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कोरोना: लॉकडाउन को लेकर बीच का रास्ता अपनाए भारत

अगर लॉकडाउन लंबे समय तक जारी रहा तो इससे करोड़ों लोगों के बेरोज़गार होने का ख़तरा है। लेकिन इसे हटा लें तो तो कहीं भारत में भी इटली और अमेरिका-जैसा विस्फोट न हो जाए। लेकिन सरकारों को यह भी देखना होगा कि लॉकडाउन कहीं कोरोना से भी ज़्यादा जानलेवा सिद्ध न हो जाए। इसीलिए बेहतर होगा कि सरकारें और आम जनता अतिवाद से बचे। मध्यम मार्ग अपनाए। 
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

सभी लोग यह सोच रहे हैं कि 15 अप्रैल से लॉकडाउन (तालाबंदी) हटेगा या नहीं? इस सवाल का जवाब हां या ना में, दोनों ही ठीक नहीं होगा। क्योंकि अगर यह जारी रहता है तो देश के 60-70 करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएंगे। वे अपनी रोजी-रोटी को तरस जाएंगे। सरकारें और समाजसेवी संस्थाएं उन्हें घर बैठे-बैठे कब तक खिला सकती हैं? 

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का कहना है कि भारत की सकल विकास दर 5 प्रतिशत से गिरकर 2 प्रतिशत तक हो सकती है। खेती, कल-कारखानों और व्यापार को जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई में बरसों बीत जाएंगे। निराशा, उदासीनता और अंधकारमय भविष्य के डर से नागरिकों में जो मानसिक बीमारियां फैलेंगी, उनके कारण अपराधों में अपूर्व वृद्धि हो सकती है। 

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तो क्या करें? क्या लॉकडाउन एकदम हटा लिया जाए? यह अब तक शायद हटा लिया जाता लेकिन जमाते-तब्लीग़ी की मेहरबानी से कोरोना अब गांव-गांव तक फैल गया है। जिस बीमारी ने शुरू में सिर्फ विदेश-यात्रियों और उनके निकट लोगों को छुआ था, वह अब रिक्शा वालों, रेहड़ी वालों और झोपड़-पट्टी वालों तक फैल गई है। कुछ अकड़ और कुछ ग़लतफहमी के शिकार जमाती अब भी अपनी हरक़तों से बाज़ नहीं आ रहे हैं। 

डर यही है कि यदि सरकारें एकदम लॉकडाउन हटा लें तो कहीं भारत में भी इटली और अमेरिका-जैसा विस्फोट न हो जाए लेकिन सरकारों को यह भी देखना होगा कि यह लॉकडाउन कहीं कोरोना से भी ज़्यादा जानलेवा सिद्ध न हो जाए। इसीलिए बेहतर होगा कि सरकारें और आम जनता अतिवाद से बचे। मध्यम मार्ग अपनाए। 

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अभी मुश्किल से सारे देश में ऐसे दो दर्जन जिले कोरोना से ग्रस्त हैं, जिनमें पूर्ण कर्फ्यू लगाया जा सकता है। उनमें आना-जाना बिल्कुल बंद हो। लगभग 200 जिलों को आंशिक रूप से खोला जा सकता है और 400 जिले ऐसे हैं, जिनमें नागरिक सारी सावधानियां बरतते हुए अत्यंत अनिवार्य और अपरिहार्य काम करें। 

कोरोना की जांच राजस्थान के भीलवाड़ा-जैसी हो और सरकारी सख्ती दिल्ली-जैसी हो। लोगों की जांच के बाद उन्हें अपने गांवों तक यात्रा करने देने का ख़तरा भी मोल लिया जा सकता है? शिविरों में पड़े लोग बेहद परेशान हैं और वहां संक्रमण का ख़तरा ज्यादा है लेकिन गांव पहुंचकर कोरोना हो गया तो फिर क्या होगा, यह भी बड़ा सवाल है। 

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)

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डॉ. वेद प्रताप वैदिक
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