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क्या चंबल की विकास योजना में कॉरपोरेट की साज़िश; डाकुओं की होगी वापसी?

विश्व बैंक की मदद से चंबल के बीहड़ों के समतलीकरण और इसे कृषि योग्य बनाने की कोशिश शुरू हुई है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और इस क्षेत्र में कार्यरत पर्यावरणविदों का आरोप है कि इस कथित विकास के पीछे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट की घुसपैठ और स्थानीय किसानों के विनाश का षड्यंत्र छिपा है। कहा जा रहा है कि तबाह हो चुके किसान 'बाग़ियों' की नई फौज के रूप में जन्म लेंगे। 
अनिल शुक्ल

विश्व बैंक की मदद से चंबल के बीहड़ों के समतलीकरण और इसे कृषि योग्य बनाने हेतु केंद्रीय कृषि मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार के बीच पिछले दिनों संभावनाओं की तलाश में हुई मीटिंग और नई दस्यु सुंदरियों की खोज में यूपी पुलिस के बीहड़ों को खंगाल डालने की घटनाएँ एक साथ होती हैं। बेशक़ दोनों के बीच कोई प्रत्यक्ष रिश्ता न हो लेकिन इनका एक साथ होना यह इतना ज़रूर दर्शाता है कि युगों से चला आ रहा चम्बल के बीहड़ों का गंभीर संकट दोनों जगह बरक़रार है।

जुलाई के अंतिम सप्ताह में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने विश्व बैंक के वरिष्ठ प्रतिनिधि और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक में ग्वालियर-चंबल संभाग की 3 लाख हेक्टेयर परती बीहड़ भूमि हेतु जिस प्लान के लिए समझदारी विकसित हुई है, उसकी ‘पार्लियामेंट्री प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ पेश होनी है जिसके बाद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान उस पर अंतिम मुहर लगाएँगे। श्री तोमर मानते हैं कि यह परियोजना न सिर्फ़ क्षेत्र की भूमि को कृषि योग्य बनाएगी बल्कि क्षेत्रीय लोगों के लिए बड़े पैमाने पर रोज़गार भी मुहैया कराएगी। उन्होंने प्रस्तावित 'चंबल एक्सप्रेस' हाईवे को इस परियोजना से जोड़ते हुए कहा कि इस सब के पूरा हो जाने से समूचे बीहड़ क्षेत्र का बड़े पैमाने पर विकास होगा। इसके विपरीत स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और इस क्षेत्र में कार्यरत पर्यावरणविदों का आरोप है कि इस कथित विकास के पीछे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट की घुसपैठ और स्थानीय किसानों के विनाश का षड्यंत्र छिपा है। उनका यह मानना है कि अगर ऐसा सचमुच घटा तो तबाह हो चुके ये किसान 'बाग़ियों' की नई फौज के रूप में जन्म लेंगे और बीहड़ों में शांति हमेशा-हमेशा के लिए गुम हो जाएगी।

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चंबल के बीहड़ों के विकास की मौजूदा योजना कोई नई योजना नहीं है। 1960 से लेकर 1990 के दशकों में दोनों मोर्चों पर पूरे ज़ोर-शोर से 'एक्शन' होते रहे हैं लेकिन अरबों रुपये ख़र्च करने के बावजूद इनमें से कोई भी 'क़ामयाबी की दास्तान' नहीं बन सके हैं। सवाल यह उठता है कि आज़ादी के बाद के 60 सालों के जिन पुराने रास्तों पर चलकर इन्हें नाकामी मिलती रही है, इस बार भी वही राह चुनी गई है या कोई नयी डगर ढूंढी जा रही है? 10 साल तक छोटे-मोटे स्तर पर केंद्र और राज्य सरकार की माथाफोड़ी के बाद केंद्र सरकार ने 1971 में 'मेगा रेवाइन रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट' चलाया। लक्ष्य था 80 हज़ार हैक्टेयर बीहड़ भूमि (55 हज़ार हैक्टेयर बीहड़ भूमि को कृषि योग्य और 25 हज़ार हैक्टेयर को जंगलातों के लिए) विकसित किया जाए। 

