे एक फ़िल्मकार का आत्मसमर्पण?
आशुतोष

अमेरिकी सिनेमा की तुलना में भारतीय सिनेमा अक्सर समाज की कमज़ोर नस पर हाथ रखने से डरता भी है और बचता भी है। लेकिन अनुभव सिन्हा ने लगातार दो फ़िल्में बनाकर इस मिथक को तोड़ने की कोशिश की है। ‘आर्टिकल 15’ अनुभव सिन्हा की अद्भुत फ़िल्म है। ‘आर्टिकल 15’ अनुभव की फ़िल्म ‘मुल्क़’ की तरह वर्तमान भारत को न केवल झकझोरती है बल्कि उसके सामने एक ऐसा नंगा सच सामने लाकर खड़ा कर देती है जिससे सिर्फ़ आँखें ही चुराया जा सकता है, या फिर पूरा समाज शर्मसार हो सकता हैं। फ़िल्म एक सवाल पूछती है एक महान सभ्यता कैसे सदियों से ऐसे सामाजिक अभिशाप के साथ जी रही है और अब तक उसने क्यों इस सामाजिक कोढ़ से निजात पाने की निर्णायक कोशिश नहीं की? ये कोढ़ है जातिवाद का।

देखें वीडियो में 'आशुतोष की बात'

आज भी जातिवाद का ज़हर दलित तबक़े को इंसान मानने को तैयार नहीं है। संविधान लागू होने के बाद भी ऊँची जातियाँ आज भी दलितों को बराबरी का हक़ देने को राज़ी नहीं हैं। उनकी ‘औक़ात’ कीड़े-मकोड़ों से अधिक कुछ भी नहीं। ऐसे में जब एक ब्राह्मण जाति का पुलिस अधिकारी दलित समाज की दो नाबालिग़ लड़कियों की मौत की जाँच करने लगता है तो पूरे पुलिस महकमे को यह बात समझ में नहीं आती। उनकी नज़र में तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। उनके हिसाब से जिस समाज की ये लड़कियाँ हैं उन्हें भी ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। शुरुआत में कुछ दिन रो-धो लेने के बाद ‘इन लोगों’ की ज़िंदगी फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगती है।

अनुभव की इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि वह इस सामाजिक दलदल में उतरने के लिये तैयार हो जाती है और फिर जो सच सामने आता है वह उस सोच से भी कहीं ज़्यादा वीभत्स है। घृणित है। पैशाचिक है। आज के समय में ऐसी फ़िल्म बनाने के लिये बहुत हिम्मत चाहिये। अनुभव ने यह फ़िल्म बना कर यह साबित किया है कि वह संजय लीला भंसाली की ‘फूहड़ फंतासी’ की दुनिया नहीं उकेरते, न ही वह समाज की बुराई को मख़मल में संजो कर रखते हैं, न तो उसे ग्लैमराइज करते हैं और न ही ‘पद्मावत’ की तरह से इतिहास और कपोल कल्पना का ‘घटिया’ और ‘सांप्रदायिक’ ‘घालमेल’ करते हैं। इस लिहाज़ से यह कहा जा सकता है कि ‘आर्टिकल15’ समाज के नंगेपन को उधेड़ने के मामले में पिछले 25 साल की सबसे बेहतरीन फ़िल्म है। इस फ़िल्म की तुलना शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से ही की जा सकती है और कई मामलों में यह उससे भी बेहतर साबित होती है। लेकिन एक फ़र्क़ है। ‘बैंडिट क्वीन’ जहाँ दर्शकों को ‘शॉक’ करती है वहीं ‘आर्टिकल-15’ आपको ‘सुन्न’ कर देती है। फ़िल्म का सच इतना ‘स्टार्क’ है कि वह अंदर से मानवीय तंतुओं को मार देता है। 

हॉलीवुड में भी बनी थी ऐसी फ़िल्म

बहुत पहले हॉलीवुड में ‘मिसिसिपी बर्निंग’ फ़िल्म बनी थी। इस फ़िल्म ने अमेरिकी समाज का एक घिनौना सच लोगों के सामने रखा था कि कैसे कट्टरपंथी श्वेत तबक़ा अश्वेतों को अपने बीच बर्दाश्त करने के लिये तैयार नहीं है और उनके ख़िलाफ़ संगठित रूप से हिंसा करता है। इस काम में उन्हें पुलिस प्रशासन के साथ-साथ अदालत में बैठे जजों से भी मदद मिलती है। और जब दो वरिष्ठ फ़ेडरल अफ़सर ग़ायब हुये तीन सिविल राइट एक्टिविस्ट की जाँच के लिये निकलते हैं तो पूरा सिस्टम उनके ख़िलाफ़ हो जाता है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि अनुभव ने ‘आर्टिकल 15’ बनाने की प्रेरणा ‘मिसिसिपी बर्निंग’ से ली है या उसकी नक़ल की है, लेकिन दोनों अपने कथन और शिल्प में काफ़ी समान हैं। और बोल्ड भी।

