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अनुच्छेद 370 : गाँधीजी अगर जीवित होते तो क्या कहते और क्या करते?

गाँधीजी राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में अपनाई जाने वाली नीतियों और आदर्शों में पार्थक्य नहीं करते थे - उनके मुताबिक़ जो बात व्यक्तिगत जीवन में सही या ग़लत है, वही राजनीतिक जीवन में भी सही या ग़लत है - इसलिए आज हम उनके द्वारा ‘व्यक्तिगत जीवन में अपनाई गई नीति’ के आधार पर तय करेंगे कि यदि जम्मू-कश्मीर का मसला उनके सामने घटित होता तो वह कैसे रिऐक्ट करते।
नीरेंद्र नागर

कुछ ही दिनों में गाँधीजी की 150वीं जयंती आने वाली है और प्रधानमंत्री मोदी समेत सभी बड़े नेता बड़े-बड़े आयोजनों में उनको याद करेंगे। वे दावा करेंगे कि वे गाँधीजी के ही बताए मार्ग पर चल रहे हैं और उनके सपनों को पूरा कर रहे हैं। यह बात स्वच्छता अभियान और ग़रीबों को लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों जैसे इक्का-दुक्का मामलों में सही भी हो सकती है लेकिन कुछ बड़े मामलों में, जैसे जम्मू-कश्मीर को दिए गए विशेष दर्ज़े को समाप्त करने की सरकार की कोशिशों को क्या गाँधीजी का समर्थन मिलता?

पक्के तौर पर यह कहना बहुत मुश्किल है कि गाँधीजी आज जीवित होते तो क्या करते। क्योंकि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाले अनुच्छेद 370 पर उनकी क्या राय होती, यह हमें नहीं मालूम। वह तो उससे बहुत पहले मार दिए गए थे। चूँकि गाँधीजी राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में अपनाई जाने वाली नीतियों और आदर्शों में पार्थक्य नहीं करते थे - उनके मुताबिक़ जो बात व्यक्तिगत जीवन में सही या ग़लत है, वही राजनीतिक जीवन में भी सही या ग़लत है - इसलिए आज हम उनके द्वारा ‘व्यक्तिगत जीवन में अपनाई गई नीति’ के आधार पर तय करेंगे कि यदि जम्मू-कश्मीर का मसला उनके सामने घटित होता तो वह कैसे रिऐक्ट करते।

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पहले जम्मू-कश्मीर का बेसिक मसला समझ लें, फिर आगे बढ़ें। जम्मू-कश्मीर का मसला मूलतः वचन पालन का है। जब 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत में हुआ था तो भारत सरकार ने वहाँ के महाराजा और वहाँ की जनता को कुछ वचन दिए थे। इन वचनों में राज्य की सीमित स्वायत्तता और जनमतसंग्रह कराने का वादा भी था (पढ़ें विलय पत्र)। उन वचनों का पालन करने के लिए ही आगे चलकर संविधान में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए लाए गए थे। अब सरकार ने अनुच्छेद 370 को विलुप्त तो नहीं किया है लेकिन उसी के प्रावधानों का उपयोग करते हुए राज्य और वहाँ की जनता को प्राप्त विशेषाधिकार समाप्त कर दिए हैं। यह एक तरह से वचनभंग है।

हम इस मामले में गाँधीजी की राय उनके व्यक्तिगत जीवन से तलाशेंगे। बात 1888 की है जब गाँधीजी के पिता की मृत्यु हो चुकी थी और उनका परिवार उनके भावी करियर के बारे में सोच रहा था। तब एक पारिवारिक मित्र ने सलाह दी कि वह लंदन जाकर क़ानून की पढ़ाई करें ताकि लौटने के बाद पिता का दीवान का पद पा सकें। लेकिन विदेश जाने के ख़्याल से उनकी माँ परेशान थीं क्योंकि उनको डर था कि उनका बेटा विदेश में अपने धर्म की रक्षा नहीं कर सकेगा। तब युवा गाँधी ने उनके सामने शपथ ली कि वह विदेश में रहते हुए माँस-मदिरा का सेवन या स्त्री का संग नहीं करेंगे। इसके बाद ही माँ ने उन्हें विदेश जाने की अनुमति दी।

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गाँधीजी के तीन वचन

इंग्लैंड में रिहाइश के दौरान गाँधीजी ने इन तीनों वचनों का पालन करने की पूरी-पूरी कोशिश की। लेकिन उसी दौरान उनके सामने कुछ दुविधाएँ भी आईं। जैसे क्या अंडा खाना माँसाहार में आएगा? इंग्लैंड में उस समय माँस की तीन परिभाषाएँ थीं। पहली के अनुसार पशु-पक्षियों का माँस ही मांसाहारी भोजन माना जाता था और ऐसे कई शाकाहारी थे जो मछली और अंडे को आमिष भोजन नहीं मानते थे। दूसरी परिभाषा के अनुसार सभी जीवों का माँस माँसाहारी भोजन था लेकिन अंडे खाना माँसाहार नहीं था। तीसरी परिभाषा के अनुसार माँसाहार में जीवों के माँस के साथ-साथ उनके उत्पाद जैसे अंडे और दूध भी शामिल थे। अब गाँधीजी की समस्या यह थी कि माँ को दिए गए वचन का पालन करते समय किस परिभाषा को स्वीकार करें।