इस प्रोजेक्ट में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में फैले बीहड़ थे। मज़ेदार बात यह है कि 25 वर्षों के कार्यकाल में इससे जुड़ी 19 उप परियोजनाओं के बूते केवल 2 हज़ार हेक्टेयर बीहड़ भूमि का ही पुनरुद्धार हो सका। 1980 और 1990 के दशक में मध्य प्रदेश सरकार के वन विभाग ने 'हवाई बीज विभाग' की स्थापना की ताकि हवाई जहाज़ के ज़रिये बीजों का छिड़काव किया जा सके। सरकारी जहाज़ों द्वारा 'बबूल', 'विलायती बबूल' और 'जंगल जलेबी' आदि के बीजों का छिड़काव हुआ लेकिन कामयाब नहीं हो सका। बीज या तो बारिश में बह गए या बगल के खेतों में चले गए और वहाँ उग कर किसानों के लिए खेती के कामकाज में बड़ा व्यवधान बन कर खड़े हो गए जबकि भिंड, मुरैना आदि क्षेत्र ज़बरदस्त  उपजाऊ धरती वाले हैं।

नवंबर 2016 में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने बीहड़ को समतल करके कृषि योग्य बनाने हेतु एक नई महत्वाकांक्षी परियोजना को केंद्र के समक्ष भेजा।

उक्त परियोजना में मुख्यत: चंबल, सिंध, बेतवा, क्वारी और यमुना की सहायक (ट्रीब्यूट्री) नदियों वाले मुरैना, भिंड और शिवपुर आदि क्षेत्रों के 68833 हेक्टेयर बीहड़ों को केंद्र में रखा गया था। 1200 करोड़ रुपए के बजट वाली उक्त परियोजना में केंद्र बनाम राज्य के बजट का अनुपात 80:20 था। यानी केंद्र के ज़िम्मे 900 करोड़ रुपए और शेष राशि राज्य सरकार और उन किसानों के हिस्से में आने का प्रावधान था, जिन्हें भविष्य में उक्त परिवर्धित भूमि मिलती। उम्मीद की जाती थी कि विधानसभा चुनाव आते-आते इसे उपरोक्त क्षेत्र में बड़े चुनावी झुनझुने के रूप में बजाया जाएगा इसीलिए इसे 'मध्य प्रदेश विज़न डॉक्युमेंट' का हिस्सा बनाया गया। 

चुनावों के दौरान बीजेपी ने चंबल-ग्वालियर संभाग की अपनी चुनावी सभाओं में क्षेत्र के भविष्य के विकास के मॉडल के तौर पर इसका जम कर शंख बजाया। कांग्रेस ने इस परियोजना की कमज़ोरी की ख़ूब खिल्ली उड़ाई। प्रोजेक्ट की खाल उधेड़ने वालों में तब ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल थे।

परियोजना कोई शक्ल ले पाती इससे पहले शिवराज सरकार 2018 का चुनाव हार गई। राज्य में नई कांग्रेस सरकार का गठन हो जाने के चलते केंद्र ने कोई रूचि दर्शायी नहीं लिहाज़ा योजना ठन्डे बस्ते में धर दी गई। कमलनाथ सरकार की विदाई के बाद 'अपने' मुख्यमंत्री के अनुरोध पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर ने इसमें विशेष रूचि ली जो स्वयं भी ग्वालियर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। परियोजना की बाबत मध्य प्रदेश के कृषि आयुक्त के. के. सिंह कहते हैं, "माननीय कृषि मंत्री, भारत सरकार की देखरेख में यह पुरानी परियोजना का संशोधित स्वरूप है।" 

3 लाख हेक्टेयर की योजना

मौजूदा परियोजना में 3 लाख हेक्टेयर बीहड़ भूमि को कृषि और वन क्षेत्र के लिए विकसित करने की बात है।

'मध्य प्रदेश कृषक कल्याण और कृषि विकास विभाग' के अध्ययन के अनुसार बीहड़ में पसरा कुल क्षेत्र 3.97 मिलियन (लगभग 40 लाख) हेक्टेयर है जिसकी चपेट में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात राज्य आते हैं। इसमें अकेले मध्य प्रदेश का हिस्सा 70% (29 लाख हेक्टेयर) है। 6 दशकों की ढेरों कोशिशों के बावजूद उक्त अध्ययन बताता है कि प्रति वर्ष बीहड़ का होने वाला विस्तार 9.5% है यानी भूमि क्षरण के चलते हर साल बीहड़ 8000 हेक्टेयर भूमि निगल रहा है। तब मौजूदा परियोजना को लेकर 2 सवाल सीधे-सीधे खड़े होते हैं। पहला, कि क्या उन कारणों का अध्ययन किया गया जिनके चलते वे सारे प्रयास और परियोजनाएँ फ़ेल साबित हुईं। दूसरा, कि क्या नई परियोजना में नए तौर-तरीक़े अपनाए जा रहे हैं या पुराने  'प्रयोगों' की ही पुनरावृत्ति होने वाली है।