श्वेत-अश्वेत मसला अमेरिकी समाज की दुखती रग है। 1861 से 1865 तक अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को अश्वेतों की ग़ुलामी ख़त्म करने के लिये गृह युद्ध तक लड़ना पड़ा था। उन्होंने ग़ुलामी प्रथा को संसद में क़ानून बना कर ख़त्म भी कर दिया था। इसके बावजूद अश्वेतों का संघर्ष 20वीं सदी में चलता रहा। बाद में मार्टिन लूथर किंग ने जब अश्वेतों के साथ हो रहे भेदभाव का मसला उठाया तो उनको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। आज भी अमेरिका में ‘कू क्लक्स क्लान’ और ‘स्किन हेड्स’ जैसे नस्लवादी संगठन हैं। डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति बनाने में भी नस्लवादी ताक़तों का बड़ा योगदान है। अपने देश में भी पिछले सालों में सांप्रदायिक शक्तियाँ काफ़ी मज़बूत हुई हैं। ये ताक़तें जातिप्रथा की कट्टर समर्थक हैं। इस वजह से दलित तबक़े में काफ़ी बेचैनी देखने को मिल रही है। 

‘आर्टिकल 15’ में दलित नेता के चरित्र में पश्चिम उत्तर प्रदेश में उभरे भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर उर्फ़ रावण का अक्स मिलता है। वह बग़ावती है और अपने समाज को इंसाफ़ देने के लिये लड़ रहा है। पर अंत में व्यवस्था उसका एनकाउंटर कर देती है।

फ़िल्म आर्टिकल 15 उपदेश नहीं देती। न ही वह अकारण किसी एक सामाजिक तबक़े को दोषी या अपराधी ठहराती है। फ़िल्म बाबा साहेब आंबेडकर के दर्शन का पाठ करती चलती है। वह पूरी व्यवस्था और उससे उपजी मानसिकता को कठघरे में खड़ा करती है कि समाज की ऊँची जाति के दबंगों को यह गवारा नहीं है कि दलित समाज के लोग 25 रुपये की जगह 28 रुपये दिहाड़ी की माँग करे और न मिलने पर काम करने से इंकार कर दे। यहाँ मसला तीन रुपये का नहीं है। मसला इस बात का है कि दलितों की इतना हिम्मत कैसे हो गयी कि वे ‘अपनी जात’ को भूलकर सिर उठाये और ऊँची जाति को आँख दिखाये। बाबा साहेब कहते थे- ‘जाति प्रथा एक व्यवस्था जनित अन्याय है।’ वह आगे कहते हैं- ‘जाति प्रथा से ज़्यादा घटिया और कोई सामाजिक संगठन नहीं हो सकता। ....यह वह व्यवस्था है जो लोगों को सहयोगकारी कार्यों में मृतप्राय, पैरालाइज्ड और अपंग बना देती है?’ लड़कियों के पिता को व्यवस्था इस क़दर मजबूर कर देती है कि के सोच से अपंग हो जाते हैं और अपने आप को ही बेटियों का क़ातिल मान लेते हैं। लड़कियों से सामूहिक बलात्कार का मामला ‘ऑनर किलिंग’ बन जाता है और बलात्कारी ही व्यवस्था।

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ब्राह्मणों के बीच भी छुआछूत!

बाबा साहेब के बारे में यह अक्सर ग़लती की जाती है कि वह सिर्फ़ दलितों या पिछड़ों की ही लड़ाई लड़ते रहे और वह सिर्फ़ दलितों के साथ हुए छुआछूत का ही विरोध करते थे। सचाई में वह कहते थे कि जाति प्रथा एक ऐसी चीज़ है जिसकी वजह से एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण के प्रति भी ऊँच नीच का बर्ताव करता है। फ़िल्म में आयुष्मान खुराना यानी पुलिस अफ़सर को बताया जाता है कि वह सरयू पारी ब्राह्मण है और महंत जी कान्यकुब्ज ब्राह्मण। वह जाति में खुराना से बड़े हैं। इसी तरह दलित पुलिस कर्मी जाटव बड़े गर्व से कहता है कि वह जाटव है जबकि गाँव के दलित पासी उनका छुआ नहीं खाता। यानी छुआछूत ऊँची जातियों के अंदर भी है। दलितों से तो छुआछूत बरतते ही हैं, आपस में भी श्रेष्ठताबोध इतना हावी है कि एक ब्राह्मण दूसरे से भी छुआछूत बरतते हैं। बाबा साहेब इसे ‘श्रेणीबद्ध छुआछूत’ कहते थे।

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क्या फ़िल्मकार ने किया आत्मसमर्पण?

एक लिहाज़ से फ़िल्म ने काफ़ी हिम्मत दिखायी है। लेकिन अंत में फ़िल्म थोड़ा निराश करती है। क्या अनुभव फ़िल्म के ज़रिये यह कहना चाहते हैं कि दलित आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है? आख़िर में दलित आंदोलन को वैसे ही कुचल दिया जाएगा जैसे दलित नेता को फ़िल्म में मार दिया जाता है। दलितों को इंसाफ़ तो ऊँची जाति ही दिला सकती है। फ़िल्म के नायक का ब्राह्मण होना और दलित समाज को इंसाफ़ दिलाने के लिये पूरी व्यवस्था से भिड़ जाना और अंत में कामयाब होना, शुभ संकेत नहीं हैं। क्या फ़िल्म के ज़रिये अनुभव बाबा साहेब की रट लगाते-लगाते अंत में बाबा साहेब की तरह ही हार मान लेते हैं। बाबा साहेब तो बौद्ध बन गये थे। अनुभव ने क्यों ‘ब्राह्मण शरणम गच्छामि’ जाना स्वीकार किया। क्या यह उनका अपना व्यैक्तिक जातिगत अपराधबोध है या जातिवादी व्यवस्था के आगे एक फ़िल्मकार का आत्मसमर्पण?

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