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क्या कठोर क़ानून बनाने से रुक जाएँगी रेप जैसी जघन्य वारदात?

हैदराबाद में एक चिकित्सक से सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या और रांची में क़ानून की छात्रा से सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद एक ओर जहां पूरे देश में आक्रोश है, वहीं संसद में ऐसे अपराध के लिये क़ानून को और अधिक कठोर बनाने की माँग उठी है। इस तरह के हैवानियत वाले अपराध के ख़िलाफ़ जनता का आक्रोश पूरी तरह जायज है लेकिन सवाल यह है कि क्या क़ानून में कठोरतम सजा का प्रावधान करना ही पर्याप्त होगा? शायद नहीं।

बलात्कार और सामूहिक बलात्कार एवं हत्या के अपराध में रंगा-बिल्ला से लेकर कई दोषियों की मौत की सजा पर अमल हो चुका है और कई मामलों में उनकी सजा घटाकर उम्र कैद में तब्दील की जा चुकी है। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के साथ होने वाले इस क्रूरतम अपराध के मामले बढ़ते जा रहे हैं। 

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दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता, बच्चों का यौन शोषण से संरक्षण क़ानून (पॉक्सो) और किशोर न्याय क़ानून में अनेक कठोर प्रावधानों के बावजूद इस तरह के अपराध लगातार हो रहे हैं।

सवाल यह है कि मासूम बच्चियों से लेकर प्रौढ़ महिलाओं तक से दुष्कर्म करने और उनकी हत्या करने जैसे अपराध में उम्र क़ैद से लेकर मौत की सजा तक के प्रावधान होने के बावजूद लोगों में किसी प्रकार का भय क्यों नहीं उत्पन्न हुआ? ज़रूरी यह है कि अपराधियों को कठोरतम सजा देने के साथ ही इस तरह के अपराधों में हो रही वृद्धि और समाज में फैल रही इस विकृति के कारणों का पता लगाकर उन पर अंकुश पाने के गंभीर प्रयास किये जाएं। 

यह देखना होगा कि अबोध बच्चियों से लेकर प्रौढ़ महिलाओं के साथ इस तरह के दुष्कर्मों में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सहजता से उपलब्ध अश्लील सामग्री की कितनी भूमिका है?
सूचना क्रांति के इस दौर में 4जी का चलन है और समाज के सभी तबक़ों के अधिकांश व्यक्तियों के पास स्मार्ट फोन हैं और इन पर अश्लील वीडियो क्लिप आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इन वीडियो क्लिप और नशीले पदार्थों की उपलब्धता भी विकृत मानसिकता को विकसित करने में काफी योगदान दे रही है।

  

निर्भया कांड के बाद संसद ने बलात्कार जैसे घृणित अपराध की सजा से संबंधित भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों को कठोर बनाया। यही नहीं, दिल्ली, कठुआ, सूरत, एटा और इन्दौर आदि शहरों में मासूम बच्चियों से बलात्कार की घटनाओं के बाद ऐसे अपराधों के लिये यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण कानून (पॉक्सो) तथा अन्य क़ानूनों में आवश्यक संशोधन किये गये।

पॉक्सो क़ानून के तहत बच्चियों से बलात्कार और यौन हिंसा के अपराधों के लिये सजा का वर्गीकरण किया गया। इसके अंतर्गत 12 साल तक की बच्चियों से सामूहिक बलात्कार के अपराध में मृत्यु होने तक उम्र क़ैद या फांसी की सजा, 12 साल तक की आयु की बच्चियों से बलात्कार और यौन हिंसा के अपराध में कम से कम 20 साल और अधिकतम उम्र क़ैद या फांसी की सजा हो सकती है। इसी तरह 12 से 16 साल की किशोरी से सामूहिक बलात्कार के जुर्म में उम्र क़ैद और बलात्कार के अपराध में 10 से 20 साल की सजा और इसे उम्र क़ैद तक बढ़ाया जा सकता है।

निर्भया कांड के बाद अप्रैल 2013 से लागू नये प्रावधानों के तहत बलात्कार जैसे अपराध के लिये कठोर सजा का प्रावधान किया गया। सामूहिक बलात्कार जैसे अपराध के लिये तो कम से कम 20 साल और अधिकतम उम्र क़ैद की सजा का इसमें प्रावधान है।

समाजवादी पार्टी की सांसद और फिल्म जगत की हस्ती जया बच्चन की मांग है कि इस तरह के अपराध करने वाले व्यक्ति को भीड़ के हवाले कर देना चाहिए। महिलाओं के साथ लगातार हो रहे दुष्कर्मों के मद्देनजर जया बच्चन द्वारा आक्रोश में व्यक्त किए गए इस तरह के विचार की भावनाएं समझ में आती हैं लेकिन क्या क़ानून से शासित किसी भी व्यवस्था में ऐसा करना व्यावहारिक और तर्कसंगत है। दूसरी ओर, बीजेपी की सांसद और अभिनेत्री हेमा मालिनी का सुझाव है कि बलात्कार के अपराध के दोषियों को पूरी उम्र जेल में ही रखने का प्रावधान किया जाए। 

इस तरह के घृणित अपराध करने के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति या व्यक्तियों को क़ानूनी प्रावधानों के तहत ही सजा दी जा सकती है जो मृत्यु दंड तक हो सकती है। लेकिन इसके लिये क़ानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। 

हमारे देश की दंड न्याय प्रणाली कई स्तरीय है जिसकी वजह से बलात्कार के अपराध में दोषी को भले ही निचली अदालत से कठोरतम सजा सुनाई जा चुकी हो, लेकिन बावजूद इसके उसके पास उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय जाने के विकल्प रहते हैं।

यही नहीं, उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के बाद भी दोषी के पास पुनर्विचार याचिका और फिर सुधारात्मक याचिका दायर करने के भी क़ानूनी विकल्प उपलब्ध रहते हैं। ऐसी स्थिति में बलात्कार जैसे पाश्विक अपराधों पर नियंत्रण पाने के लिये विकृत मानसिकता पर अंकुश लगाने की ज़रूरत है। विकृत मानसिकता पर अंकुश लगाने के उपाय खोजने के लिये समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और मनो चिकित्सकों को युद्धस्तर पर समेकित प्रयास करने होंगे।

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इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि ऐसे अपराधों में नशीले पदार्थों के साथ ही सहजता से उपलब्ध अश्लील वीडियो क्लिपिंग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, इस समय इंटरनेट पर करोड़ों की संख्या में अश्लील और पोर्न वीडियो क्लिपिंग तथा ऐसी ही दूसरी सामग्री मुफ्त में उपलब्ध है।

इंटरनेट पर अश्लील फिल्में और वीडियो क्लिप उपलब्ध कराने वाली इन वेबसाइट्स को प्रतिबंधित करने के लिये पहले से ही एक मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। न्यायालय समय-समय पर इन पर प्रतिबंध लगाने के आदेश भी दे रहा है। 

सरकार को हर क़ीमत पर इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से सहजता से उपलब्ध हो रही अश्लील सामग्री पर प्रतिबंध लगाने ही होंगे।

उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार और जनप्रतिनिधि बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और हत्या करने जैसे पाश्विक अपराधों से उत्पन्न जन-आक्रोश की गंभीरता को महसूस करेंगे और अपराधों पर अंकुश पाने के लिये क़ानून में कठोरतम सजा का प्रावधान करने के साथ ही इसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार करेंगे।

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अनूप भटनागर
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