मुख्यतः इस क्षेत्र के बीहड़ों की धरती के साथ 5 प्रकार की कठिनाइयाँ हैं। पहली तो यह कि यहाँ की मिट्टी बड़ी कठोर और कड़ी है। यदि इन्हें समतल कर दिया जाए तो वर्षा इन्हें फिर से बीहड़ों में तब्दील कर देती है।

दूसरी मुश्किल थी कि सरकारी प्रभुत्व वाली भूमि को किसानों में कैसे स्थानांतरित किया जाए। तीसरी दिक़्क़त थी कि बहुत से किसानों ने इसे कृषि योग्य बनाने की कोशिश की लेकिन कामयाब कोई न हो सका और चौथा संकट था बीहड़ों को कृषि जोतों में बदलना किसानों के लिए असंभव था।

सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और 'राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय' के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर विजयसिंह तोमर पिछले वर्षों में अपने कार्यकाल में हुए एक प्रयोग और उसकी 'सक्सेस स्टोरी' का उल्लेख करते हैं। उनके निर्देशन में विश्वविद्यालय ने यह प्रयोग मुरैना ज़िले के दिमनी क्षेत्र के ईसा गाँव के 30 एकड़ बीहड़ क्षेत्र में किया था। इसमें 50 प्रतिशत बीहड़ किसानों के अपने निजी थे। राज्य के कृषि विभाग और स्थानीय समुदाय की मदद से उन्होंने परंपरागत खेती के बदले फलदायी और औषधीय वृक्षों का रोपण किया। 

'सत्य हिंदी ' से बात करते हुए प्रो. तोमर कहते हैं,

"हमने अमरुद, आम, आमला, अनार, किन्नू, बेर, नीम और बबूल के पेड़ लगाए। प्लांट की बड़ी अच्छी ग्रोथ हुई। मेरे रहते-रहते ये फलदार होने को थे।" परियोजना का दूसरा पार्ट इसी क्षेत्र में इन किसानों की मदद से 'फ़ूड प्रॉसेसिंग प्लांट’ लगाना था। इस बीच प्रो. तोमर रिटायर हो गए। बड़े दुःख भरे स्वर में अपनी बात का समापन करते हुए वह कहते हैं, "मेरे बाद न राज्य सरकार के साथ ठीक से कोऑर्डिनेशन हो सका, उन्होंने हाथ खींच लिए। न तो पेड़ों का ठीक से रख रखाव हो सका और न प्रॉसेसिंग प्लांट लगाया जा सका और प्रोजेक्ट ख़तम हो गया।" 

मज़ेदार बात यह कि केंद्रीय कृषि मंत्री और 'विश्व बैंक' के साथ हुई हालिया बैठक में उक्त विश्वविद्यालय के मौजूदा कुलपति को भी शामिल किया गया था लेकिन प्रो. तोमर को इस बात की कोई जानकारी नहीं कि उनके दौर के ईसा गाँव की 'सक्सेस स्टोरी' को नई परियोजना में 'पैटर्न' के रूप में शामिल किया गया है कि नहीं। नई परियोजना के कारगर हो पाने की संभावनाओं के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, "यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे इम्प्लीमेंट कैसे किया जा रहा है।“ वह बताते हैं कि बीहड़ों के आगे बढ़ने से रोकथाम के उपाय भी हमने बताए थे। उनका कहना है कि छोटे-छोटे चेक डैम के ज़रिये बाढ़ का पानी अगर खेतों के अंदर घुसने से रोक लिया जाएगा तो नीचे का पानी भी रुकेगा और ऊपर का कटाव भी थमा रहेगा। ऐसा करने से चंबल नदी का पानी जो खेतों की तरफ़ बढ़ता है, वह भी रुकेगा और इस तरह नए बीहड़ नहीं विकसित होंगे। 

स्थानीय किसानों को शामिल किए जाने की बात पर कृषि वैज्ञानिक का कहना था,

“किसान बड़े ताव में कहते थे- 'हाँ, हम आम, अमरुद, किन्नू, बेर और अनार वगैरा पैदा तो कर लेंगे लेकिन उसके लिए मार्किट कहाँ से लाएँगे?' हमें उनके सवालों के जवाब तैयार करने होंगे, उन जवाबों को अमल में उतारना होगा। हमें उनके बीच से उनकी पढ़ी-लिखी व्हाइट कॉलर्ड संतानों की तलाश करनी होगी जो पर्याप्त ट्रेनिंग के बाद फ़ूड प्रोसेसिंग जैसी एग्रो इंडस्ट्री का संचालन कर सकें।"