गाँधीजी उस प्रसंग का उल्लेख करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखते हैं - 

‘यदि मैं पहली परिभाषा को मान लेता तो मैं न केवल अंडे बल्कि मछली भी खा सकता था। लेकिन मुझे इसमें बिल्कुल ही संदेह नहीं था कि इस मामले में माँसाहार की वही परिभाषा मान्य होगी जो मेरी माँ की है। इसलिए यदि मुझे अपनी माँ को दिए गए वचन का पालन करना है तो मुझे अंडों का परित्याग करना होगा। मैंने वैसा ही किया।’

इसी प्रसंग के बाद गाँधीजी वचनों और उनकी व्याख्या के बारे में दो नियम तय करते हैं। वह लिखते हैं - 

‘वचनों की अलग-अलग व्याख्या दुनिया के कई झगड़ों और विवादों का मूल रही है। कोई वचन चाहे कितना भी सुस्पष्ट हो, लोग उसे अपने फ़ायदे के लिए तोड़मरोड़कर नया रूप दे ही देते हैं…  स्वर्णिम नियम यह है कि जो पक्ष वचन ले रहा है, उसकी ईमानदारीपूर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाए। इसके अलावा जब किसी वचन की दो व्याख्याएँ संभव हों तो कमज़ोर पक्ष की व्याख्या को स्वीकार किया जाए।’

इन्हीं दो नियमों के आधार पर माँसाहार की परिभाषा तय करते हुए गाँधीजी लिखते हैं - ‘इस स्वर्णिम नियम के अनुसार माँसाहार के बारे में मेरी माँ की जो व्याख्या थी, वही मेरे लिए सच्ची व्याख्या थी, न कि वह जो अपने विस्तृत अनुभव या बेहतर ज्ञान के गर्व के चलते मुझे सही लगे।’

बात सही है। वचन चूँकि माँ ने लिया था इसलिए उनकी ही व्याख्या मानी जानी चाहिए। दूसरे, इस मामले में माँ ही कमज़ोर पक्ष थी क्योंकि गाँधीजी अगर वचन तोड़ भी देते या तोड़ने के बाद भी नहीं बताते तो माँ क्या कर लेतीं। अर्थात दोनों ही पैमानों पर गाँधीजी ने माँ की व्याख्या को ही सही माना।

अब ‘वचनों की व्याख्या’ संबंधी इन दो नियमों के आधार पर कश्मीर की स्थिति को परखते हैं। जैसा कि ऊपर कहा, तत्कालीन भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह और वहाँ की जनता को वचन दिया था कि रियासत स्वायत्त रहेगी, वहाँ का अलग संविधान होगा, वहाँ के नागरिकों को विशेषाधिकार प्राप्त होंगे। आज इन वचनों की नए सिरे से व्याख्या हो रही है। ऐसे में किसकी व्याख्या सही मानी जाएगी?

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जम्मू-कश्मीर का वचन

  • नियम नंबर 1 के अनुसार जिसने वचन लिया, उसकी व्याख्या सही मानी जानी चाहिए। वचन किसने लिया? जम्मू-कश्मीर के महाराजा और वहाँ की प्रजा ने। इस हिसाब से उन्हीं की व्याख्या सही मानी जानी चाहिए और स्वायत्तता और विशेषाधिकार को बनाए रखा जाना चाहिए।
  • नियम नंबर 2 के अनुसार जहाँ किसी वचन की दो व्याख्याएँ हों, वहाँ निर्बल पक्ष की व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस मामले में निर्बल कौन है? जम्मू-कश्मीर और वहाँ की जनता। इस हिसाब से भी जम्मू-कश्मीर की जनता की व्याख्या को सही मानते हुए वहाँ की स्वायत्तता और विशेषाधिकारों को बनाए रखा जाना चाहिए।

लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। अर्थात मौजूदा सरकार गाँधीजी के बताए हुए वचन पालन के सिद्धांत को नहीं मान रही है। यही कारण है कि जितने भी सच्चे गाँधीवादी हैं, वे अनुच्छेद 370 के साथ की गई इस छेड़छाड़ से दुखी हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनके श्रद्धेय गाँधीजी यदि जीवित होते तो इस वचनभंग से बिल्कुल ही ख़ुश नहीं होते और हो सकता है, वह आमरण अनशन पर बैठ जाते।

नीरेंद्र नागर
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