इस मामले में मुरैना की 'सुजागृति समाज सेवी संस्था' के प्रयोग बड़े ही कामयाब हैं। पहला प्रयोग उन्होंने 'जैव विविधता बोर्ड' की प्रारंभिक मदद से मुरैना के बीहड़ों वाले विपरई, जरोल, रऊ, रायतपुरा, नंदुआपुरा, बामसौली आदि गाँवों में औषधीय पौधों के उत्पादन का किया। वस्तुतः जंगलों के सिकुड़ने से इन बीहड़ों में 'गुग्गुल', 'सतावर', 'करील', 'अग्निमन्त्र', और 'गोखरू' आदि औषधीय पौधों का लोप होता जा रहा था जो स्थानीय ग्रामीणों की बड़ी आजीविका के साधन थे। गुग्गुल सहित इन अन्य पौधों की यह भी विशेषता है कि ये मिट्टी को कस कर पकड़ते हैं अतः बीहड़ विस्तार नहीं ले पाते। 'सुजागृति' के अध्यक्ष ज़ाकिर हुसैन ने 'सत्य हिंदी' को बताया, 

"आज इस पूरे क्षेत्र में 500 परिवार इस काम में लगे हैं। 'डाबर इण्डिया' जैसी कंपनियों के साथ इन गाँव वालों का 'एमओयू' है और वे और 1 लाख से ढाई लाख रुपये वार्षिक की आय कर रहे हैं। दूसरी तरफ़ इस क्षेत्र में बीहड़ों ने फैलना बंद कर रखा है।"

'सुजागृति ने अपना दूसरा प्रयोग 'यूएनडीपी' के सहयोग और 'सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एजुकेशन '(सीईई) की तकनीकी मदद से ग्राम पंचायत पिपरई और मसूदपुर में 'डोरबंदी' का किया। यह वस्तुतः बीहड़ों को उपजाऊ भूमि की ओर बढ़ने से रोकने की एक देसी पद्धति है जिसमें उपजाऊ ज़मीन और बीहड़ के बीच 3 फुट ऊँची और 6 फुट चौड़ी मिट्टी की दीवार खड़ी कर दी जाती है जिसके बीच-बीच में पत्थर की निकास नाली बना दी जाती है ताकि बारिश का पानी बह कर निकल जाए। ज़ाकिर बताते हैं, "हमने सिर्फ़ 2 किमी लम्बी 'डोर बंदी' बनाई थी। उसके नतीजे देखकर गाँव वालों ने आगे चलकर अपने पैसे और हमारे तकनीकी सहयोग से 12 किमी तक इसे फैला दिया और अब वहाँ बीहड़ रुक गया है।" यह पूछने पर कि क्या बीहड़ रोकने की सरकारी परियोजनाओं में उनकी या इन अनुभवी ग्रामीणों की सलाह कभी ली गई, ज़ाकिर इनकार में गर्दन हिलाते हैं।

विचार से ख़ास

बहरहाल, इस नई परियोजना के आने की तैयारियाँ तो शुरू हो गई हैं लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरणविद इसे लेकर सशंकित हैं। भारत सरकार के 'पत्र सूचना कार्यालय' द्वारा जारी वक्तव्य से 'वर्ल्ड बैंक' के साथ रची जा रही इस योजना की बाबत अभी तक उन्हें यह नहीं पता चल सका है कि उसमें समतलीकरण के लिए कौन सी विधि अपनाने की बात है और यह भी कि इसका ज़ोर परंपरागत खेतिहर ढाँचे पर है या कि यह कृषिगत उद्देश्य के लिए उद्यान को अपना आधार बनाएगी जो 'राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय अथवा  'सुजागृति' की 'सक्सेस स्टोरी' रही है। वे यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि परियोजना में 'कन्युनिटी' का दखल किस हद तक रहेगा।

 उधर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता चंबल के बीहड़ों के द्वार बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट घरानों के लिए खोलने और किसानों को बीहड़ों के उनके परंपरागत दखल से बाहर की राह बताने की तैयारी के रूप में  इस परियोजना को देख रहे हैं। वे आने वाले दिनों में बेदखल कर दिए जाने वाले किसानों को चंबल के भविष्य के बाग़ियों (डाकुओं) की बड़ी फ़ौज के रूप में देख रहे हैं। कैसे?

(...अगले अंक में जारी)

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